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शहरों में ज़िंदगी बसर करने वाले मंहगाई से शदीद मुतास्सिर

शहरों में ज़िंदगी बसर करने वाला औसत तबक़ा मुल्क में अफ़राते ज़र की बढ़ती शरह से मुतास्सिर हो रहा है। इस का असर औसत तबक़ा की घरेलू बचत पर भी पड़ रहा है।

शहरों में ज़िंदगी बसर करने वाला औसत तबक़ा मुल्क में अफ़राते ज़र की बढ़ती शरह से मुतास्सिर हो रहा है। इस का असर औसत तबक़ा की घरेलू बचत पर भी पड़ रहा है।

इंडस्ट्री चैंबर एसोचम की जानिब से किए गए सर्वे में ये बात बताई गई। मेट्रो शहरों में ज़िंदगी गुज़ारने वाले ज़ाइद अज़ 82 फ़ीसद शहरियों ने बताया कि वो माली मुश्किलात के शिकार हैं और उन का म्आरे ज़िंदगी गिरता जा रहा है। ये सर्वे एसोचम सोशल डेवलप्मेन्ट फाउंडेशन के ज़ेरे एहतेमाम अंजाम दिया गया।

तक़रीबन 2500 अफ़राद पर सर्वे किया गया जो कि औसत तबक़ा से ताल्लुक़ रखते थे सर्वे में बताया गया कि गरीब घरैलू अफ़राद मौजूदा कीमतों को बर्दाश्त करने के मुतहम्मिल नहीं हो सकते थे जब कि औसत आमदनी वालों से क़ुव्वत खरीद बाहर थी।

डी एस रावत सेक्रेट्री जेनरल एसोचम ने ये बात बताई। ये सर्वे जनवरी 2013 ता मार्च 2013 तीन माह के दौरान बाशमोल दिल्ली, मुंबई, कोलकता, चेन्नाई, हैदराबाद, पूने, अहमदाबाद, चन्दीगढ़ और देहरादून मुल्क के बड़े शहरों में किया गया। उन्हों ने बताया कि तरकारियां, मकान किराया, फ्यूल की कीमतें बढ़ चुकी हैं और बचत तक़रीबन निस्फ़ तक हो चुकी है।

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