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शरई अदालतों पर प्रतिबंध के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से राबता किया जाएगा: मुस्लिम पर्सनल ला

भटकल। मद्रास हाईकोर्ट ने मक्का मस्जिद में चल रही एक शरई अदालत पर प्रतिबंध लगाते हुए सरकार से कहा कि चेन्नई सरकार यह भी आश्वासन दिया है कि इस तरह की कोई अदालत काम न करने पाए। मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के बाद आज भटकल में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना सैयद मोहम्मद राबे हसन नदवी ने ई टीवी के साथ विशेष बातचीत में कहा कि अगर मद्रास हाईकोर्ट ने शरियत के खिलाफ कोई फैसला दिया है तो वह सुप्रीम कोर्ट से राबता करेंगे।

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न्यूज़ नेटवर्क समूह प्रदेश 18 के अनुसार मौलाना ने आशंका जताई कि अदालत को यह कहकर संतुष्ट करने की कोशिश की गई है कि शरई अदालतें देश के न्यायिक व्यवस्था के मुकाबले स्थापित की गई हैं जबकि यह स्पष्ट कर दिया गया है कि शरई अदालतें धार्मिक सुझावों के लिए बनाई गई हैं। मौलाना ने स्पष्ट किया कि शरई अदालत को समानांतर अदालत कहना सही नहीं है।

कोर्ट के इस फैसले के बाद जहां मुस्लिम समुदाय के लोग इसे पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मान रहे हैं और नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं वहीं इस संबंध में ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल गुजरात इकाई के अध्यक्ष मुफ्ती रिजवान तारापुरी ने कहा है कि भारत के मुसलमान अपने कई मसलों को लेकर शरई अदालत में ही जाते हैं और अपने मुद्दे का फैसला करवाते हैं, यह उनका अधिकार है। शरई अदालत में जाना और वहाँ के फैसले को मानना भारतीय कानून के खिलाफ नहीं। साथ ही साथ उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार में वर्षों से ऐसी अदालतें काम करती आई हैं और वहां की सरकारी अदालतें ऐसे मामलों में किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं करतीं तो एक ही देश में दो दो कानून और दो दो फैसले क्यों।

उन्होंने शरई अदालतों के कामकाज के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि शरई अदालतें ऐसे फैसले नहीं सुनाती जिसका अधिकार सरकारी अदालतों को दिया गया है। तो सरकारी कोर्ट ऐसे फैसले क्यों सुनाती है, जिससे मुस्लिम समुदाय के लोगों के अधिकारों का हनन होता हो।

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