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शाम के रिलीफ़ कैंप में लोग ग़िज़ा के मोहताज

मुल्के शाम में गुज़िशता ढाई साल से जारी ख़ाना जंगी के बाइस आम शहरियों की ज़िंदगी पर इंतिहाई मनफ़ी असरात मुरत्तिब हुए हैं। मईशत की ज़बूँहाली और परेशानियों के सबब मुतास्सिरा लोग मकरूह जानवरों कुत्ते गधे और बिल्ली के गोश्त से भूक मिटान

मुल्के शाम में गुज़िशता ढाई साल से जारी ख़ाना जंगी के बाइस आम शहरियों की ज़िंदगी पर इंतिहाई मनफ़ी असरात मुरत्तिब हुए हैं। मईशत की ज़बूँहाली और परेशानियों के सबब मुतास्सिरा लोग मकरूह जानवरों कुत्ते गधे और बिल्ली के गोश्त से भूक मिटाने पर मजबूर हो गए हैं। 21 वीं सदी के इस जदीद और तरक़्क़ी याफ़ता दौर में ऐसी सूरत-ए-हाल का तसव्वुर भी मुहाल है।

इस से पहले 1590 में फ़्रांसीसियों को ऐसी सूरत-ए-हाल का सामना करना पड़ा था लेकिन दुनिया का ये ख़्याल था कि शायद इस के बाद ये तजुर्बा कहीं भी नहीं दोहराया जाएगा लेकिन सदर शाम बशार अलासद के मज़ालिम के बाइस फिर तारीख़ ख़ुद को दोहरा रही है। दमिशक़ के क़रीब यरमौक मुहाजिर कैंप के बारे में जो तफ़सीलात सामने आई हैं वो एक आम इंसान के लिए लर्ज़ा ख़ेज़ हैं। बताया जाता है कि इस कैंप में रहने वाले भूक मिटाने के लिए ग़िज़ा से महरूम हैं।

चुनांचे मजबूरी की हालत में ये लोग आवारा कुत्तों और बिल्लियों हत्ता कि गधे का गोश्त खा कर अपना पेट भर रहे हैं। क्योंकि उनके पास अब कोई मुतबादिल रास्ता नहीं रहा। इस कैंप में ग़िज़ा का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि ये कैंप गुज़िश्ता तीन माह से सरकारी फ़ौज के मुहासिरा में है और वो किसी को खाने की चीज़ें लेजाने से रोक रही है।

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