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यूपी चुनाव में मुस्लिम वोटरों का रुख क्या होगा?

लखनऊ। यूपी चुनाव से पहले बरेली, रामपुर, अलीगढ़, मुजफ्फरनगर, देवबंद और आजमगढ़ में मुस्लिम मतदाताओं की नब्ज टटोलने पर पता चला कि उनके लिए इस्लाम का सम्मान, विधानसभा में बेहतर प्रतिनिधित्व और नोटबंदी सबसे बड़े चुनावी मुद्दे हैं। मुस्लिम मतदाताओं का रुझान भाजपा की ओर नहीं दिख रहा।

वहीं, राज्य में हाल के सियासी समीकरणों के मद्देनजर सपा और बसपा को लेकर भी उनमें भ्रम की स्थिति है। बरेली के मोहनपुर गांव में एसी मैकेनिक महताब कहते हैं, ‘मैं अखिलेश यादव को वोट दूंगा। उन्होंने राज्य में काफी विकास किया है।’ वहीं, आजमगढ़ के लालगंज में मौलाना मोहम्मद शरवर के मुताबिक सत्तारूढ़ पार्टी में लंबी कलह के बाद अब वह सपा छोड़कर बसपा का साथ देना चाहते हैं।

हिंदुस्तान लाइव पर छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अलीगढ़ के मुफ्ती मोहम्मद खालिद हामिद मोदी सरकार की नीतियों से असहमत हैं। साथ ही कहते हैं, ‘पीएम नरेंद्र मोदी दिल्ली की सत्ता पर काबिज हैं। हमारी उनसे कोई निजी दुश्मनी नहीं है। लेकिन जम्हूर्रियत में मजबूत विपक्ष का होना बेहद जरूरी है।’

दारूल उलूम देवबंद के एक वरिष्ठ मौलवी ने कहा,‘यूपी में भाजपा को हराना अहम है, लेकिन पार्टी, प्रत्याशी और गांव के समीकरण भी खासे मायने रखते हैं। अगर सभी मुस्लिम एकजुट होकर वोट करते तो यूपी लोकसभा चुनाव में इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं करती और न ही कभी यूपी में सरकार बना पाती।’

मालूम हो कि चुनाव इतिहास में पहली बार 2014 में यूपी से एक भी मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा तक का सफर नहीं तय कर पाया था। यह स्थिति तब थी, जब 2012 में विधानसभा में सर्वाधिक 63 मुस्लिम प्रतिनिधि पहुंचे थे। राज्य में नोटबंदी भी मुस्लिम वोटरों का रुझान तय करने वाले एक कारकों में शामिल है। अलीगढ़ की मजदूर मंडी में काम करने वाले राशिद कहते हैं, ‘मुझे मोदी से कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं यह जानता हूं कि उनके नोटबंदी के फैसले से मेरा काम चौपट हो गया है।

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