Thursday , October 19 2017
Home / Featured News / रबी-उल-अव्वल और मुसलमानों का तर्जेअमल

रबी-उल-अव्वल और मुसलमानों का तर्जेअमल

अब से तकरीबन बीस सौ बरस पहले जबकि दुनिया जुल्मात के दरिया में गर्क थी और रूहानियत शैतानियत से मगलूब हो रही थी, अल्लाह तआला ने अपने आखिरी नबी और महबूब तरीन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को दुनिया में भेजा ताकि आप नूरे हिदायत स

अब से तकरीबन बीस सौ बरस पहले जबकि दुनिया जुल्मात के दरिया में गर्क थी और रूहानियत शैतानियत से मगलूब हो रही थी, अल्लाह तआला ने अपने आखिरी नबी और महबूब तरीन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम को दुनिया में भेजा ताकि आप नूरे हिदायत से जुल्मात को शिकस्त दें और हक को बातिल पर गालिब कर दें। हमारे मां-बाप आप पर निसार हों, आप तशरीफ लाए और आते ही दुनिया का रूख पलट दिया, बन्दों का टूटा हुआ रिश्ता खुदा से जोड़ा और जो जलालत में गिर चुके थे उनको वहां से उठाकर बुलंदी पर पहुंचाया।

मुश्रिकों को मूहिद बनाया और काफिरों को मोमिन, बुतपरस्तों को खुदापरस्त किया और बुतसाजों को बुतशिकन, रहजनों को रहनुमाई सिखाई, और गुलामों को आकाई, चोर, चैकीदार बन गए और जालिम गमख्वार और जो दुनिया भर के अवारा थे वही सबसे ज्यादा लायक हो गए और जिनका कौमी ढांचा बिखर गया था वह मुकम्मल तौर पर मुनज्जम कर दिए गए।

रूहानियत के फरिश्ते शैतानियत पर गालिब आ गए, कुफ्र व शिर्क, खिदमत व जलालत और हर किस्म की गुमराहियों को जबरदस्त शिकस्त हुई, शकावत व बदबख्ती का मौसम बदल गया। जुुल्म व फसाद को जोर खत्म हो गया। हक व सदाकत और खैर व सआदत ने आलमगीर फतेह पाई और जमीन पर अम्न व अमान कायम हो गया।

जिस वक्त दुनिया में नबी (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ) ने अपना पहला कदम रखा था वह रबी अव्वल ही का महीना था और फिर जब आप की उम्र चालीस बरस की हुई तो इसी महीने में दुनिया की इस्लाह का काम आप के सुपुर्द हुआ। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि रबी अव्वल ही इस रहमते आम्मा के जुहूर का मुब्दा और रूहानी खैरात व बरकात के वफूर का मंबा है और यही वजह है कि जब यह मुबारक महीना आता है तो मुसलमानों के दिलों में यहां तक कि उनके दिलों में भी जो दूसरे मौसमों में बिल्कुल गाफिल रहते हैं इस मुकद्दस वजूद की याद ताजा हो जाती है और तरह-तरह की खुशियों का इजहार किया जाता है।

नोमाएइलाही की याद से खुश होना बुरी चीज नहीं बल्कि शरीअत की हुदूद से पार न जाया जाए तो एक दर्जा में महमूद है। लेकिन आज मुझे अर्ज करना यह है कि आप जश्न की इन घडि़यों और शादमानी के इन पलों में उस काबिले मातम हकीकत को क्यों भूल जाते हो कि इस मुकद्दस व मसूद वजूद ने इस मुबारक महीने में आकर आपको जो कुछ दिया था आज आप अपनी शामते आमाल से सब कुछ खो चुके हैं।

रबी अव्वल अगर आप के लिए खुशियों का मौसम और मसर्रतों का पैगाम है तो सिर्फ इसलिए कि इस महीने में दुनिया की खजां जलालत को बहारे हिदायत ने आखिरी शिकस्त दी थी और इसी महीने में नबी करीम (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) दुनिया में आए थे जिन्होंने तुम पर रूहानियत के दरवाजे खोल दिए और वह सारी नेमतें तुम को दिलवा दी जिनसे तुम महरूम थे फिर अगर आज तुम उन की लाई हुई शरीअत से दूर और उन की दिलाई हुई नेमतों से महरूम होते जा रहे हो तो क्या वजह है कि पिछले बहार की खुशी तो मनाते हो लेकिन खिजां की मौजूदा पामालियों पर नहीं रोते।

तुम रबी अव्वल में आने वाले के इश्क का दावा रखते हो और उसकी याद के लिए मजलिसे मुनअकिद करते हो लेकिन यह नहीं सोंचते कि तुम्हारी जबान जिस की याद का दावा कर रही है उसकी फरामोशी के लिए तुम्हारा हर अमल गवाह है और जिस की ताजीम व तकसीम का तुम को बड़ा फख्र है तुम्हारी गुमराहाना जिंदगी बल्कि तुम्हारे वजूद से उसकी इज्जत को बट्टा लग रहा है।

अगर तुम्हारे इस इश्क व मोहब्बत के दावे में कोई सदाकत होती और तुम को हकीकत में उनसे गुलामी का थोड़ा सा भी ताल्लुक होता तो तुम्हारी दीनी हालत हरगिज इस कदर तबाह न होती। तुम नमाज के आदी होते और जकात पर आमिल, तकवा तुम्हारा काम होता और सुन्नत की पैरवी तुम्हारा तुर्रा-ए-इम्तियाज होता और तुम हराम व हलाल में फर्क करते बल्कि शुब्हात के मौके से भी बचते, तुम्हारी जिंदगी नमूना होती सहाबा का और तुम्हारा हर अमल मुरक्का होता इस्लाम का।

अब जबकि तुम्हारा यह हाल नही है और तुम अपने दिलों से पूछों वहां से यही जवाब मिलेगा कि हां नहीं है, तो फिर यकीन करो कि रबी अव्वल के मौके पर तुम्हारी यह इश्क व मोहब्बत की नुमाइश सिर्फ फरेब नफ्स है जिसमें तुम खुद मुब्तला हो सकते हो या तुम्हारे जाहिर में दोस्त व अहबाब, खुदावंद अलीम व खबीर तुम्हारे इस फरेब में नही आ सकता और न ही उसके रसूल (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ) को तुम उन हकीकत से खाली मुजाहिरे से धोका दे सकते हो।

इसलिए मै तुम से कहता हूं और अल्लाह पाक की कसम सिर्फ तुम्हारी खैरख्वाही के लिए कहता हूं कि तुम अपनी इन रस्मी मजलिसों की आराइश से पहले अपने उजड़े हुए दिल की खबर लो और कंदीलों के रौशन करने के बजाए अपने दिलों को ईमान की रौशनी से रौशन करने की फिक्र करो।

तुम गैरों की तकलीद में नकली फूलों के गुलदस्ते सजाते हो मगर तुम्हारी हस्नात का जो गुलशन उजड़ रहा है उसकी हिफाजत और शादाबी का कोई इंतजाम नहीं करते। तुम रबी अव्वल की बरकतों और रहमतों का तसव्वुर करके खुशी के तराने गाते हो लेकिन अपनी इस बर्बादी पर मातम नहीं करते कि तुम्हारा खुदा तुम से रूठा हुआ है। उसने तुम्हारी बद आमालियों से नाराज होकर अपनी दी हुई नेमतों को तुम से छीन ली है तुम आका से गुलाम, हाकिम से महकूम, गनी से मुफलिस, जरदार से बेजर बल्कि बेघर हो चुके हो। तुम्हारे ईमान का चिराग टिमटिमा रहा है और तुम्हारे नेक आमाल का फूल मुरझा रहा है और गजब यह है कि तुम गाफिल हो।

क्या इस महरूमी और मगजूबी की हालत में भी तुम को हक पहुंचता है कि रबी अव्वल में आने वाले दीन व दुनिया की नेमतें लाने वाले रहमतुल आलमीन (रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ) की आमद की यादगार में खुशियां मनाओ। बकौल अल्लामा अबुल कलाम आजाद-क्या मौत और हलाकी को इसका हक पहुंचता है कि जिंदगी और रूह का अपने को साथी बताए? क्या एक मुर्दा लाश पर दुनिया की अक्लें न हंसेगी अगर वह जिंदों की तरह जिंदगी को याद करेगी? हां यह सच है कि आफताब की रौशनी के अंदर दुनिया के लिए बड़ी खुशी ही खुशी है लेकिन अंद्दे कोकब जेब देता है कि वह आफताब के निकलने पर आंख वालों की तरह खुशियां मनाए।

इसलिए ऐ गफलत में पड़े लोगों! तुम्हारी गफलत पर हसरत और तुम्हारी सरशारियों पर अफसोस अगर तुम इस मुबारक महीने की अस्ली इज्जत व हकीकत से बेखबर हो और सिर्फ जबानों के तराने और दीवार की आराइशों और रौशनी की कंदीलों ही में इसके मकसदे यादगारी को गुम कर दो, तुम को मालूम होना चाहिए कि यह मुबारक महीने की बुनियाद का पहला दिन है। खुदावंदी बादशाहत के कयाम का अव्वलीन एलान है।

खिलाफत अरजी व विरासते इलाही की बख्शियत का सबसे पहला महीना है। इसलिए इसके आने की खुशी और इसका तजकिरा व याद की लज्जत यह उस शख्स की रूह पर हराम, जो अपने ईमान और अमल के अंदर उस पैगामे इलाही की तामील व इताअत और नमूने की तासी और पैरवी के लिए कोई नमूना नहीं रखता। (
मौलाना मंजूर नोमानी)

———-बशुक्रिया : जदीद मरकज़

TOPPOPULARRECENT