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ये, ज़कात और रमज़ान पैकेज की तक़सीम है या फिर रयाकारी

अबू ऐमल - शहर में माह रमज़ान उल-मुबारक के दौरान अपने ग़रीब भाईयों और बहनों की मदद के लिए कई मालदार-ओ-दौलतमंद हज़रात और मुख़्तलिफ़ तंज़ीमों की जानिब से रमज़ान पैकेज की तक़सीम अमल में आती है। इस पैकेज में चावल, दाल, शक्कर और तेल होता ह

अबू ऐमल – शहर में माह रमज़ान उल-मुबारक के दौरान अपने ग़रीब भाईयों और बहनों की मदद के लिए कई मालदार-ओ-दौलतमंद हज़रात और मुख़्तलिफ़ तंज़ीमों की जानिब से रमज़ान पैकेज की तक़सीम अमल में आती है। इस पैकेज में चावल, दाल, शक्कर और तेल होता है। अगरचे फ़लाही-ओ-ख़ैराती (कल्याणकारी) तंज़ीमें बहुत ही मुनज़्ज़म (अच्छे) और बड़े पैमाने पर ग़रीब ख़ानदानों में अनाज तक़सीम करती हैं लेकिन ज़्यादा तर मालदार हज़रात रमज़ान पैकेज और ज़कात तक़सीम करते हैं, जैसे वो अपनी ग़रीब माओं और बहनों पर एहसान कर रहे हों जबकि ये है कि उन साहेबीन पर ज़कात लेते हुए या रमज़ान पैकेज हासिल करते हुए ये ग़रीब ख्वातीन एहसान कर रही हैं। पुराना शहर के एक मुहल्ला में वहां के बाअसर और दौलतमंद साहिब ने रमज़ान उल-मुबारक की आमद से तीन दिन कब्ल मस्जिद से और फिर अपने हव्वारियों के ज़रीया भी ऐलान करवाया गया उन के मकान पर रमज़ान पैकेज की तक़सीम-ए-अमल में आएगी, लेकिन सिर्फ ख्वातीन ही आकर टोकन लें, जिस के बाद वो चावल, दाल, शुक्र वग़ैरा हासिल कर सकेंगी। इन ऐलानात के साथ ही मौसूफ़ के मकान पर 1500-2000 ख्वातीन जमा हो गईं।

ख्वातीन सुबह 6 बजे ही वहां पहूंच गईं और अफ़सोस कि शाम 5 बजे टोकन देने का ऐलान किया गया। ख्वातीन की तवील क़तार को कंट्रोल करने के लिए मर्द हज़रात हाथों में लाठीयां लिए इंतिज़ाम में मसरूफ़ थे। अगर कोई औरत धक्कम पेल की वजह क़तार से बाहर आजाती तो ये ताक़तवर मर्द इस बदनसीब ख़ातून का हाथ पकड़ कर ये कहते हुए बाहर निकाल देते कि चल पीछे जा लाईन में घुसने की कोशिश कर रही है। इन साहिब इस्तिताअत ने इंतिज़ामात के लिए एक महिला मंडल से ताल्लुक़ रखने वाली औरतों को भी रखा था। ये ऐसी औरतें हैं जो अक्सर-ओ-बेशतर पुलिस स्टेशन को आया जाया करती हैं। ये औरतें भी क़तार में ठहरी हुई ग़रीब ख्वातीन पर कंट्रोल के लिए अपना पूरा ज़ोर लगा रही थीं। बेचारी ग़रीब मुस्लिम ख्वातीन बड़ी तकलीफ़ में घंटों ठहरी यही सोच रही थीं कि कुछ भी हो जाए घर ख़ाली हाथ वापिस नहीं जाएंगी। इन ख्वातीन का बुरा हाल था जिन के गोदों में मासूम-ओ-शीरख़वार बच्चे थे। हम ने क़तार में ठहरी हुई ख्वातीन से बात की। ज़ुबेदा नामी ख़ातून के ख़्यालात जान कर हमें बहुत अफ़सोस हुआ।

इस ने इंतिहाई ग़मज़दा लहजा में बताया, मेरे शौहर होटल में वेटर है, मुझे तीन बच्चे हैं। दो को घर पर छोड़कर आई हूँ। गोद में मौजूद बच्चा दूध मांग रहा है और मैं उसे पानी पिला रही हूँ। अगर मैं लाईन से हट गई तो फिर पीछे जाना पड़ेगा। आप देखो भाई मेरा बच्चा भूक से तड़प तड़प कर सो गया है। ज़ुबेदा के इन अलफ़ाज़ ने जैसे हमारे दिल-ओ-जिगर पर ख़ंजर चला दिए। हम ने बड़े ही रंज-ओ-ग़म के साथ एक और ख़ातून ख़दीजा बी से बात की। उन्हों ने बताया सुबह से खड़ी हूँ इस उम्मीद में कि टोकन मिल जाएगा। मेरे शौहर घर पर बीमार पड़े हैं। बच्चों को भी घर पर छोड़कर आई हूँ। पता चला कि आज टोकन देंगे और किसी दिन राशन देंगे। फ़र्ज़ाना नामी ख़ातून ने बताया कि ये बड़े लोग औरतों को क्यों बुलाते हैं। एक मुक़ाम पर तो दौलत के नशा में एक साहिब ने तो हद कर दी। एक तरह से राशन तक़सीम करते हुए ग़रीबों की ग़ुर्बत का मज़ाक़ उड़ाया। इन साहिब जहां राशन की तक़सीम अमल में लाई वहां अनाज तक़सीम करने के काउंटर के बाज़ू लाल रंग का एक बड़ा सा डिब्बा रखा गया था। राशन हासिल करने वाली ख्वातीन के एक हाथ में राशन होता और उन्हें दूसरे हाथ को डिब्बा में डाल कर निकालना पड़ता, जिस से पूरा हाथ रंग जाता।

क्या ये ग़रीबों का मज़ाक़ उड़ाने का अंदाज़ नहीं। जब एक ग़रीब ख़ातून अपने रंगे हाथों के साथ मुहल्ला या ख़ानदान में जाएगी तो लोगों को इस बात का पता नहीं चलेगा कि इस ने ज़कात या ख़ैरात हासिल की है। क्या ज़कात इस अंदाज़ में रयाकारी और जुल्म ढाते हुए अदा की जाती है? जबकि हमारे प्यारे नबी सल्ललल्लाह अलैहि वालिह वसल्लम ने ग़रीबों की मदद और उन का एहतिराम करने की बार बार तलक़ीन (ताक़ीद) की है और ख़ैरात के बारे में ये कहा गया है कि एक हाथ से दें तो दूसरे हाथ को पता ना चले जबकि हमारे कुछ ना समझ भाई ज़कात या अनाज की तक़सीम को दौलत-ओ-ताक़त के मुज़ाहरा के ज़रीया बना चुके हैं। उन्हें मालूम होना चाहीए कि उम्मुल मोमेनीन हज़रत बीबी आईशा सिद्दीक़ा जब कभी अल्लाह की राह में रक़म ख़र्च करतीं तो इस रक़म पर ख़ुशबू लगातीं। दरयाफ़त करने पर कहती कि मैं अल्लाह की राह में दूं तो ऐसे कैसे देदूं। अक्सर देखा जाता है कि घरों के सामने क़तारें लगा कर, बिल्डिंग्स पर लाउड स्पीकरस के ज़रीया ऐलान करते हुए लुंगियां, साड़ियां और अनाज तक़सीम किया जाता है। क़तारों में ख्वातीन को घंटों ठहरने पर मजबूर करना, हाथों को रंग देना, धक्के दे कर क़तार से निकाल देना ये कहां तक दरुस्त है।

चंद लोगों को हम ने देखा कि वो मुहल्ला मुहल्ला जाकर ग़रीब ख़ानदानों का पता लगा कर उन के घर पर टोकन दे रहे हैं और बड़ी ख़ामोशी से अनाज की तक़सीम अमल में ला रहे हैं। इसी तरह मस्जिद का रिकार्ड देख कर भी अनाज तक़सीम किया जा रहा है। अल्लाह के लिए एक ऐसा निज़ाम (नियम) बनाईं जिस के तहत ज़कात और अनाज की तक़सीम भी हो जाए और किसी की दिल आज़ारी भी ना हो और किसी को तकलीफ़ भी ना पहूंचे। साथ ही पड़ोसीयों को एहसास तक ना हो सके कि फ़लां ख़ातून ज़कात लेकर आई है। वो तो अपने मुक़द्दर का लेकर आई है, तक़सीम करने वाले तो एक ज़रीया ……..

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