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मौलाना अहमद बुख़ारी के ख़िलाफ़ वारंट

फ़ौजदारी के एक मुक़द्दमे में दिल्ली की एक अदालत ने जामा मस्जिद के शाही मौलाना सैयद अहमद बुख़ारी के ख़िलाफ़ नाक़ाबिल ज़मानत वारंट जारी करते हुए पुलिस को हिदायत दी है कि उन्हें 17 जुलाई तक गिरफ़्तार करके अदालत में पेश कर दिया जाय।

फ़ौजदारी के एक मुक़द्दमे में दिल्ली की एक अदालत ने जामा मस्जिद के शाही मौलाना सैयद अहमद बुख़ारी के ख़िलाफ़ नाक़ाबिल ज़मानत वारंट जारी करते हुए पुलिस को हिदायत दी है कि उन्हें 17 जुलाई तक गिरफ़्तार करके अदालत में पेश कर दिया जाय।

ये हुक्म पहले भी जारी किया गया था जिस पर अमल ना करने पर दिल्ली पुलिस पर नुक्ता चीनी करते हुए मीटर पोलीटन मजिस्ट्रेट राजिंदर सिंह ने ताज़ा वारंट पिछले हफ़्ता जारी किया है, जिस की नक़ल मीडीया को अब दस्तयाब हुई है।

मीडीया के मुताबिक़ मजिस्ट्रेट ने वारंट जारी करते हुए कहा कि क़ानूनी गुंजाइशों के मुताबिक़ शाही इमाम को इश्तिहारी मुजरिम क़रार दीए जाने की कार्रवाई की जा सकती थी लेकिन ऐसा नहीं किया गया क्योंकि इस तरह क़ानून के इख्तेयार को गज़ंद (दुख/ तकलीफ) पहुंचता।

लोधी कॉलोनी पुलिस थाने में दर्ज एफ़ आई आर में इल्ज़ाम लगाया गया था कि शाही इमाम और दो लोगों ने सरकारी मुलाज़मीन को उन की ज़िम्मेदारी अदा करने से रोका, उन पर हमला किया और फ़साद बरपा ( कायम) किया।

मुबय्यना ( उक़्त) वाक़िया 3 सितंबर 2001 का है जब पुलिस और बलदियाती अफ़िसरों ने लोधी कॉलोनी में सी जी ओ कम्पलेक़्स के क़रीब एक मुबय्यना क़ब्ज़े को हटाने की कोशिश की थी। इस मौके़ पर शाही इमाम के दोनों साथीयों को तो गिरफ़्तार कर लिया गया था।

उन्हें इसलिए नहीं पकड़ा गया कि अमन-ओ-अमान का मसला खड़ा हो सकता है। बादअज़ां फ़र्द-ए-जुर्म ( अपराध सूची) में उन्हें मुल्ज़िम (आरोपी) तो बनाया गया लेकिन गिरफ़्तार नहीं किया गया।

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