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विचारधीन कैदियों को आतंकी लिखकर मीडिया इस देश की पैरलर कोर्ट क्यों बन रही है

मुसलमान ही आतंकी होते है इस पूर्वाग्रह से ग्रसित मीडिया के एक ध़ड़े भोपाल एनकाउंटर की रिपोर्टिंग में भी इसकी झलक दिखी। मध्यप्रदेश में सोमवार को जब आठ क़ैदी के एनकाउंटर के बाद भारतीय मीडिया ने इस केस को अलग ही पहलू से देखना शुरु किया। मीडिया के एक धड़े ने पत्रकारीय एथिक्स को को नजरअंदाज करते हुए इस मामले में तथ्यात्मक रूप से गलत रिपोर्टिंग की है।
31 अक्टूबर को मध्य प्रदेश के भोपाल जेल से 8 कैदियों के फरार होने की खबर आने से लेकर उनके एनकाउंटर तक उन्हें आंतकी ही कहा।

इन कैदियों के वकील तहव्वुर खान का कहना है  कि एक कानूनी विशेषज्ञ के तहत मुझे तथ्यों और सबूत के आधार पर मैं कह सकता हूं फैसला उनके पक्ष में आने वाला था। एक दूसरा तथ्य ये है कि अदालत में इन विचारधीन कैदियों का कोई भी जुर्म अब तक साबित नहीं हुआ था। ऐसा नहीं है मीडिया का एक धड़ा इन तथ्यों से बेखबर होगा लेकिन सिमी और कैदियों के पूर्वाग्रह से ग्रसित पत्रकारों की कलम ने कैदियों को आतंकी बनाना ज्यादा आसान लगा होगा।

इंसाफ ये कहता है जब तक कोई आरोपी है कोर्ट के आखिरी फैसले तक वो आरोपी ही है। लेकिन अदालत के फैसला आने से पहले अगर मीडिया ही अदैालत का काम कर रही है विचारधीन कैदियों को आतंकी क्यों करार दे रही है जबकि ये काम अब तक देश की किसी अदालत ने नहीं किया।  आखिर मीडिया इस देश की पैरलर कोर्ट क्यों बन रही है। क्या इस देश में इंसाफ  का सिस्टम पूरी तरग से ढह गया है जो ये काम अब मीडिया करने लगा। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि देश की कई अदालतों में जजों की कमी के कारण ताला लग रहा है। क्या आपको लगता है कि न्यायपालिका पर ताला लगा देना चाहिए? शायद मीडिया ने इन गंभीरता से ले लिया देश में जजों की कमी को वे खुद फैसला सुना के पूरा कर रहे हैं।

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