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तलाक़ पर दोगली मीडिया: क्या टीवी स्टूडियो में कभी दंगा पीड़ितों को देखा है?

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ये तस्वीर ईद (12 सितम्बर, 2016) की है जब औरतें कलकत्ता के एक मदरसे में क़ुर्बानी का मीट लेने जमा हुई हैं. (www.charityalliance.in)

नई दिल्ली: मुस्लिम संस्थाओं द्वारा हुई आज की प्रेस वार्ता यूनिफार्म सिविल कोड और पर्सनल धार्मिक क़ानून के बारे में नेशनल लॉ कमीशन में हो रहे घटनाक्रम को लेकर थी. जब कुछ पत्रकारों ने ट्रिपल तलाक़ के बारे में सवाल पूछने की कोशिश की तो उन्हें बा-सलीक़ा मना कर दिया गया और उन्हें बताया गया कि ये प्रेस-वार्ता यूनिफार्म सिविल कोड को लेकर है ना कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहे ट्रिपल तलाक़ के मुक़दमे को लेकर. दोनों मुद्दे एक दूसरे से एकदम अलग हैं और इन्हें मिलाना नहीं चाहिए. लेकिन शाम में जब प्राइम टाइम टीवी बहस शुरू हुई तो उनका फोकस ट्रिपल तलाक़ ही था जो शायद वे किसी “आदेश” की वजह से कर रहे थे. बहस करने आये लोग शरीया को बिना जाने ही बुरा भला कह रहे थे. टीवी न्यूज़ चैनल भी अपने स्टूडियो में ट्रिपल तलाक़ के पीड़ितों को ले आये थे.

यूनिफार्म सिविल कोड असल में सिर्फ़ मुसलमानों को पीटने के लिए एक डंडी है. मुसलमानों को पीट कर खुश होने वाले आज भारत की सत्ता पे क़ाबिज़ हैं. बहुसंख्यक समुदाय भी कोई ‘मोनोलिथिक ब्लाक’ नहीं है. इसके अलावा अगर बात करनी ही है तो गुजरात में “स्वधर्म त्याग क़ानून” की बात करिए, गुजरात के डिस्टर्ब एरिया एक्ट की बात करिए, दलित मुसलमानों या दलित ईसाईयों को आरक्षण की बात करिए, हिन्दू अविभाजित परिवार को कर के जो फ़ायदे मिलते हैं उसकी बात करिए.. करिए ना !

खैर, वापस स्टूडियो में मुस्लिम महिलाओं पर आते हैं |

हम पूछते हैं उनकी बीवियां,उनकी माएँ, उनकी बेटियाँ स्टूडियो में कब आएँगी जो पैलेट बंदूकों के शिकार हो गए? क्या ये हज़ारों कश्मीरी विधवाओं या आधी विधवाओं में से किसी एक को स्टूडियो में लेकर आये? उनकी बीवियां, माएँ, बेटियाँ, बहनें लेकर आये जो आतंकवाद के झूठे इलज़ाम में भारत की अलग अलग जेलों में बंद हैं? मिन्हाज़ अंसारी की बहनों को या उसकी माँ को लाये क्या जिसकी झारखंड पुलिस कस्टडी में मौत हो गयी? उनकी बीवियां, माएँ, बेटियाँ, बहनों को लेकर न्यूज़ स्टूडियो आये जो साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए हैं ? पुणे के मोहसिन शेख़ की माँ को देखा है कभी? उनकी बीवियां, माएँ, बेटियाँ, बहनें लेकर आये जिन्हें गौ-रक्षकों ने मारा-पीटा है?

ये बीजेपी सरकार के पाखण्ड की चरम सीमा है कि वो लोगों को यक़ीन दिलाना चाहती है कि भारतीय मुस्लिम महिलाओं की सारी परेशानियों की जड़ ट्रिपल तलाक़ की वो परम्परा है जिसे बहुत कम लोग मानते हैं.

आखिर कब तक मुसलमानों के अहम मुद्दों को दरकिनार कर उन्हें इस तरह के मसलों में उलझाया जाएगा ? कब मुसलमानों के लिए विकास और अहम मुद्दों पर सकारात्मक कर्यवाही की जायेगी? आख़िर कब तक सरकार सच्चर समिति की सिफ़ारिशों को अनदेखा करेगी?

[यह लेख मिल्ली गज़ट www.milligazette.com में छपी है, सियासत टीम द्वारा अनुवादित]

Photo Courtesy: www.charityalliance.in

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