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वतनपरस्ती किसी खास कौम की जागीर नहीं, खुन हमने भी बहाए हैं वतन की खातिर

सियासत हिंदी : कोई कितना ही झुठला ले, लेकिन यह हकीकत है कि हिंदुस्तान के मुसलमानों ने भी मुल्क के लिए अपना खून और पसीना बहाया है। हिंदुस्तान मुसलमानों को भी उतना ही अजीज है, जितना किसी और को। यही पहला और आखिरी सच है। अब यह मुसलमानों का फर्ज है कि वो इस सच को ‘सच’ रहने देते हैं। या फिर ‘झूठा’ साबित करते हैं।

इस मुल्क के लिए मुसलमानों ने अपना जो योगदान दिया है, उसे किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कितने ही शहीद ऐसे हैं, जिन्होंने मुल्क के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी, लेकिन उन्हें कोई याद तक नहीं करता। हैरत की बात यह है कि सरकार भी उनका नाम नहीं लेती। इस हालात के लिए मुस्लिम तनजीमें भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। वे भी अपनी कौम और वतन के शहीदों को याद नहीं करते।

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हमारा इतिहास मुसलमान शहीदों की कुर्बानियों से भरा पड़ा है। मसलन, बाबर और राणा सांगा की लड़ाई में हसन मेवाती ने राणा की ओर से अपने अनेक सैनिकों के साथ जंग में हिस्सा लिया था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की दो मुस्लिम सहेलियों मोतीबाई और जूही ने आखिरी सांस तक उनका साथ निभाया था। रानी के तोपची कुंवर गुलाम गोंसाई खान ने झांसी की हिफाजत करते हुए अपनी जान की कुर्बानी दी थी। कश्मीर के राजा जैनुल आबदीन ने अपने रियासत से पलायन कर गये हिंदुओं को वापस बुलाया और उपनिषदों के कुछ हिस्से का फारसी में ट्रांस्लेट कराया। दक्षिण भारत के शासक इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय ने सरस्वती वंदना के गीत लिखे। सुल्तान नाजिर शाह और सुल्तान हुसैन शाह ने महाभारत और भागवत पुराण का बंगाली में ट्रांस्लेट कराया। शाहजहां के बड़े बेटे दारा शिकोह ने श्रीमदभागवत और गीता का फारसी में ट्रांस्लेट कराया और गीता के पैगाम को दुनियाभर में फैलाया।

गोस्वामी तुलसीदास को रामचरितमानस लिखने की प्रेरणा कृष्णभक्त अब्दुर्रहीम खानखाना से मिली। तुलसीदास रात को मस्जिद में ही सोते थे। ‘जय हिंद’ का नारा सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के कप्तान आबिद हसन ने 1942 में दिया था, जो आज तक भारतीयों के लिए एक मंत्र के समान है। यह नारा नेताजी को फौज में सर्वअभिनंदन भी था।

छत्रपति शिवाजी की सेना और नौसेना के बेड़े में एडमिरल दौलत खान और उनके जाती सेक्रेटरी भी मुसलमान थे। शिवाजी को आगरे के किले से कांवड़ के जरिये कैद से आजाद कराने वाला सख्श भी मुसलमान ही था। भारत की आजादी के लिए 1857 में हुए पहले गृहयुद्ध में रानी लक्ष्मीबाई की हिफाजत की जिम्मेदारी उनके पठान सेनापतियों जनरल गुलाम गौस खान और खुदादा खान की थी। इन दोनों ही शूरवीरों ने झांसी के किले की हिफाजत करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये। गुरु गोबिंद सिंह के गहरे दोस्त सूफी बाबा बदरुद्दीन थे, जिन्होंने अपने बेटों और 700 शिष्यों की जान गुरु गोबिंद सिंह की हिफाजत करने के लिए औरंगंजेब के साथ हुए जंगों में कुर्बान कर दी थी, लेकिन कोई उनकी कुर्बानी को याद नहीं करता। बाबा बदरुद्दीन का कहना था कि अधर्म को मिटाने के लिए यही सच्चे इस्लाम की लड़ाई है।

अवध के नवाब तेरह दिन होली का तेहवार मनाते थे। नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में श्रीकृष्ण के सम्मान में रासलीला का आयोजन किया जाता था। नवाब वाजिद शाह अली ने ही अवध में कत्थक की शुरुआत की थी, जो राधा और कृष्ण के इश्क पर आधारित है। मशहुर नाटक ‘इंद्र सभा’ का सृजन भी नवाब के दरबार के एक मुस्लिम लेखक ने किया था। भारत में सूफी गुजिश्ता आठ सौ बरसों से बसंत पंचमी पर ‘सरस्वती वंदना’ को गाते आये हैं। इसमें सरसों के फूल और पीली चादर होली पर चढ़ाते हैं, जो उनका अमह त्योहार है। महान कवि अमीर खुसरो ने सौ से भी ज्यादा गीत राधा और कृष्ण को समर्पित किये थे।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की बुनियाद मियां मीर ने रखी थी। इसी तरह गुरु नानकदेव के प्रिय शिष्य व साथी मियां मरदाना थे, जो हमेशा उनके साथ रहा करते थे। वह रबाब के संगीतकार थे। उन्हें गुरुबानी का पहला गायक होने का श्रेय हासिल है। बाबा मियां मीर गुरु रामदास अच्छे दोस्त थे। उन्होंने बचपन में रामदास की जान बचायी थी। वह दारा शिकोह के उस्ताद थे। रसखान श्रीकृष्ण के दिगर भक्तों में से एक थे जैसे भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी वगैरह। रसखान अपना सब कुछ कुर्बान कर कृष्ण के प्रेम में लीन हो गये। श्रीकृष्ण की अति सुंदर रासलीला रसखान ने ही लिखी। श्रीकृष्ण के हजारों भजन सूफियों ने ही लिखे, जिनमें भिकान, मलिक मोहम्मद जायसी, अमीर खुसरो, रहीम, हजरत सरमाद, दादू और बाबा फरीद शामिल हैं। बाबा फरीद की लिखी रचनाएं बाद में गुरु ग्रंथ साहिब का हिस्सा बनीं।

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