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यू पी के मुबय्यना मुस्लिम दहशतगऱ्दों की रिहाई की रियास्ती हुकूमत की कोशिश

रियास्ती एसेंबली के इंतिख़ाबात में अपने इंतिख़ाबी मंशूर में समाजवादी पार्टी ने रियासत के मुसल्मानों को यकीन‌ दिया था कि बरसर-ए-इक़तिदार आने पर मुबय्यना मुस्लिम दहशतगर्दों के ख़िलाफ़ अगर अभी तक अदालतों में ठोस और पुख़्ता सबूत दाख़िल नहीं किए गए तो उन पर से मुक़द्दमात वापिस लेने के क़ानूनी इक़दाम करेगी।

वज़ीर-ए-आला अखिलेश यादव ने इस सिम्त में क़दम उठाए और निस्फ़ दर्जन ऐसे मुबय्यना मुस्लिम दहशतगर्दों को मुताल्लिक़ा जिले के ओहदेदारों की रिपोर्ट की बुनियाद पर रिहा किराए यानी उन पर से मुक़द्दमात वापिस लेने के लिए रियास्ती हुकूमत ने एक मुरासला भी जारी कर दिया।

हुकूमत के इस मुरासला को बारह बनकी के एडीशनल ज़िला‍ ओ‍ सेशन जज ने बाअज़ तकनीकी बुनियादों पर रद‌ कर दिया और मुल्ज़िमीन की रिहाई की तमाम राहें बंद करदें। अखिलेश यादव के बज़ाहिर इस अच्छे काम की सताइश के बजाय बाअज़ मुस्लिम तंज़ीमों, लीडरों ने हुकूमत की नीयत पर शक-ओ-शुबहात ज़ाहिर किए और कहा कि हुकूमत नहीं चाहती कि बेक़सूर मुस्लिम नौजवान रिहा किए जाएं।

हाईकोर्ट में रियास्ती हुकूमत की जानिब से कहा गया कि वो इन मुबय्यना मुस्लिम दहशतगर्दों को रिहा करना चाहती है और ये रियास्ती हुकूमत के दायरा इख़तियार में है जिस को चैलेंज नहीं किया जा सकता। निमेश कमीशन के मुताबिक‌ मौलाना ख़ालिद मुजाहिद 15 दिसम्बर और हकीम तारिक़ क़ासिमी को एस टी एफ़ ने 2008 में गिरफ़्तार किया था लेकिन 22 दिसम्बर 2008 को बारह बनकी रेलवे स्टेशन पर धमाका ख़ेज़ अशिया के साथ गिरफ़्तारी दिखाई थी।

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