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राष्ट्रवाद के संघर्ष से ध्यान हटाने के लिए भारत माता की समस्या छेड़ने का आरोप

मुंबई: सदर मजलिस असद ओवैसी ने जब यह फैसला किया था कि हैदराबाद से बाहर बिहार में भी चुनावी प्रतिस्पर्धा हो उस समय से ही उनके सच्चे इरादों पर सवालिया निशान लग गया जहां उनकी पार्टी मौजूद नहीं है। हाल ही में भारत माता की जय कहने से इनकार के विवाद में मुसलमान ये मानते है कि शोला बयान सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने राजनीतिक संकट पैदा करने के लिए आरएसएस और भाजपा के पीछे सहायता की है।

महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में मजलिस ने मुकाबला किया था लेकिन पार्टी को पर्याप्त सफलता नहीं मिली जबकि यहां के चुनाव में हार उठानी पड़ी। हालांकि गुजरात के बलदी चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों को अंत में प्रतियोगिता से वापस कर दिया गया। इसके अलावा संघ प्रमुख मोहन भागवत से भारत माता की जय नारे की अपील के जवाब में असदुद्दीन ओवैसी  की अनावश्यक बयानबाजी से देश भर में आलोचना की गई।

बिहार के कांग्रेस सांसद मौलाना असरारुल हक कासमी ने कहा कि कुछ लाभ प्राप्त करने के बदले असदुद्दीन ओवैसी ने भाजपा और आरएसएस के साथ कोई साज़िश कि है या बेवाख़ूफ‌ हैं जो ये नहीं जानते कि उनकी भाषा दराज से किस मूल्य उलटे नतीजे हो सकते हैं। एक बात निश्चित है कि उनके हाल विवादास्पद टिप्पणी की भाजपा सरकार को ताक़त पहुंची है कि अपनी नीतियों के खिलाफ जनता की नाराज़गी से निपटने में व्यस्त है।

मौलाना असरारुल हक कासमी ने बताया कि देश भर में विरोधी आरएसएस लहर चल रही है और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी  की घटनाओं के बाद उठे सवालों पर संघ परिवार जवाब देने में असमर्थ नजर आ रही है। लेकिन देश भर में जारिया आरएसएस विरोधी बहस को सांप्रदायिक रंग देने में असद ओवैसी के बयान कारगर साबित हो गया जिस पर उनके महबान भी खिलाफ हो गए हैं।

पहले महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी ने ओवैसी और भाजपा। आरएसएस के बीच गुप्त गठजोड़ का आरोप लगाया था। हालांकि असद ओवैसी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि संविधान ने उन्हें व्यक्त विचार की स्वतंत्रता दी है और इस विकल्प के उपयोग से कोई रोक नहीं सकता।

उन्होंने इस दृष्टिकोण को भी खारिज कर दिया कि उनके बयान से भाजपा और आरएसएस को लाभ पहुंचा। सदर मजलिस से पूछा कि भाजपा और आरएसएस के उदय के लिए कौन जिम्मेदार है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सफलता के लिए आया मजलिस जिम्मेदार है।

हालांकि असद ओवैसी के आलोचकों का कहना है कि अब जबकि देश भर में आरएसएस विरोधी लहर चल रही है इतिहास में पहली बार आरएसएस को सैद्धांतिक चुनौतियों का सामना है कि वह पीछे सरकार चला रहा है यह उचित होता कि असद ओवैसी धैर्य धैर्य से काम लेते और अनावश्यक भावनाओं से बेकाबू नहीं होते।

मुंबई से प्रकाशित होने वाले अखबार के संपादक कुतुबुद्दीन शाहिद ने अपने एक लेख में असद ओवैसी को एक अवसर पर लीडरकरार दिया और आरोप लगाया कि मजलिस ने आरएसएस बनाम दलित बहसों को आरएसएस बनाम मुस्लिम बहस में बदल दिया। उन्होंने अपने लेख में बताया कि बे अवसर व महल आरएसएस के खिलाफ बयानबाजी से इस आरोप को ताक़त‌ मिलता है कि असद ओवैसी ने जानबूझकर ऐसा किया है जिसके पीछे राजनीतिक मंशा का रफरमा हैं।

इसके अलावा एक और कालम नवीस जमाल रिज़वी  ने कहा कि यह स्पष्ट है कि आरएसएस और भाजपा के इशारे पर ओवैसी नाच‌ कर रहे हैं। कुछ प्रेक्षकों ने खोज की है कि मोहन भागवत के बयान के 3 दिन बाद असद ओवैसी ने यह मुद्दा क्यों उठाया, क्या उन्हें ‘भारत माता की जय’ कहने के लिए कोई दबाव था और मोहन भागवत के रिमार्क उपेक्षा क्यों नहीं किया गया क्योंकि आरएसएस एस प्रमुख ने कोई नई बात नहीं कही थी।

एक ऐसे समय जबकि देश भर में राष्ट्रवाद पर बहस जारी है मुसलमानों या अन्य समुदाय को हस्तक्षेप करने की चन्दाँ जरूरत नहीं है क्योंकि यह बहस व तकरार धर्मनिरपेक्ष भारतीयों और हिंदू राष्ट्रवादियों के बीच है। लेकिन असद ओवैसी के आक्रामक बयानबाजी से राष्ट्रवाद पर जारीया बहस के लिए राष्ट्रवादियों बनाम देशद्रोही मुसलमानों के बीच परिवर्तित हो गया है।

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