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मोदी सरकार भारत में ‘बेरोजगारी विकास’ के संकट से आँखें मूंद कर बैठी है

‘द वायर’ (एम्.के.वेणु): नरेंद्र मोदी जहाँ अपनी सरकार के तीन साल पुरे होने की खुशियां मना रहे होंगे, वहीँ उन्हें अब इस बात पर सोचना शुरू कर देना चाहिए की उनकी सरकार 2014 में किये गए अपने सबसे बड़े वादे – ‘नौकरी पैदा करने’ में असफल रही है। 2014 के चुनावों से पहले कई सार्वजनिक रैलियों में मोदी ने युवा वोटरों से अपील की थी की वे बीजेपी को एक मौका दे ताकि वे उनकी ज़िन्दगियों में सुधार ला सकें।

अगर आँकड़ो पर ही एनडीए का आंकलन किया जाये , तो उनकी असफलता सामने आ जाती है। यह असफलता उनके श्रम मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आंकड़ों से पता चलती है। सिर्फ एक तुलनात्मक डेटा से हमें संगठित क्षेत्र में नौकरियों में हुई भारी गिरावट की कहानी का पता चलता है। 2009 से 2011 के तीन वर्षों के दौरान, जब भारत का जीडीपी 8.5% औसत से बढ़ रहा था, तो संगठित क्षेत्र हर साल 9.5 लाख नए रोजगारों का सृजन कर रहा था। यह समय अपेक्षाकृत ‘बेरोजगार वृद्धि’ के रूप में देखा गया था। पिछले दो वर्षों , 2015 और 2016 में औसत रोजगार सृजन घट कर प्रतिवर्ष 2 लाख से कम नौकरियों पर पहुँच गया है।

वस्त्र, धातु, चमड़े, रत्न और आभूषण, आईटी और बीपीओ, परिवहन, ऑटोमोबाइल और हथकरघा जैसे संगठित क्षेत्रों में रोजगार की बढ़ोतरी में इतनी गिरावट क्यों है?  एक बड़ा सवाल यह उठता है की इन क्षेत्रों में क्या गलत हो रहा है क्यूंकि भारत को इन क्षेत्रो के कारण विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने मे मदद मिलनी चाहिए।

2015 में जब इन 8 क्षेत्रों में पैदा हुए नए रोजगार 1.5 लाख नौकरियों के सभी कम पहुँच गए थे, तो सरकार को इस गिरावट ने चिंतित कर दिया था और उसने डेटा एकत्र करने की पद्धति की समीक्षा करने का निर्णय किया था। उसके बाद सरकार ने संगठित उद्योग के आठ क्षत्रो के दायरे को बढ़ा कर शिक्षा, स्वास्थ्य और रेस्टुरेंट जैसे कुछ प्रमुख सेवा उद्योगों को इसमें शामिल कर दिया। यह स्पष्ट रूप से रोजगार वृद्धि के आंकड़ों में वृद्धि दिखाने के लिए किया गया था क्योंकि विनिर्माण क्षेत्र में बहुत कम वृद्धि दर दिख रहा था – करीब 1.5% सालाना – जबकि सेवा क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन हो रहा था और वह 7-8% से बढ़ रहा था।

संगठित क्षेत्र के रोजगार आंकड़ों से सेवा क्षेत्र के आंकड़ों को जोड़ने के बाद सरकार 2016 में नए रोज़गारो के विकास में थोड़ा सुधार दिखा सकी है। नौकरियां 2015 में 1.55 लाख से बढ़ कर 2016 तक 2.31 लाख हो गई थी। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है की यह अभी भी संगठित क्षेत्र का 25% है। नई पद्धति से एनडीए सरकार को एक और मिथक को बनाए रखने में मदद मिली है – अक्टूबर से दिसम्बर 2016 की नोटेबंदी तिमाही के दौरान कोई महत्वपूर्ण नौकरियों की हानि नहीं हुई है। आश्रयजनक रूप से इस तिमाही में श्रम मंत्रालय के डेटा ने नौकरियों में बढ़ोतरी दिखाई है। केवल निर्माण क्षेत्र ऐसा है जहाँ मामूली गिरावट हुई है, अन्य सभी क्षेत्रो में नौकरियों में वृद्धि हुई है ।

डाटा स्रोत: दा वायर (लेबर ब्यूरो)

 

पहली नजर में, यह विश्वास करना मुश्किल है की जब अर्थव्यवस्था पूरी तरह से नोटेबंदी के कारण शक्तिहीन हो गयी थी तब उद्योग जगत मे नौकरियों का सृजन कैसे हो रहा था ।

अब तक हमने संगठित क्षेत्र के रोजगार पर ही चर्चा की है। असंगठित छोटे निर्माताओं को आउटपुट और रोज़गार दोनों में बड़ा नुक्सान झेलना पड़ा है। असंगठित क्षेत्र में रोजगार की संख्या का आकलन करना मुश्किल है, लेकिन अर्थशास्त्री एकमत हैं की संगठित और असंगठित क्षेत्रों में एक पारस्परिक संबंध है, वे विपरीत दिशाओं में नहीं जा सकते। सरकार ने अक्सर दावा किया है कि असंगठित क्षेत्र की नौकरियां आम तौर पर संगठित क्षेत्र की नौकरियों से ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। यह साबित करने के लिए कोई वास्तविक डेटा उपलब्ध नहीं है ओर इसके अलावा संगठित क्षेत्र में रोजगार वृद्धि चार वर्षों में 70% से अधिक धीमी हो गई है, तो यह संभव नहीं है कि असंगठित क्षेत्र की नौकरियां, जो कुल श्रमिक बाजार में 85% से अधिक का गठन करती हैं उनमे मजबूत वृद्धि हुई हो। जाहिर है यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता साबित करती है।

हालांकि, यह सब विश्वास और भरोसे  के दायरे में है, विभिन्न दावों का समर्थन करने के लिए बहुत कम आंकड़े हैं। चुनावो में मिली जीत का इस्तेमाल भू-वास्तविकताओं से इंकार करने के लिए नहीं किया जा सकता।

स्रोत: दा वायर

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