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यूपी चुनाव में कांग्रेस और सपा का गठबंधन लगभग तय

उत्तर प्रदेश चुनाव में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के हाथ मिलने वाले हैं यह करीब-करीब तय हो चुका है. दोनों पार्टियों के बीच बातचीत आखिरी दौर में है और सीटों के बंटवारे पर बात अटकी हुई है. कांग्रेस सौ सीट मांग रही है और समाजवादी पार्टी ने पचास सीट का ऑफर दिया है. यह गठबंधन दोनों ही पार्टी के लिए वक्त की जरूरत है. अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ गठबंधन कर उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाताओं को यह संदेश देना चाहते हैं कि उनका गठबंधन बड़ा है इसलिए वे ही भाजपा को टक्कर दे सकते हैं. उन्हें डर है कि लोकसभा चुनाव की तरह अगर इस बार मुस्लिम मतदाताओं का वोट समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में बंटा तो भाजपा बीच से निकलकर जीत सकती है.

कांग्रेस को भी इस गठबंधन में फायदा दिख रहा है. 27 साल से लखनऊ की सत्ता से बाहर रही कांग्रेस इस बार पूरी ताकत लगा रही है. उसने प्रशांत किशोर जैसे चुनाव प्रबंधक को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी है. उनके सुझाव पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पूरे प्रदेश में किसान यात्रा शुरू की, शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया गया और राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन इतनी तैयारी के बाद भी कांग्रेस का आंतरिक सर्वे बहुत ही निराशाजनक तस्वीर पेश कर रहा है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि पार्टी के अपने सर्वे का नतीजा कहता है कि अगर यूपी में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ी तो चौथे नंबर पर रहेगी और उसे पच्चीस से भी कम सीटें मिलेंगी. इसके बाद प्रशांत किशोर ने ही यह आइडिया प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को दिया कि बिहार की तरह ही उत्तर प्रदेश में बड़ा गठबंधन तैयार किया जाए.

राहुल की शर्त थी कि वे मुलायम सिंह या शिवपाल यादव के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. इसलिए कांग्रेस ने सबसे पहले समाजवादी पार्टी के परिवार में झगड़े थमने का इंतजार किया. जब यह साफ हो गया कि समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव के ही नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी तो प्रशांत किशोर अखिलेश यादव और मुलायम सिह यादव से मिले. इसके बाद कांग्रेस ने सौ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की मांग की. सुनी-सुनाई है कि समाजवादी पार्टी की तरफ से कहा गया कि कांग्रेस को वे 29 सीटें तो आसानी से मिल जाएंगी जहां से वह पिछली बार जीती थी लेकिन उसे वे सभी सीटें मिलना मुश्किल है जिनपर वह पिछली बार नंबर दो पर रही थी. 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 31 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी. अब कांग्रेस चाहती है कि ये सीटें भी उसे मिल जाएं.

दरअसल इन दो नंबर वाली 31 में से आधी से ज्यादा सीटों पर पिछले चुनाव में समाजवादी पार्टी के विधायक जीते हैं. ऐसे में वह अपने इतने सिटिंग विधायकों के टिकट कैसे काट सकती है! इसलिए अब बीच का रास्ता निकाला जा सकता है. दोनों ही पार्टी के नेताओं के मुताबिक गठबंधन होना तो करीब-करीब तय है और अब इस पर आखिरी फैसला अखिलेश यादव और राहुल गांधी को करना है. इसीलिए समाजवादी पार्टी के घोर विरोधी रहे राज बब्बर के सुर भी अब बदल गए हैं. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह कहा है कि फिरोज़ाबाद सीट से अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को चुनाव हराना उनकी गलती थी और वे इसके लिए माफी मांगते हैं. इस बयान का मतलब है कांग्रेस के नेता अब समाजवादी से दोस्ती के राह पर चल पड़े हैं. कांग्रेस अब बस इतना चाहती है कि उसे इतनी सीटें मिल जाएं कि पार्टी की इज्जत बची रहे.

सुनी-सुनाई यह भी है कि अखिलेश यादव को लगता है कि अगर 403 में से वे कांग्रेस को सत्तर अस्सी सीट दे भी देते हैं फिर भी उनके पास अपनी तीन सौ से ज्यादा सीटें होंगी. अगर कांग्रेस के आने से उनके पक्ष में माहौल बना तो वे सिर्फ इतनी ही सीटों पर लड़कर भी आसानी से अपनी सरकार बना सकते हैं. इसलिए अखिलेश भी बार-बार सार्वजनिक तौर पर कह रहे हैं कि अगर गठबंधन हुआ तो वे तीन सौ सीटें जीतेंगे. राहुल गांधी के लिए यह गठबंधन 2019 के चुनाव के लिए भी एक मौका है. अगर उनका गठबंधन जीता तो उत्तर प्रदेश में भले ही अखिलेश मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन 2019 के चुनाव के लिए कांग्रेस को समाजवादी पार्टी जैसा मजबूत साथी मिल जाएगा.

बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में अगर यह प्रयोग सफल रहा तो पूरे देश में मोदी के खिलाफ हवा बनेगी. राहुल और प्रियंका गांधी इस एजेंडे पर काम कर रहे हैं कि जहां वे नरेंद्र मोदी को अकेले नहीं हरा सकते वहां गठबंधन बनाकर हराएं, लेकिन हराएं जरूर. भले ही उस गठबंधन में कांग्रेस छोटी पार्टी ही हो क्योंकि ये छोटी-छोटी जीतें 2019 में बड़ी जीत का माहौल बना सकती हैं.

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