Sunday , August 20 2017
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मोदी सरकार की तरफ से बुंदेलखंड भेजी गई पानी की ट्रेन निकली खाली

लखनऊ । यूपी सरकार पहले ही मना कर चुकी है कि बुंदेलखंड में पानी की व्यवस्था की जा रही है, वहां वाटर ट्रेन भेजने की जरूरत नहीं है।इस बीच झांसी में ट्रेन पहुंचने की चर्चा पर सीएम ने डीएम को ट्रेन की जांच कर रिपोर्ट मांगी है कि ट्रेन में पानी है या नहीं ? जिलाधिकारी आलोक रंजन द्वारा जांच करने पर ट्रेन में लगे पानी के डिब्बे खाली पाये गए ।

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वहीं कानपुर में गुरुवार को शिवपाल ने दो टूक कहा कि केंद्र सरकार बुंदेलखंड के साथ राजनीति कर रही है। वहां के सभी जिलों में पेयजल व्यवस्था के लिए प्रदेश सरकार सक्षम है और कर भी रही है।

शिवपाल ने कहा कि बुंदेलखंड जब प्यासा था तब पानी की ट्रेन भेजने वाले कहां थे। सपा सरकार ने बुंदेलखंड में पानी की समस्या को दूर करने के लिए 13 डैम का नर्मिाण शुरू कर दिया है। जल संकट दूर करने के लिए प्रदेश सरकार ने 22 करोड़ रुपए स्वीकृत किए हैं। कई प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। इसके तहत नदियों और नहरों की सफाई, तालाबों की खुदाई समेत अन्य कार्य किए जा रहे हैं। बुंदेलखंड में भी काफी काम किया गया है। इस बारिश में वहां के तालाबों और नदियों में भरपूर पानी होगा।

क्या है मुद्दा-
भाजपा के हमीरपुर से सांसद कुंवर पुष्पेंद्र सिंह चंदेल ने केंद्र से मांग की कि हमीरपुर-महोबा में ट्रेन से पानी भेजा जाए। रेलवे बोर्ड ने झांसी के डीआरएम और स्टेशन मास्टर से रिपोर्ट मांगी। दोनों ने महोबा के डीएम वीरेश्वर कुमार से बात की। डीएम ने लखनऊ में बैठे आला अधिकारियों और फिर सत्ता में बैठे बड़े सियासी हुक्मरानों से पूछा। संकेत मिले कि जब पानी पर्याप्त है तो ट्रेन क्यों मंगवाई जाए? लिहाजा डीएम ने रेलवे को पत्र लिखकर ट्रेन लेने से इनकार कर दिया।

दोनों की निगाह 2017 के सियासी समर पर
पानी भेजने की तेजी और इनकार के पीछे वजह है कि विधानसभा चुनाव केंद्र व यूपी दोनों की ही निगाह में है। गंगा सफाई, केंद्रीय सहायता जैसे मुद्दों पर दोनों सरकारों में आरोप-प्रत्यारोप पहले से चल रहे हैं। अखिलेश वक्त-बे-वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते रहे हैं। अब केंद्र सरकार इस नई तत्परता से यह संदेश देने की कोशिश में दिखती है कि उसे बुंदेलखंड की बदहाली दूर करने की फक्रि अखिलेश सरकार से ज्यादा है।

इनकार के सियासी कारण –
अखिलेश सरकार दो कारणों से इनकार कर रही है। एक तो उसे भय है कि केंद्र व विपक्षी दल यह संदेश देने में कामयाब रहेंगे कि यूपी सरकार पानी मुहैया कराने में ठीक से काम नहीं कर रही है, जबकि पहले से ही पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। दूसरे बुंदेलखंड में पानी संकट उतना गहरा नहीं है जितना खाद्यान्न संकट। सरकार खाद्यान्न सामग्री के पैकेट पहले से ही बंटवा रही है। तो फिर बेवजह की सियासत को क्यों हवा दी जाए। वैसे भी बुंदेलखंड वोट बैंक व विधानसभा सीटों के लिहाज से तो बहुत ज्यादा ताकतवर नहीं है लेकिन देश में इसकी बदहाली पर सियासत उसी तरह होती है जैसे महाराष्ट्र के विदर्भ की।

साभार लोकभारत डॉट कॉम

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