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विकलांग हमारे समाज का हिस्सा हैं

“दिव्यांगजन सशक्तीकरण राष्ट्रीय पुरुस्कार 2016” समारोह के दौरान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सार्वजनिक स्थानों, सुविधाओं, को दिव्यांगो के अनुरुप बनाने पर जोर देते हुए कहा कि “पोषक तत्वों की पूर्ति, प्रौद्धोगिकी के इस्तेमाल और समाजिक सहयोग से इनका जीवन सुगम बनाया जा सकता है”। परंतु जम्मू कश्मीर का सीमावर्ती जिला पुंछ जो तीनों ओर से नियंत्रण रेखा से घिरा हुआ है विकलांगो के प्रति देश के राष्ट्रपति की महत्वकांक्षाओं पर प्रशन चिंह लगा रहा है।

इसके पीछे कई कारण हैं। प्रमुख कारण है जिले का तीनों ओर से नियंत्रण रेखा से घिरा होना, और गोलीबारी का शिकार बनते रहना। परिणामस्वरुप यहां विधवाओं, अनाथों और विकलांगों की एक लंबी श्रृंखला देखने को मिलती है। बालाकोट से लेकर खड़ी, चकदाबाग, शाहपुर और सावजियां का प्रसिद्ध क्षेत्र हमेशा गोलाबारी का निशाना बनता रहता है।

बता दें की इस क्षेत्र में माईन ब्लास्ट के कारण ही लोग विकलांग नही बनते बल्कि प्राकृतिक बीमारियों का शिकार होकर भी विकलांगता से ग्रस्त हो रहे हैं। इस संबध में ग्रामीण भारत में काम करने वाली दिल्ली स्थित गैर सरकारी संगठन चरखा डेवलपमेंट कम्युनिकेशन नेटवर्क द्वारा जिले की तीन तहसीलों में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार यहां अधिकतम संख्या तीस साल से कम उम्र के विकलांगों की है, पचास प्रतिशत विकलांगों की मासिक आय पांच हजार रुपये से कम है,  32 प्रतिशत लोगों के पास विकलांगता प्रमाण पत्र नहीं है, विकलांगों में 51 प्रतिशत लोग जन्मजात विकलांग हैं, 91 प्रतिशत लोगों को विकलांगता से राहत की कोई सहायता अब तक नहीं मिल पाई है, 40 प्रतिशत विकलांगों को इलाज और उपचार नहीं मिला, इनमें 40 प्रतिशत लोग निरक्षर हैं, और  95 प्रतिशत को बस किराए में कोई छूट नहीं मिलती है।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि पुंछ में विकलांग किन कठिनाईयों का सामना कर रहे हैं, और सरकार की ओर से उन्हे क्या सहायता मिल रही है? जिले की तहसील मंडी के गांव अड़ाई मे विकलांगो की स्थिति के बारे जम्मू विश्वविद्यालय से एमए में उर्दू करने वाले रेहान अहमद बताते हैं ” यहां 70 से अधिक विकलांग हैं जो ऐसी बीमारी से पीड़ित हैं जिसका कोई स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका”। वो आगे कहते हैं ” जब यहाँ के लोग ढोकं (पशुपालन के लिए जंगलों में अस्थायी घर) में जाते हैं तब विकलांगों को कंधों पर उठाकर ले जाते हैं। ढोंक न ले जाने की स्थिति में गांव वाले घर में ही रखा जाता है और देखभाल के लिए छोटे बच्चे को साथ छोड़ दिया जाता है। परंतु ऐसे में अगर कोई विकलांग बीमार हो जाए तो? ”। तहसील मंडी के सावजियां का पुरालकोट जिसे “बहरों की बस्ती” कहा जाता है। यहां स्थानीय समाचार पत्र में काम करने वाले संवाददाता रेयाज मल्लिक के अनुसार ” यहां पच्चीस से अधिक लोग सुनने और समझने की क्षमता से वंचित हैं”।

तहसील सूरनकोट के गांव हाड़ि के सफेदां में विकलांगो की स्थिति के बारे यहां के सामाजिक कार्यकर्ता शाहनवाज बांडे ने कहा ” हमारे गांव की आबादी में विकलांगों की बड़ी संख्या है। दूर दराज का इलाका होने के कारण सरकार की ओर से चलाए जा रही योजनाओं का प्रभाव शून्य है। विकास के दौर में यहां  विकलांगों का जीना दुर्लभ है। उनके लिए कोई सरकारी अस्पताल नहीं जिस कारण इन विकलांगों को भी सूरनकोट या पुंछ अस्पताल में उपचार के लिए जाना पड़ता है। इस पहाड़ी क्षेत्र से शहर तक पहुंचना आम आदमी के लिए आसान नही तो विकलांगों का क्या हाल होगा? उपर से ये क्षेत्र सड़क की पहुंच से दूर है। बस अड्डा, ईदगाह से हाड़ि तक पहुंचने में दो घंटे से अधिक का सफर पैदल ही करना पड़ता है।“

तहसील मेंढर के क्षेत्र बालाकोट, , दरहाटी, नाड़बलनोई में भी विकलांगो की बड़ी संख्या मिलती है। मेंढर डिग्री कॉलेज के महिला विंग की अध्यक्ष आसिया फिरदौस बताती हैं ” विकलांग भी हमारे जैसे इंसान हैं। फिर उन्हें अलग नज़र से क्यों देखा जा रहा है? कहीं राजनीति के शिकार और कहीं आकस्मिक आपदाओं की चपेट में आकर उनका जीवन वहीं रुक गया है।.दूसरो पर निर्भर होकर ये अपना जीवन यापन करते हैं। यदि हम विकलांगों को खोया हुआ अंग नहीं दे सकते तो ऐसे तरीके बनाएं जिससे उनके जीवन में कुछ राहत मिले। आखिर यह भी हमारे समाज का हिस्सा हैं।”  इस संबध में रुखसार कौसर कहती हैं “गांव छतराल के कफील अहमद की उम्र लगभग 25 साल है। जब वो दो साल के थे कि उनका एक पैर बेकार हो गया परंतु इसी स्थिति में उन्होने बारहवीं की परीक्षा पास की। हालांकि डिग्री कॉलेज दूर होने के कारण आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके और सिलाई का काम सीखा। अब वो अपनी छोटी सी दुकान पर एक पैर के सहारे कपड़े सिल कर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।”

तहसील सुरनकोट गांव हाड़ि की ज़ैनब नूर विधवा हैं। डॉक्टरो ने पैर मे दर्द के कारण नौ साल पहले जैनब का एक पैर काट दिया। लंबे समय तक एक पैर पर गुजारा करने का बाद वो अब स्ट्रोक जैसी बीमारी से पीड़ित हैं।

सलीमा तहसील हवेली के मॉडल गांव खनैतर से है। सलीमा बचपन से लेकर आज तक बच्चे की तरह अपने आप को घसीट कर चलती हैं। शीनदराह गांव का फ़राअत हुसैन आठ साल की उम्र से चल-फिर नही पाता, हर समय लेटा रहता है उसको बिठाने के लिए भी दूसरों की मदद लेनी पड़ती है। विकलांगता के कारण एकराम अहमद को स्कूल आने जाने में काफी कठिनाईयां होती है। और भी ऐसे कई उदाहरण हैं जो इस जिले मे लंबे समय से विकलांगता का दंश झेल रहे हैं।

इसलिए आवश्यक है कि जिला पुंछ में विकलांगों के लिए एक विकलांग गृह का निर्माण किया जाए जहां रहने- सहने की स्थायी व्यवस्था हो। साथ ही हेल्पलाइन नंबर, शिल्प केंद्र और जिला स्तर पर विकलांग संगठन की स्थापाना के साथ स्वास्थ्य विभाग की ओर से विकलांगों को मेडिकल सर्टिफिकेट प्रदान किया जाएं, बस किराए में सुविधाएं दी जाएं। कल्याण विभाग विकलांगों को पेंशन देने में देरी न करे। आशा है इन प्रयासों के बाद यहां के विकलांगो का जीवन विकलांग बनने से बच जएगा।

 

सैयद बशारत हुसैन शाह बुखारी.
खनैतर पुंछ

(चरखा फीचर्स)

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