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शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार

दिल्ली, 20 सितंबर: अख़लाक़ मोहम्मद ख़ान 'शहरयार' को रविवार को साल 2008 के साहित्य के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया.

दिल्ली, 20 सितंबर: अख़लाक़ मोहम्मद ख़ान ‘शहरयार’ को रविवार को साल 2008 के साहित्य के ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया.

उन्हें ये सम्मान उर्दू साहित्य में उनके योगदान के लिए दिया गया है. हिंदी फ़िल्मों के मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन ने दिल्ली के सिरीफ़ोर्ट ऑडिटोरियम में हुए 44वें ज्ञानपीठ समारोह में उन्हें ये पुरस्कार प्रदान किया.

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इसी विषय पर और पढ़ेंभारत 1936 में उत्तर प्रदेश के बरेली में जन्मे शहरयार उर्दू के चौथे साहित्यकार हैं, जिन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया है.

उनसे पहले फिराक़ गोरखपुरी, कुर्रतुल एन हैदर और अली सरदार जाफ़री को ये सम्मान दिया गया है.

शहरयार को 1987 में उनकी रचना ”ख़्वाब के दर बंद हैं” के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था.

ज्ञानपीठ सम्मान मिलने से ठीक पहले बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेदी से बातचीत में शहरयार ने बेहद ख़ुशी जताते हुए विनम्रता से कहा कि उन्हें कभी-कभी हैरानी होती है कि बिना ज़्यादा प्रयत्न किए इतने बड़े-बड़े सम्मान कैसे मिल गए.

क्लिक करें शहरयार से पूरी बातचीत सुनिए
शहरयार का जन्म उस समय हुआ था जब भारत में प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत हुई थी.

योगदान

1936 से लेकर वर्तमान समय तक उर्दू शायरी ने देश की बदलती परिस्थितियों को साहित्य में अभिव्यक्ति दी है जिसमें शहरयार की क़लम का भी अहम योगदान रहा है.

देश, समाज, सियासत, प्रेम, दर्शन – इन सभी को अपनी शायरी का विषय बनाने वाले शहरयार बीसवीं सदी में उर्दू के विकास और उसके विभिन्न पड़ावों के साक्षी रहे हैं.

आमतौर पर उर्दू शायरी को मुशायरों से जोड़कर देखा जाता है लेकिन शहरयार इसे ठीक नहीं मानते.

उनका कहना है कि देश और दुनिया में जो बदलाव हुए हैं वो सब किसी न किसी रूप में उर्दू शायरी में अभिव्यक्त हुए हैं और वो उनकी शायरी में भी नज़र आता है.

शहरयार की शायरी न तो परचम की तरह लहराती है और न ही कोई एलान करती है वो तो बस बेहद सहजता से बड़ी से बड़ी बात कह जाती है.

शहरयार ने मुश्किल से मुश्किल बात को आसान उर्दू में बयां किया है क्योंकि उनका मानना है कि जो बात वो कहना चाहते हैं वो पढ़नेवाले तक सरलता से पहुंचनी चाहिए.

समझ

शहरयार ने भारतीय सियासत और उसके चरित्र को बख़ूबी समझा है. अपनी एक ग़ज़ल में कहते हैं –

तुम्हारे शहर में कुछ भी हुआ नहीं है क्या
कि तुमने चीख़ों को सचमुच सुना नहीं है क्या
तमाम ख़ल्क़े ख़ुदा इस जगह रुके क्यों हैं
यहां से आगे कोई रास्ता नहीं है क्या
लहू लुहान सभी कर रहे हैं सूरज को
किसी को ख़ौफ़ यहां रात का नहीं है क्या

शहरयार इन पंक्तियों के माध्यम से ये कहना चाह रहे हैं कि लोग या तो सियासी चालों को समझ नहीं पा रहे या फिर समझकर भी अनजान बने हुए हैं. अगर ऐसा है तो ये बेहद ख़तरनाक बात है.

शहरयार ने उमराव जान, गमन, अंजुमन जैसी फ़िल्मों के गीत लिखे जो बेहद लोकप्रिय हुए. हालांकि वो ख़ुद को फ़िल्मी शायर नहीं मानते.

उनका कहना है कि अपने दोस्त मुज़फ़्फ़र अली के ख़ास निवेदन पर उन्होंने फ़िल्मों के लिए गाने लिखे हैं.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू के प्रोफ़ेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए शहरयार 75 साल के हो गए हैं लेकिन उनकी लेखनी अब भी थमी नहीं है.

वक़्त और बदलते हालात को आज भी वो अपनी शायरी में पिरो कर अभिव्यक्त कर रहे हैं और उर्दू के भविष्य को लेकर बेहद आशान्वित हैं.

उनका मानना है कि बाज़ार के दबाव के बावजूद हिंदी और उर्दू जैसी भारतीय भाषाओं का भविष्य बहुत उज्ज्वल है.

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