Wednesday , May 24 2017
Home / India / सकारात्मक सोच के साथ पहल की भी आवश्यकता है

सकारात्मक सोच के साथ पहल की भी आवश्यकता है

किसी भी देश के गैर सरकारी संगठन देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दिल्ली स्थित चरखा डेवलपमेंट कम्यूनिकेशन नेटवर्क एक ऐसा ही गैर सरकारी संगठन है जो पिछले कई वर्षो से दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को जागरूक करने के लिए प्रयासरत है। ताकि हर नागरिक अपने स्वास्थ्य के साथ- साथ विकास के प्रति भी आश्वस्त हो। क्योंकि विकास के लिए स्वस्थ होना सबसे पहली प्राथमिकता है।

इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती जिला पुंछ में 2014 के आरंभ में कैडेन्स नामक सर्वेक्षण एजेंसी द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा और साफ सफाई अर्थात हाईजीन पर एक सर्वेक्षण करवाया था, जिसकी रिपोर्ट नवंबर 2014 में आई। रिपोर्ट के अनुसार “यूनिसेफ की रिपोर्ट में कहा गया कि कुल भारतीय आबादी के 54 प्रतिशत लोग शौच के लिए खुले मैदानों में जाते हैं,जबकि 50 प्रतिशत यानी आधी आबादी शौच के बाद साबुन से हाथ धोते हैं “।

इस संगठन ने सीमावर्ती जिला पुंछ के छह गांवों को सर्वेक्षण में शामिल किया  जिनमें  खनैतर,  सलोतरी, सुरनकोट, शीनदरा,मरहोट मीडिल तथा चंडीमढ़ सम्मिलित हैं।

सर्वेक्षण द्वारा मालूम हुआ कि 41 प्रतिशत लोगों के घरों में शौचालय है। इनमें चंडीमढ़ में 69 प्रतिशत, खनैतर में 57 प्रतिशत, शीनदरा निम्न और मरहोट मीडील में मात्र 21 प्रतिशत जबकि सीमावर्ती गांव सलोतरी में 33 प्रतिशत लोगों के घरों में शौचालय है। ध्यान देने योग्य बात है कि इन गांवों के अधिकतर लोगों ने स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए खुद ही शौचालय बनवाए हैं। प्रतिशतों के आधार पर अगर इस रिपोर्ट की समीक्षा की जाए तो 84 प्रतिशत लोगों ने शौचलाय के लिए खुद ही पहल की है, जबकि  49 प्रतिशत ने  अपने परिवार के कहने पर और 3 प्रतिशत नें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के कहने पर इस ओर ध्यान दिया है।

हालांकि सरकार ने ट्वैलेट सैनीटेशन कैंपेन, निर्मल ग्राम अभियान आदि योजनाओं के अंतर्गत यह घोषणा जरुर की है कि वह शौचालय बनवाने के लिए जनता को वित्तिय सहायता प्रदान करती है ताकि लोग इन योजनाओं का लाभ उठा सकें। मगर सर्वेक्षण रिपोर्ट इन योजनाओं की वास्तविक स्थिति को लोगो के सामने लाकर संबधित अधिकारियों का मार्गदर्शन भी करती है कि 94 फीसदी लोगों ने अपने प्रयासों से शौचालय बनवाया है जबकि 4 प्रतिशत लोगों को सब्सिडी या अनुदान प्राप्त हुआ है और सरकार द्वारा दी जाने वाली योजनाओं के तहत मात्र 2 प्रतिशत लोग ही लाभान्वित हो पाए हैं। शौचालय निर्माण न करवाने वालों के अनुसार ” हम चाहते हैं कि शौचालय हमारे घरों में भी हो, मगर इसके निर्माण का खर्च वहन करने की शक्ति नहीं है।”

एक रिपोर्ट के अनुसार 81 प्रतिशत लोगों का मानना ​​है कि यह बहुत ख़र्चीला है, 24 प्रतिशत के अनुसार शौचालय निर्माण के लिए हमें कोई सब्सिडी नहीं मिल पाई है, 8% ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने शौचालय निर्माण करने की अनुमति नहीं दी, जबकि 4% लोगों ने अन्य समस्याएं बताई। इस संबध में अगर इनके घरों में शौच के बाद हाथ धोने और पानी इस्तेमाल करने की बात की जाए तो उक्त सभी गांवों के 87 प्रतिशत लोगों के यहां शौचालय में पानी, जबकि 81प्रतिशत लोगों के यहां हाथ धोने को महत्व दिया जाता है। जिसके लिए 96 प्रतिशत लोग साबुन, 3  प्रतिशत राख, जबकि 1प्रतिशत कुछ भी उपयोग नहीं करते।

धरातलीय स्थिति को जानने और सरकारी स्कूलों की समीक्षा के लिए जब स्थानीय लोगों से बात की गईं,तो जिला पुंछ की तहसील सुरनकोट के गांव हाड़ि से “सुनी युथ विंग” के तहसील अध्यक्ष शाहनवाज कादरी के अनुसार ” हाड़ि के कई स्कूलों में शौचालय नहीं है तो कहीं शौचालय के बावजूद पानी नही है। जबकि सरकार की ओर से स्कूलों में शौचालयों निर्माण के लिए राशि प्रदान कि जाती हैं”। चरखा के ग्रामीण लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता मौहम्मद रियाज मल्लिक कहते हैं ” भारत के विभिन्न राज्यों में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं , लेकिन वास्तविक रुप में इस तथ्य को देखा जाए तो अभी तक यह नियम केवल सदनों में शोरशराबे के लिए ही इस्तेमाल हो रहे हैं।  जम्मू-कश्मीर के कई शिक्षण संस्थानों में अब तक लड़कियों को शौचालय नहीं मिल पा रहा है”।

हाई स्कूल अड़ाई में अध्ययन कर रही नौवीं कक्षा की छात्राएं मोबीना कौसर, सलमा बानो और नुसरत बानो ने बताया “यहां एक ही शौचालय है जो लड़के उपयोग करते हैं, छात्राओं के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है। इतना ही नहीं प्राइमरी स्कूल से लेकर हाई स्कूल तक ज्यादातर सरकारी स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था नहीं है”। ज़िला पुंछ का पड़ोसी जिला रजौरी की तहसील दरखाल के गांव मडोन डोडवाज से एक छात्रा ने बताया ” जबरी के  सरकारी मीडिल स्कूल में शौचालय नहीं हैं। एक सौ छात्र यहाँ अध्ययन कर रहे हैं इनमें लड़कियों की संख्या अधिक है पर शौचालय न होने के कारण शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है”।

प्राथमिक विद्धालय छलाल बगला की बात की जाए तो इस स्कूल में भी शौचालय नहीं है। जिला पुंछ से जुड़े कश्मीर घाटी के जिला शोपियां के स्थानीय स्कूल की शिक्षिका रोक्कया कहती हैं कि “शोपियां के अधिकांश स्कूलों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध हैं, लेकिन दूरदराज के क्षेत्रो में शौचालय की काफी कमी है, कारणवश लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं”।

इसलिए सरकारों और संबंधित विभागों को चाहिए कि जब कोई सर्वेक्षण उन्हे धरातल स्थिति से अवगत कराए तो उसका विरोध करने के बजाय अपने विकास कार्यों की समीक्षा करें ताकि  पाई जाने वाली तमाम त्रुटियों को दुर किया जा सके। निसंदेह इससे देश की सीमा में विकास की गति तेज होगी और भविष्य में हम अपने पड़ोसियों के अलावा दुनिया के अन्य देशों को भी विकास की राह पर अग्रसर करने में मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं।

मौहम्मद अनिस उर रहमान खान
(चरखा फीचर्स)

 

Top Stories

TOPPOPULARRECENT