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शहर के गरीब बेघर अफ़राद के लिए शब बसरी मराकिज़ ज़रूरी

हिंदुस्तान में साईंस-ओ-टेक्नोलॉजी दिफ़ाई और ज़िंदगी के दीगर शोबों में लाख तरक़्क़ी के बावजूद करोड़ों लोग ¬ऐसे भी हैं जिन्हें दो वक़्त की रोटी , बदन ढाँकने के लिए कपड़े और सर छिपाने के लिए आसरा तक नहीं यही वजह है कि सर्दी के मौसम मे

हिंदुस्तान में साईंस-ओ-टेक्नोलॉजी दिफ़ाई और ज़िंदगी के दीगर शोबों में लाख तरक़्क़ी के बावजूद करोड़ों लोग ¬ऐसे भी हैं जिन्हें दो वक़्त की रोटी , बदन ढाँकने के लिए कपड़े और सर छिपाने के लिए आसरा तक नहीं यही वजह है कि सर्दी के मौसम में अब तक मुल्क के मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर सर्दी से ठिठुर कर 300 से ज़ाइद अफ़राद फ़ौत हो चुके हैं ।

लेकिन गरीबों की इस हालत पर तवज्जा देने वाला कोई नहीं करप्शन का ये हाल है कि बेघर अफ़राद के लिए शेल्टर्स की तामीर के लिए बजट की मंज़ूरी के बावजूद सारा बजट ओहदेदारों की जेबों और बैंक अकाउंट्स में जा रहा है और गरीब शहरी सर्दी की ताब ना लाकर फुट-पाथों पर , उबूरी पुलों के नीचे बस स्टैंड्स या फिर रेलवे स्टेशनों पर तड़पते हुए अपनी जानें दे रहे हैं । ख़ुद हमारे शहर हैदराबाद में भी बेघर शहरियों का कोई पुर्साने हाल नहीं ।

पुराना शहर हो कि नया शहर फुट-पाथों , पार्क्स , रेलवे स्टेशनों , बस स्टैंड्स और सड़कों के किनारे बेतहाशा गरीब लोग पड़े दिखाई देंगे । गरीब शहरियों को शब बसरी के शेल्टर्स ना होने के नतीजा में शहर में हिफ़्ज़ाने सेहत का मसअले पर भी पैदा हो सकता है । बेघर और गरीब लोग रफ़ा हाजत के लिए सहूलतें ना होने के बाइस सड़कों के किनारे और फुट-पाथों पर ज़रूरत से फ़ारिग़ हो रहे हैं नतीजा में हर तरफ़ ग़लाज़त फैल रही है और माहौल आलूदा हो रहा है ।

इन तमाम हक़ायक़ से हुकूमत और मजलिस बलदिया अज़ीमतर हैदराबाद के ओहदेदार अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं वो ये भी जानते हैं कि हमारे तारीख़ी शहर में बैरूनी सैयाह कसीर तादाद में आते हैं । ऐसे में वो यहां बेघर लोगों को देख कर हैरान हो जाते होंगे । ऐसे में हमें सोचना चाहीए कि आख़िर ये लोग शहर हैदराबाद से क्या पैग़ाम लेकर जाएंगे ।

हम ने रात के औक़ात में शहर के मुख़्तलिफ़ मुक़ामात पर देखा कि लोग फुट-पाथों , सड़कों के दोनों किनारों पर दुकानात के साए में बस डिपो , बस स्टैंड्स ऑटो स्टैंड्स और रेलवे स्टेशनों पर सोने के लिए एकदूसरे से लड़ रहे थे । हमारी नज़र ऐसे लोगों पर भी पड़ी जो बड़ी बे फ़िकरी के साथ फुट-पाथों और सड़कों के किनारों पर ज़रूरत से फ़ारिग़ हो रहे थे ।

हम ने ये भी देखा कि बे आसरा लोगों में ख़वातअय्युन की भी कसीर तादाद है और वो भी रात सड़कों पर गुज़ारने के लिए मजबूर हैं जिस के बाइस उन की इज़्ज़तें महफ़ूज़ नहीं। अगर इन गरीबों की ज़िंदगी उन के रहन सहन का जायज़ा लिया जाए तो जिस मुक़ाम पर वो शब बसरी के लिए एक दूसरे के गरीबां पकड़ लेते हैं वहां हम चंद मिनटों के लिए बैठना भी पसंद नहीं करेंगे ।

इस के बावजूद हुकूमत सरकारी ओहदेदार और गैर सरकारी तनज़ीमें इस अहम तरीन इंसानी मसअले पर पर तवज्जा ही नहीं देते । सब से पहले हमें इन गरीबों को इंसान समझना चाहीए तब ही हम में उन के तएं जज़बा इंसानी जागेगा अगर गरीब शहरी जानवरों की तरह ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हों जाएं तो ऐसे में हुकूमत के तरक़्क़ी-ओ-ख़ुशहाली के तमाम दावे खोखले और झूटे साबित होते हैं ।

गैर सरकारी रज़ाकाराना तंज़ीमों और आम शहरियों का भी फ़र्ज़ बनता है कि अपनी घर की चहारदीवारी से निकल कर देखें कि फुट-पाथों या रेलवे स्टेशनों पर या फिर उबूरी पुलों के नीचे ज़िंदगी गुज़ारने वाले गरीब शहरियों का कितना बुरा हाल है ।
कम अज़ कम लोग इंसानियत की बुनियाद पर उन्हें गर्म कपड़े ब्लंकेट्स वगैरह तो फ़राहम करे कम अज़ कम ये तो सोचें कि इंसानियत की ख़िदमत ही सब से बड़ी इबादत है।

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