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शंकर रमन क़त्ल‌ मुक़द्दमे में कांची के साधू और दीगर बरी

कांची शंकर आचार्य मठ साधुओं जेन्दर सरस्वती और विजेंदर सरस्वती को ज़बरदस्त राहत फ़राहम करते हुए मुक़ामी अदालत ने उन्हें मंदिर के एक ओहदेदार शंकर रमन के क़त्ल के सनसनीखेज़ मुक़द्दमे में बाइज़्ज़त बरी कर दिया। साधुओं के इलावा अली उल-तरत

कांची शंकर आचार्य मठ साधुओं जेन्दर सरस्वती और विजेंदर सरस्वती को ज़बरदस्त राहत फ़राहम करते हुए मुक़ामी अदालत ने उन्हें मंदिर के एक ओहदेदार शंकर रमन के क़त्ल के सनसनीखेज़ मुक़द्दमे में बाइज़्ज़त बरी कर दिया। साधुओं के इलावा अली उल-तरतीब मुल्ज़िम नंबर एक और मुल्ज़िम नंबर दो कांची पूरम के वरदा राजा परेमाल मंदिर के मैनेजर और 21 दीगर मुलाज़िमीन को पडोचेरी की प्रिंसपाल डिस्ट्रिक्ट ऐंड सैशन जज सी ऐस मुरूगन की अदालत ने बरी कर दिया।

इस मुक़द्दमे के जुमला 24 मुल्ज़िम थे जिन में से एक कुत्थी रावण जारिया साल के अवाइल में हलाक कर दिया गया। जज ने अपने फ़ैसले में कहा कि गवाह इस्तिग़ासा के मुक़द्दमे की ताईद करने से क़ासिर रहे कि दोनों शंकर आचार्य 78 साला जेन्दर सरस्वती और 44 साला विजेंदर सरस्वती सेप्ट‌म्बर 2004में मंदिर के ओहदेदार को क़त्ल करने की साज़िश में मुलव्विस थे।

उन्होंने अपने फ़ैसले में कहा कि गवाह बिशमोल शंकर रमन का बाप अदालत में मुल्ज़िमों की शनाख़्त करने से भी क़ासिर रहे। गवाहों में से किसी एक ने भी अदालत में किसी मुल्ज़िम की शनाख़्त नहीं की। कोई वाक़ाती शहादत भी मुल्ज़िमों के ख़िलाफ़ पेश नहीं की गई।

जेन्दर सरस्वती को नवंबर 2004 में दीवाली के दिन आंध्रप्रदेश से और उनके वारिस विजेंदर सरस्वती को गिरफ़्तार किया गया था। इन दोनों की गिरफ़्तारी से कांची मठ और इस के अक़ीदतमंद दहल कर रह गए थे।

मुक़द्दमे के दौरान 189 गवाहों पर 2009 से 2012 के दरमियान जरह की गई। 83 गवाह अपने बयान से मुनहरिफ़ होगए। मुक़द्दमे के फ़ैसले का अर्से से इंतेज़ार किया जा रहा था जो आज पर हुजूम कमरा-ए-अदालत में सुनाया गया। इस मौक़े पर अदालत-ओ-इस के अतराफ़-ओ-अकनाफ़ सख़्त हिफ़ाज़ती इंतेज़ामात किए गए थे।

शंकर रमन अपने दफ़्तर के कमरा में 3 सितंबर 2004 को तेज़ धार हथियारों से क़त्ल किए हुए पाए गए थे। उन पर रुकमी ग़बन का इल्ज़ाम आइद था। कांची मठ के दोनों शंकर आचार्याओं ने उन पर ग़बन का इल्ज़ाम आइद किया था। उन के क़त्ल के इल्ज़ाम में दोनों शंकर आचार्याओं के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा दर्ज किया गया था।

फ़ैसले पर रद्द-ए-अमल ज़ाहिर करते हुए शंकर रामन के फ़र्ज़ंद आनंद ने कहा कि ये फ़ैसला सदमा अंगेज़ और नाक़ाबिल-ए-यक़ीन है। वो जानना चाहते थे कि अगर मुल्ज़िम बरी कर दिए गए हैं तो उन के वालिद के क़ातिल आख़िर कौन हैं? शंकर रमन की दुख़तर ओमा मायत्री ने भी अदालत में मुल्ज़िमों को शनाख़्त नहीं किया था।

शंकर रमन के फ़र्ज़ंद ने कहा कि वो फ़ैसले का जायज़ा लेंगे और इस के बाद इस के ख़िलाफ़ अपील करने का फ़ैसला करेंगे।

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