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मौलाना आज़ाद की चाय नोशी: …….हाय कम्बख़्त, तू ने पी ही नहीं!

लाहौर में एक पार्टी में मौलाना अबुल कलाम आजाद (बाएं) और सर सिकन्दर हयात खान (दाएं) तस्वीर- फ्रंटलाइन पत्रिका

अब्दुल क़ादिर सिद्दीक़ी

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने चाय पी और ख़ूब पी। उनकी चाय नोशी का ज़ौक़ और शौक़ लतीफ़ नहीं निहायत लतीफ़ था। चाय से उन्हें रग़बत ही नहीं इश्क़ था। जिसका वालहाना और दिलबराना अंदाज़ में इज़हार उन्होंने अपनी तहरीरों में जा-ब-जा किया है। चाय हम-आप रोज़ पीते हैं और पिलाते भी हैं। लेकिन हमारे नज़दीक चाय के बेहतर-से-बेहतर होने का मयार क्या होता है?

बस यही ना कि चाय में दूध की मिक़दार ज़्यादा-से-ज़्यादा हो, चाय गाढ़ी हो, ना बहुत मीठी हो और ना फीकी हो। और इतनी गर्म हो कि चुस्की ले के पिया जा सके। लेकिन मौलाना आज़ाद की चाय का मयार हमारी और आपकी चाय से बिलकुल मुख़्तलिफ़ था। जो चाय हम-आप रोज़ पीते और पिलाते हैं इसे आज़ाद सिरे से चाय ही नहीं मानते थे। वो इस मुआमले में हम आपसे फ़ुरूई नहीं उसूली (बुनियादी) इख़्तिलाफ़ रखते थे। इस इख़्तिलाफ़ को उन्होंने ख़ुद ही बयान किया है- “चाय के बाब में अब्नाए ज़माना (ज़माना के लोगों) से मेरा इख़्तिलाफ़ सिर्फ़ शाख़ों और पत्तों के मामले में ही नहीं हुआ कि मुफ़ाहमत (समझोते) की सूरत निकल सकती, बल्कि सिरे से जुड़कर हुई यानी इख़्तिलाफ़ फ़रा (किसी मूल का कोई अंश) का नहीं उसूल का है। मैं चाय को चाय के लिए पीता हूँ लोग शकर और दूध के लिए पीते हैं। मेरे लिए वो मक़सद में दाख़िल हुई उनके लिए वसाइल (साधन) में। ग़ौर फ़रमाईए मेरा रुख़ किस तरफ़ है और ज़माने का किस तरफ़।” (ग़ुबार-ए-ख़ातिर,प.स. 130)

इस उसूली इख़्तिलाफ़ की मज़ीद उल्लेख करते हुए  आज़ाद तारीख़ी हवालों का सहारा ले कर कहते हैं “चाय चीन की पैदावार है और चीनियों के बयान के मुताबिक़ पंद्रह सौ बरस से क़बल से इस्तेमाल की जा रही है। मगर वहां उनके ख़ाबों ख़्याल में भी ये बात नहीं गुज़री कि इस जोहर-ए-लतीफ़ को दूध की कसाफ़त से आलूदा (गंदा) कर दिया जाएगा। मगर 17वीं सदी में जब अंग्रेज़ इससे आश्ना हुए तो नहीं मालूम उन लोगों को क्या सूझी कि उन्होंने दूध मिलाने की बिदअत ईजाद की। चूंकि हिन्दोस्तान में चाय का रिवाज़ उन्हीं के ज़रिए हुआ इसलिए ये बिदअत यहां भी फैल गई।”

इस तारीख़ी दलील के बाद चाय में दूध मिलाने वाले या दूध वाली चाय नोशी करने वालों का मज़ाक मौलाना कुछ इस तरह उड़ाते हैं; “लोग चाय की जगह एक स्याल (द्रव) हलवा बनाते हैं और खाने की जगह पीते हैं, और ख़ुश होते हैं कि हमने चाय पी ली। इन नादानों से कौन कहे “हाय कम्बख़्त तू ने पी ही नहीं’’।

हिन्दोस्तान की काली या लाल चाय को आज़ाद जोशांदा से ताबीर करते हैं। वो इस ताल्लुक़ से लिखते हैं “वह चीनी चाय जिसका मैं आदी था कई दिन हुए ख़त्म हो गई। मजबूर हिन्दोस्तान उसी पत्ती का जोशांदा पी रहा हूँ जिसे लोग चाय के नाम से पुकारते हैं और दूध डालकर उसका गर्म शर्बत बनाया करते हैं।

आज़ाद इतने पर ही नहीं रूकते बल्कि अंग्रेज़ों की चाय नोशी के शौक़ का कुछ इस अंदाज़ में मज़ाक़ उड़ाते हैं- “उन्होंने (अंग्रेज़) चीन से चाय पीना तो सीख लिया मगर और कुछ ना सीख सके। अव्वल तो हिन्दोस्तान और सिलोन (श्रीलंका) की स्याह पत्ती उनके ज़ौक़े चाय नोशी का मुंतहाए कमाल हुआ। फिर क़ियामत ये कि इस में भी ठंडा दूध डाल कर यकक़लम गंदा कर देंगे। मज़ीद-सितम ज़रीफ़ी देखिए इस गंदे मशरूब की मेयार संजियों के लिए माहिरीने फ़न की एक फ़ौज हमेशा मौज़ूद रहती है। कोई इन ज़याकारों से पूछे कि अगर चाय नोशी से मक़सूद इन्हीं पत्तियों को गर्म पानी में डाल कर पी लेना है, तो उसके लिए माहिरीने फ़न की दक़ीक़ा संजियों की क्या ज़रूरत है?” (ग़ुबार-ए-ख़ातिर, प. स. 225)

मौलाना आज़ाद की चाय नोशी का मेयार ही इतना अर्फ़ा-ओ-आला था कि उनके इस मज़ाक़ का दूसरा कोई रफ़ीक़ मिलना मुश्किल है। क़िला अहमद नगर जेल में उनके साथ जो सयासी रहनुमा क़ैद थें उनमें से एक भी आज़ादाना चाय के ज़ौक़ो-शौक़ के आदी नहीं थें। मौलाना इसकी शिकायत अपने मख़सूस अंदाज़ में कुछ इस तरह करते हैं- “यहां हमारी ज़िंदानियों (कैदियों) के क़ाफ़िले में इस जिन्स का सनाशा कोई नहीं है। अक्सर हज़रात दूध और दही के दीवाने हैं, और आप समझ सकते हैं कि दूध और दही की दुनिया चाय की दुनिया से कितनी दूर मौजूद है। उमरें गुज़र जाएं फिर भी ये मुसाफ़त तय नहीं हो सकती। कहाँ चाय की ज़ौक़ लतीफ़ का शहरीस्तान कैफ़-ओ-सरुर और कहाँ दूध और दही की शिकम परवरी। (ग़ुबार-ए-ख़ातिर,प.स. 228)

हमारी और आपकी चाय नोशी पर ये तीखी मगर दिलचस्प तन्क़ीद अपनी जगह मगर आपके ज़हन में ये सवाल गर्दिश कर रहा होगा कि मौलाना किस किस्म की चाय पीते थे? तो लीजिए सुनिए उनकी ज़बानी कि वो कौन-सी चाय पीते थे- “एक मुद्दत से जिस चीनी चाय का आदी हूँ वो व्हाइट जास्मिन कहलाती है। यानी यासमीनसफ़ैद या ठेठ उर्दू में यूं कहीए कि गौरी चम्बेली। उसकी ख़ुशबू जितनी लतीफ़ है इतना ही तुंद-ओ-तेज़ है। रंग की निसबत क्या कहूं लोगों ने आतिश-ए-सैयाल (पिघली आग) से ताबीर किया है।”

इसके साथ ही मौलाना अपनी पसंदीदा चाय के रंग-ओ-रूप और निखार को तख़य्युल और तसव्वुर का जामा पहनाकर यूं बयान करते हैं- “लेकिन आग का तख़य्युल फिर अर्ज़ी ( दुनियावी) है और इस चाय की ख़ूबी कुछ और चाहती है। मैं सूरज की किरनों को मुट्ठी में बंद करने की कशिश करता हूँ और कहता हूँ कि यूं समझिए जैसे किसी ने सूरज की किरने हल्की कर बिलौरी फिंजान (शीशे की छोटी प्याली) में घोल दी हो। (ग़ुबार-ए-ख़ातिर, प.स. 227)

इस चीनी या गौरी चम्बेली के इलावा सब्ज़ चाय के भी ख़ूगर थे। ग़ुलाम रसूल महर को लिखे अपने ख़त में सब्ज़ चाय (ग्रीन टी) की फ़र्हत बख़शी का ज़िक्र उन्होंने इस अलफ़ाज़ में किया है- “इस वक़्त तीन बज चुके हैं। आला दर्जे की सबज़ चाय का फिंजान सामने धरा है। जो एक जापानी दोस्त ने हाल ही में भेजा है। आपको ख़त लिख रहा हूँ और सोच रहा हूँ कि अगर ऐसी चाय के फिंजान मयस्सर हो तो फिर कौन-सी नेमत बाक़ी रह जाती है जिसकी इंसान ख़ाहिश करे? मेरे लिए यही चाय सहरी की सुबूही भी है और इफ़तारका जाम ख़ुमार शिकन भी।” (नक़्श आज़ाद, प.स. 114-115)

ख़ैर ये तो रमज़ान का मामला था मगर साल भर तो रमज़ान होता नहीं! फिर बक़ीया दिनों में उनकी चाय-नोशी का मामूल क्या था और कौन-सा वक़्त सबसे बेहतर था? ये उन्होंने ग़ुबार-ए-ख़ातिर में बड़े दिलचस्प अंदाज़ मं मौलाना शेरवानी को लिखा है कि आपको मालूम है कि मैं हमेशा सुबह तीन से चार बजे के बीच उठता हूँ और चाय किए पैहम (लगातार) फिंजानों से जाम सुबूही का काम लिया करता हूं। ये वक़्त हमेशा मेरे औक़ात ज़िंदगी का सबसे ज़्यादा पुरकैफ़ वक़्त होता है। लेकिन क़ैदख़ाने की ज़िंदगी में तो इसकी मस्तियाँ और ख़ुद फ़रामोशियाँ एक दूसरा ही आलम पैदा कर देती हैं। यहां कोई आदमी ऐसा नहीं होता जो उस वक़्त ख़्वाब आलूद आँख लिए उठे और क़रीने से चाय बना के मेरे सामने धरे। इसलिए ख़ुद अपने ही दश्त शौक़ की सरगर्मीयों से काम लेना पड़ता है। मैं इस वक़्त बादा कुहन के शीशा की जगह चीनी चाय का ताज़ा डिब्बा खौलता हूँ और माहिर-ए-फ़न की दक़ीक़ा संजियों के साथ चाय दम देता हूँ।”

ये तो मालूम हो गया कि व्हाइट जैसमीन हो या सबज़ चाय आज़ाद चीनी पीते थे। पर अब सवाल यह उठता है कि फिर वो चीनी कितनी लेते होंगे? तो शायद आपको यह जान कर ताज्जुब होगा कि इतनी मीठी और दिलचस्प बातें करने वाला मौलाना आज़ाद मिठास से कोसों दौर था। वो चाय में चीनी बुरा-ए-नाम लेते थें। इस ताल्लुक़ से वो ख़ुद ही लिखते हैं कि जहां तक मिठास का ताल्लुक़ है उसे मेरी महरूमी समझिए या तल्ख़-कामी (तीखापन) कि मुझे मिठास के ज़ौक़ का बहुत कम हिस्सा मिला। मैं ना सिर्फ चाय बल्कि किसी भी चीज़ में ज़्यादा मिठास गवारा नहीं कर सकता। उनका ये भी मानना था कि चाय का मिज़ाज बहुत लतीफ़ और नाज़ुक होता है। उसमें आम शकर डालने से चाय के रंग और मज़ा दोनों पर असर पड़ता है। वो लिखते हैं कि चाय का मामला दूसरी चीज़ों से बिलकुल मुख़्तलिफ़ होता है। उसे हलवे पर क़ियास नहीं बनाना चाहिए। इसका मिज़ाज इस क़दर लतीफ़ और बेमेल है कि कोई भी चीज़ जो ख़ुद उसकी तरह साफ़ और लतीफ़ ना होगी फ़ौरन उसको खराब कर देगी। (ग़ुबार-ए-ख़ातिर, प.सं. 222)

मौलाना के चाय-नोशी का अंदाज़ बहुत निराला था। उन्होंने अपने चाय-नोशी के मख़सूस अंदाज़ को बड़ी दिलकशी के साथ बयान किया है- “आपको मालूम है कि मैं चाय के लिए रूसी फिंजान को काम में लाता हूं। ये चाय की मामूली पयालियों से बहुत छोटे होते हैं। अगर बे-ज़ौक़ी के साथ पी जाए तो दो घूँट में ख़त्म हो जाए। मगर ख़ुदा-न-ख़्वास्ता मैं ऐसी बदज़ौक़ी का मुर्तक़िब (जुर्म करने वाला) क्यों होने लगा? मैं ठहर-ठहर कर पियूंगा और छोटे-छोटे घूंट लूंगा। फिर जब पहला फिंजान ख़त्म हो जाएगा तो कुछ देर के लिए रुक जाऊंगा। इस दरमयानी मुद्दत को इम्तादाद-ए-कैफ़ (आनंद) की लिए जितना तूल दे सकता हूं, तूल दूंगा। फिर दूसरे और तीसरे के लिए हाथ बढ़ाऊंगा। दुनिया को और इसके सारे सूद ज़ियाँ (नफा-नुक़सान) को यकक़लम (बिलकुल) फ़रामोश कर दूंगा। (ग़ुबार-ए-ख़ातिर, प. स. 64-65)
लेखक मौलाना आज़ाद नैशनल उर्दू यूनीवर्सिटी में मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज़्म के पी.एच.डी रिसर्च स्कॉलर हैं

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