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यूपी चुनाव: कांग्रेस- सपा गठबंधन से अल्पसंख्यक वोटों के लिए मायावती चिंतित

लखनऊ। चुनाव आयोग की ओर से अखिलेश यादव गुट को असली समाजवादी पार्टी (सपा) ठहराये जाने और सपा के कांग्रेस से गंठबंधन तय होने के बाद राज्य की चुनावी तसवीर पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ेगा। प्रदेश में प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों भाजपा और बसपा को अपनी रणनीति में रद्दोबदल करनी पड़ सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा और बसपा की निगाहें सपा में चल रहे अंदरुनी झगड़े पर टिकी थीं। परंपरागत रूप से मुसलमानों द्वारा समर्थित पार्टी मानी जानेवाली सपा में जारी कलह का फायदा उठाने की कोशिश कर रही बसपा खुद को भाजपा को रोकने की क्षमतावाली एकमात्र पार्टी के रूप में पेश कर मुसलमानों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही थी।

दूसरी ओर, भाजपा भी सपा में झगड़े की शक्ल बदलने के साथ-साथ रणनीति भी बदल रही थी। हालांकि उसका ज्यादातर जोर कानून-व्यवस्था को खराब ठहराने और विकास का पहिया रूक जाने के आरोप लगाने पर ही रहा। हालांकि अब हालात बदल गये हैं। अब बसपा और भाजपा को रणनीति में जरूरी बदलाव करने पड़ेंगे।

बसपा ने तो इसकी शुरुआत भी कर दी है. बसपा के राष्ट्रीय महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने मंगलवार को लखनऊ में प्रमुख शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद से मुलाकात की। कहा कि अगर प्रदेश में बसपा की सरकार बनेगी, तो किसी से नाइंसाफी नहीं होने दी जायेगी।

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