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लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने के बावजूद अब्दुस समद को नहीं मिली नौकरी

भोपाल। कहते हैं कि ऊपर वाला जिस इंसान के साथ कोई कमी रखता है तो उसे दूसरी तरफ इतनी शक्ति दे देता है कि वे दुनिया भर में एक मिसाल पैदा कर सकता है। एक हॉकी ख़िलाड़ी जो मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की जमीन से उठा तो इतने रिकॉर्ड बना डाले कि सबको चौंका दिया।

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भोपाल की जमीन से निकले मध्य प्रदेश के जिस दुर्लभ हीरे की चमक अब दुनिया देख रही है, उस चमचमाते नगीने का नाम अब्दुस समद है। उसके पूरे घर के पुरुष राष्ट्रीय हॉकी के खेल से जुड़े हुए हैं। वहीं समद ने अपनी शारीरिक कमजोरी को हराकर जिस तरह से सफलता की मंजिल को पार किया है, उसकी मेहनत आज दुनियां में अपना परचम लहरा रही है।

दरअसल समद की हॉकी दस साल की उम्र में शुरू होता है जब वह अपने पिता को हॉकी खेलते देखता था और हॉकी खेलने की कोशिश करता था। लेकिन बोलने और सुनने की कमी ने उसे आगे बढ़ने से रोका। पर समद की मेहनत रंग लाई और उसे हॉकी खेलने का मौका मिला। क्योंकि वह सुन और बोल नहीं सकता था इसलिए उसे गोलकीपर बनाया गया और यहां से शुरू हुआ उसकी सफलता की यात्रा और इस यात्रा में सबसे पहले अपना नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया।

समद इंडियन हॉकी में मध्यप्रदेश टीम का वह चमकता नगीना है, जिसने लिम्का बुक ऑफ वर्ड रिकॉर्ड में अपनी जगह तो बना ही लिएय साथ ही न जाने कितने पुरस्कार से सम्मानित भी हुए। बेहतरीन गोलकीपर अब्दुस समद को प्रकृति ने बोलने और सुनने की शक्ति तो नहीं दी है, पर वह अपने भाई की मदद से अपनी बात कह पाता है, जो खुद एक नेशनल ख़िलाड़ी है। लेकिन समद चाहे जितनी कोशिश कर ले या रिकॉर्ड बना ले उसकी परेशानी ज्यों की त्यों बरकरार है क्योंकि सरकार द्वारा सरकारी नौकरी और सरकारी सुविधाओं के दावे और वादे तो बहुत किए गए। लेकिन उन पर अमल आज तक नहीं किया जा सका है ।

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