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लोकतंत्र में बिखराव, बिखरने से पहले सँभल जाना ज़रूरी

(जयंत रामटेक)

भारत में राजनीतिक सत्ता तेजी से ऐसी ताकतों के हाथों पहुँच रहा है जिनका लोकतांत्रिक सरकार पर भरोसा नहीं, जो विचार-विमर्श से सरकार चलाने के लिए राजी नहीं, तो अब समय आगया है कि संसदीय लोकतंत्र को चुनौतियों के बारे में भारतीय संविधान बनाने वालों में महत्वपूर्ण व्यक्ति डॉक्टर बीआर अंबेडकर के विचारों की फिर से समीक्षा की जाये। डॉ। अंबेडकर ने लोकतंत्र की व्याख्या ऐसे तरीके और प्रारूप सरकार के रूप में करते हैं जहां जनता की आर्थिक और सामाजिक में क्रांतिकारी परिवर्तन रक्तपात के बिना लाई जाती हैं। उन्होंने सफल लोकतंत्र के लिए कुछ शर्तों को अनिवार्य अग्रिम आवश्यक बातें करार दिया है।

गंभीर नामुसावातें न हों
लोकतंत्र के सफल कार्य के लिए पहली पूर्व शर्त यह है कि समाज में सख़्त नामुसावातें हरगिज़ ना हों। कोई पीड़ित वर्ग कभी नहीं होना चाहिए। कोई दबी कुचली समुदाय न हो। ऐसी स्थिति कभी न हो कि एक वर्ग को सारी सुविधाएं प्राप्त हैं और एक अन्य वर्ग पर सारी बोझ डाला गया हो। ऐसी बात, ऐसी वितरण, समाज ऐसी तरकीब स्वतः खूनी क्रांति की ओर हो जाएगी।
मजबूत विपक्ष की जरूरत
सफल लोकतंत्र के लिए आवश्यक अन्य महत्वपूर्ण बात विपक्ष का अस्तित्व है: लोकतंत्र का मतलब है कि वहाँ वीटो शक्ति (किसी कानून को अस्वीकार करने का संवैधानिक अधिकार) रहे। लोकतंत्र दरअसल निहित नियम या सत्तावादी शासन की जिद है। लोकतंत्र का मतलब होता है कि किसी न किसी स्तर पर वीटो का उपयोग देश पर शासन करने वालों के खिलाफ जरूर होना चाहिए। राज्य शासन के मामले किसी से वीटो की कल्पना नहीं रहता है। लेकिन लोकतंत्र में यह क्षमता प्रदान की गई है कि शासक वर्ग हर पांच साल में जनता का उल्लेख हो और उनसे राय मांगी कि क्या वह सत्ता और शासन आवंटित किए जाने के पात्र हैं कि उनके हितों का ख्याल रख सकें, उनकी किस्मत बदलें उनकी सुरक्षा करें।

लोकतंत्र मांग है कि न केवल सरकार वीटो यानी जनता के हाथों पांच साल दीर्घकालिक वीटो अधीन रहे, बल्कि कोई आजलाना वीटो भी ज़रूर होना चाहिए। संसद में कोई तो हमेशा तैयार रहना चाहिए ताकि सरकार को चुनौती कर‌ सके। विपक्ष का मतलब है सरकार हमेशा मेहनती रहना होगा। सरकार को अवश्य हर प्रक्रिया औचित्य चाहिए जो वह अपनी पार्टी से संबंध न रखने वालों के साथ करती है। मेरा मानना ​​है कि बदबख़्ती से हमारे देश में मीडिया के अधिकांश कोनों ने किसी न किसी कारण से सरकार विज्ञापन में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं और विपक्ष को अनदेखा किया जा रहा है।

कानून और प्रबंधन में समानता
इंग्लैंड में प्रबंधन को गिरावट से बचाने, तटस्थ रखने, राजनीतिक चाल और पक्षपातपूर्ण नीति से दूर रखने के लिये वहाँ भेदभाव स्पष्ट कर दिया गया है कि राजनीतिक कार्यालयों क्या हैं और दीवानी स्थिति क्या हैं। ब्रिटेन की तरह भारत ने भी पहले ही समझदारी निर्णय लिया कि प्रबंधन में सरकार की ओर से हस्तक्षेप कभी नहीं होनी चाहिए, और सरकार का काम नीति सेटिंग देना है, न कि हस्तक्षेप और कोई भेदभाव।

संवैधानिक नैतिकता अनुपालन
हमारे पास संविधान है जो कानूनी गुंजायशें मौजूद हैं, यूं समझिए कि केवल संरचना है। इस संरचना का मांस अफीम वहाँ खोजना होगा जिसे हम संवैधानिक नैतिकता कहते हैं। अमेरिकी जनता के लिए जॉर्ज वॉशिंगटन भगवान की तरह थे। उन्हें संविधान संपादन के बाद अमेरिका के सर्वोच्च अध्यक्ष बनाया गया। उनकी समाप्ति पर क्या हुआ? उन्होंने दूसरी बार अध्यक्षता दावे जिम्मेदारी से इनकार कर दिया। जब वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा: ” मेरे देशवासियो! आप वह उद्देश्य भूल चुके हो जो हमने संविधान बनाया। हम इस संविधान इसलिए बनाया क्योंकि हम कोई पीढ़ी पीढ़ी शासक या कोई तानाशाह नहीं चाहते हैं। अगर इंग्लिश किंग अनुसरण और बंधन को छोड़कर आप देश आईं और प्रति वर्ष और अवधि ब अवधि मेरे ही गुन गाते रहें तो तुम्हारे सिद्धांतों का क्या होगा? क्या आप कह सकते हैं कि अंग्रेज राजा के अधिकार के खिलाफ विद्रोह करते हुए सही काम किया है जबकि इस जगह मुझे वैकल्पिक बना रहे हो? ” उन्होंने कहा, ” अगर तुम्हारी निष्ठा तुम्हें ऐसी अनुरोध पर मजबूर करती है कि मुझे दूसरा कार्यकाल के लिए खड़ा होना चाहिए, तब भी आप भावनात्मक अपील से प्रभावित नहीं होगा क्योंकि खुद मैं यह नियम बनाया कि हमें विरासत वाली अधिकार नहीं चाहिए। ” बहरहाल जॉर्ज वॉशिंगटन समर्थित और समर्थक किसी उन्हें न्यूनतम दूसरा कार्यकाल के लिए सहमत करा लिए। और उन्होंने दूसरा कार्यकाल भी पूरा किया। फिर जब तीसरी अवधि के लिए भी उनसे फिरे तो उन्होंने प्रस्ताव साफ ठुकरा दी।

बहुमत अल्पसंख्यक गलत न हो
अल्पसंख्यक हमेशा सुरक्षा और रक्षा का एहसास होना चाहिए। भले ही बहुमत सत्ता है, अल्पसंख्यक को नुकसान न पहुंचे या अल्पसंख्यक के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया जाएगा। अगर सरकार संसदीय सदन में छोटे समुदाय षरिकात विचाराधीन निरंतर विरोधी करे जबकि इस समुदाय का प्रतिनिधित्व बमुश्किल चार, पांच या छह सदस्यों का समूह करता है तो इस तरह के अल्पसंख्यकों को अपनी शिकायतों के अभिव्यक्ति के लिए कभी मौका नहीं हो सकता। होता यह है कि ऐसी अल्पसंख्यकों में संसदीय लोगों के लिए तिरस्कार की भावना और क्रांतिकारी भावना पैदा होता है जो गीरहस्तवरी बात हो जाएगी। इसलिए जरूरी है कि जब लोकतंत्र का राज है तो बहुमत जिस पर आधारित है, क्रूर तरीके कभी काम न करे।

समाज में नैतिक व्यवस्था
लोकतंत्र को स्वतंत्र सरकार कहा जाता है। और स्वतंत्र सरकार हम क्या मतलब निकालते हैं? स्वतंत्र सरकार का मतलब है कि सामाजिक जीवन के व्यापक पहलुओं में जनता कोई हस्तक्षेप के बिना जीने के लिए स्वतंत्र हैं, या अगर कोई कानून बनाने की राहत हो तो विधान को उम्मीद है कि इस कानून को सफल बनाने के लिए समाज में यथोचित नैतिकता मौजूद हैं। अगर कोई नैतिक व्यवस्था न हो तो लोकतंत्र में बिखराव बिखर जाएगा जैसा कि अब खुद हमारे देश में हो रहा है।

जनता के विवेक का अस्तित्व आवश्यक
लोकतंत्र को जनता के विवेक की आवश्यकता रहती है। सार्वजनिक विवेक का मतलब वह विवेक जो हर गलत बात/काम पर बेकरार हो, चाहे प्रभावित होने वाला कोई भी हो, और इसका मतलब है कि हर कोई चाहे किसी विशिष्ट त्रुटि से प्रभावित हो या नहीं, आगे बढ़कर पीड़ित को राहत पहुंचाने के लिए तैयार रहे। मैं भारत में शायद ही देखा कि कोई व्यक्ति जिसका संबंध अनुसूचित वर्ग नहीं, इस वर्ग के कारण उजागर करे और संघर्ष करे। ऐसा क्यों है? क्योंकि कोई ‘सार्वजनिक अंतरात्मा’ नहीं है। मेरी जाति और मेरा भारत को दुनिया बनाकर ही ख़ौल में बंद होना है। अगर इस तरह के हालात रहें तो अल्पसंख्यक जो अन्याय से पीड़ित है, अन्य कुछ सहायता प्राप्त होने वाली नहीं है कि इस अन्याय से छुटकारा मिले। इससे फिर क्रांतिकारी मानसिकता परवान चढ़ती है जो लोकतंत्र को खतरे में डालती है।

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