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रुमी जमार-ओ-क़ुर्बानी के साथ ईद-उल-अज़हा का इनइक़ाद

अक़्ता आलम के 40 लाख से ज़ाइद ख़ुशनसीब आज़मीन ने फ़रीज़ा हज बैतुल्लाह की सआदत ( प्रताप/ शुभ कार्य) हासिल करने के बाद मुक़द्दस सरज़मीन पर ईद-उल-अज़हा मनाई ।जबल रहमत पर इबादत रयाज़त ज़िक्र इलाही और रख़्त अंगेज़ दा‍‍ओं के साथ सारा दिन गुज़ारने के

अक़्ता आलम के 40 लाख से ज़ाइद ख़ुशनसीब आज़मीन ने फ़रीज़ा हज बैतुल्लाह की सआदत ( प्रताप/ शुभ कार्य) हासिल करने के बाद मुक़द्दस सरज़मीन पर ईद-उल-अज़हा मनाई ।जबल रहमत पर इबादत रयाज़त ज़िक्र इलाही और रख़्त अंगेज़ दा‍‍ओं के साथ सारा दिन गुज़ारने के बाद शम्मा तौहीद के लाखों परवानों ने जिन में एक लाख 70 हज़ार हिंदूस्तानी भी शामिल हैं ।

दुबारा ख़ेमों के शहर मीना पहुंचे जहां पर शैतान को कंकड़ियां मारने से मुताल्लिक़ अहम तरीन रुकन हज रुमी जमार की तकमील की । मज़दल्फ़ा से रात में आमद के मौक़ा पर हुज्जाज इकराम ने अपने रास्तों में कंकड़ियां जमा की और आज सुबह अव्वलीन साअतों में तलबीह की गूंज के दौरान लाखों हुज्जाज इकराम का क़ाफ़िला मीना पहुंचा जहां तमाम रास्ते इंसानी सुरों के वसीअ समुंद्र का मंज़र पेश कर रहे थे और हुज्जाज इकराम अपने कैम्पों को वापस पहुंच रहे थे।

हुज्जाज की कसीर ( ज़्यादा) तादाद ने आज शैतान को कंकड़िया मारने का अमल शुरू किया जो मज़ीद दो दिन तक जारी रहेगा । इस दौरान तवाफ़ काअबा और दीगर मनासिक की तकमील ( पूरा) करेंगे । हुज्जाज ने आज पूरे ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू के साथ ईद-उल-अज़हा मनाई ।

इस मौक़ा पर पैग़ंबर इस्लाम हज़रत सय्यदना इबराहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत की पैरवी करते हुए राह अल्लाह में दुंबा की क़ुर्बानी दी जो हज़रत इबराहीम अलैहिस्सलाम ने अपने रब से बशारत पाकर अपने लख्त-ए-जिगर हज़रत सैय्यदना इस्माईल अलैहिस्सलाम को राह अल्लाह में क़ुर्बान करने के लिए सुनसान मुक़ाम पर पहुंचे थे और अपनी आँखों को पट्टी बांध कर अपने ही लख्त-ए-जिगर के गले पर छुरी चलाई थी कि शान-ए-रहीमी को जोश आ गया और अल्लाह ताला ने हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह एक जन्नती दुंबा को पहुंचा दिया और इस तरह दुंबा की क़ुर्बानी हो गई और ख़ुदा की इस अज़ीम आज़माईश में हज़रत इबराहीम अलैहिस्सलाम कामयाब भी हो गए और इनाम के तौर पर अल्लाह ताला ने उनके लख्त-ए-जिगर हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को बचा लिया ।

इस रिवायत के मुताबिक़ ईद-उल-अज़हा के मौक़ा पर दुंबा की क़ुर्बानी की सुन्नत बरक़रार है । इलावा अज़ीं ऊंट गाय बकरा और ऐसे ही दीगर मवेशीयों की क़ुर्बानी भी दी जाती है । पाँच रोज़ा मनासिक हज का 24अक्टूबर से अर्ज़-ए-मुक़द्दस मक्का मुअज़्ज़मा में आग़ाज़ हुआ था जहां अक़्ता ( सारे) आलम के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों रंग-ओ-नसल ज़बानों और मुआशरों से ताल्लुक़ रखने वाले शम्मा तौहीद के लाखों परवाने जमा हुए थे ।

सफेद एहराम ओढ़े हुए ये तमाम अल्लाह के मेहमान इस्लामी इत्तिहाद उखुवत (भाईचारा) और मुसावात (बराबरी) पर मबनी ( बनी/ निर्धारित) इस्लामी तालीमात का अमली सबूत पेश कर रहे थे । ये ख़ुशनसीब आज़मीन मक्का से मीना की सिम्त ( दिशा/ ओर) रवानगी के साथ मनासिक हज का आग़ाज़ किया ।

उन्होंने साल में सिर्फ एक मर्तबा आबाद होने वाले ख़ेमों के शहर मीना में पहली रात इबादत-ओ-रयाज़त और रख़्त अंगेज़ दुआओं में गुज़ारी। बादअज़ां उन्होंने जबल अराफ़ात पर भी इबादत-ओ-रयाज़त में वक़्त गुज़ारा जिस के बाद रुमी जमार का अमल शुरू हुआ ।

जबल ( पहाड़) अराफ़ात वो मुक़ाम है जहां पैग़ंबर इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा स०अ०व० ने आख़िरी ख़ुतबा दिया था जो हज का एक इंतिहाई अहम रुकन है । जबल अराफ़ात को जबल रहिमा या रहमत का पहाड़ भी कहा जाता है । रहमत के इस मुक़ाम पर हुज्जाज इकराम ने अल्लाह ताला से रहम-ओ-करम अफ़व दरगुज़र-ओ-मग़फ़िरत के लिए दाये मांगते हुए अपना वक़्त गुज़ारा । अक्सर ख़ुशनसीब आज़मीन दुआओं के दौरान जज़बाती अंदाज़ में अशकबार हो ( रो) गए और उन्होंने अपने ख़ालिक़ रब कायनात को राज़ी करने के लिए इंतिहाई रख़्त अंगेज़ दुआएं की । जिस से ईमानी हरारत के नाक़ाबिल फ़रामोश रूह प्रवर मुनाज़िर देखे गए ।

लखनऊ से ताल्लुक़ रखने वाले एक ख़ुशनसीब हाजी 63 साला रईस नामानी ने अपने जज़बात-ओ-एहसासात का इज़हार करते हुए कहा कि जबल ( पहाड़) अराफ़ात पर पहली मर्तबा पहूँचा हूँ और मैं अपने जज़बात-ओ-एहसासात मेरे लिए नाक़ाबिल ब्यान हैं ।

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