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सय्याहों की वजह से तारीख़ी मक्का मस्जिद की बेहुर्मती

नुमाइंदा ख़ुसूसी- हम मक्का मस्जिद में बैठे साथी से किसी मौज़ू पर गुफ़्तगु कररहे थे कि अचानक मेरी निगाह मस्जिद के अंदर खड़े एक अंग्रेज़ पर पड़ी । में उसे देखता ही रह गया । इस के पैर पूरे खुले हुए थे । नेकर में वो मस्जिद के अंदर खड़ा थ

नुमाइंदा ख़ुसूसी- हम मक्का मस्जिद में बैठे साथी से किसी मौज़ू पर गुफ़्तगु कररहे थे कि अचानक मेरी निगाह मस्जिद के अंदर खड़े एक अंग्रेज़ पर पड़ी । में उसे देखता ही रह गया । इस के पैर पूरे खुले हुए थे । नेकर में वो मस्जिद के अंदर खड़ा था । ख़ाना ख़ुदा की इस बेहुर्मती को देख कर में हैरत में पड़ गया और दौड़ कर मैं ने इस का फ़ोटो ले लिया । क़ारईन !मसाजिद की ताज़ीम के सिलसिला में क़ुरआन की आयत है उन घरों में हुक्म दिया अल्लाह ने कि इन की ताज़ीम की जाय और उन में इस का नाम लिया जाय और सुबह-ओ-शामइन में इस की पाकी बयान की जाय । (अल-नूर 36 ) । ए आदम की औलाद तुम मस्जिद की हर हाज़िरी के वक़्त अपना लिबास ज़ीनत पहन लिया करो (अलाअराफ़ 31 ) ।

इस आयत से मुफ़स्सिरीन ने इस्तिदलाल किया है कि मस्जिद की हाज़िरी में हईयत हत्त-उल-वुसा अच्छी हो । रवाना होते हुए एक नज़र अपनी ज़ाहिरी हईयत पर डाल ली जाय । येयक़ीन करते हुए जाय कि हम एक अज़ीम एल्मर तिब्बत दरबार को जा रहे हैं । उतना अज़ीम कि उसे हदीस में दुनिया की जन्नत से ताबीर किया गया है इस लिये जहां हर तरह की नजासत हक़ीक़ी और हुक्मी से पाक हो कर जाना ज़रूरी है । क़ुरआन हिदायात की रोशनी में हम अपनी मसाजिद का जायज़ा लिया तो मुआमला बिलकुल बरअक्स नज़र आता है । मक्का मस्जिद जो हिंदूस्तान की क़दीम तारीख़ी और मशहूर तरीन मसाजिद में से एक है । दूर दराज़ से स्याह उसे देखने आते हैं जिन में मज़हब का कोई इम्तियाज़ नहीं रहता बल्कि गैर मुस्लिम उस वक़्त ज़्यादा मक्का मस्जिद में आरहे हैं ।

यूरोपियन ममालिक से आए हुए अंग्रेज़ों की बड़ी तादाद भी यहां आरही है । अंग्रेज़ मर्द-ओ-ख़वातीन अपनी तहज़ीब के मुताबिक़ आधे लिबास में मस्जिद में दाख़िल होते हैं नीज़ दीगर क़ौम की लड़कियां भी इंतिहाई कम और फ़हश कपड़ों में मस्जिद के अहाते में दाख़िल होती हैं और उन की ब्रहंगी से महज़ूज़ होने के लिए ओबाश किस्म के कुछ नौजवान भी उन के पीछे होते और दीगर सयाहती मुक़ामात की तरह मक्का मस्जिद में भी वो तमाम बे हयाएआं की जाती हैं जो ना सिर्फ मस्जिद के अदब के ख़िलाफ़ है बल्कि मुआशरा के भी ख़िलाफ़ है । गले में हाथ डाल कर बैठना , बातें करना , एक दूसरे की तस्वीरकशी करना , भागना दौड़ना और दीगर तमाम हरकतें की जाती हैं ।

आज मक्का मस्जिद को भी बाज़ार बना दिया गया । जहां तक मुस्लिम मर्द-ओ-ख़वातीन की बात है तो वो ख़ुद भी इस के ज़िम्मेदार और जवाबदेह हैं । लेकिन गैर मुस्लिम और अंग्रेज़ों का एहसास में क्या क़सूर है । उन्हें क्या मालूम कि आदाब मस्जिद क्या हैं । मस्जिद में किस हाल में दाख़िल होना चाहीए अंदरून मस्जिद कुन-ओ-मुग़ां की इजाज़त है किन की नहीं । ये वहां मौजूद इंतिज़ामीया के अफ़राद की ज़िम्मेदारी है कि वहां होरही बेहयाई पर कंट्रोल करें और ख़ाना ख़ुदा को बेहुर्मती और बेअदबी से महफ़ूज़ रखें । नियम ब्रहना हालत में अंदर जाने की इजाज़त ना दी जाय । बल्कि इस के लिए कोई अच्छा हल तलाश किया जाय ।

दिल्ली की जामि मस्जिद के अंदर जिस पर अमल होता है इस तरीका को भी इख़तियार किया जा सकता है वहां हर दरवाज़ा पर बगैर सिल्ली लनगयां मौजूद होती हैं । नियम ब्रहना अश्ख़ासके लिए वो लनगयां बांध कर ही अंदर जाने की इजाज़त होती है और सख़्ती से इस पर अमल होरहा है । हम भी यहां इसी लनगयां मुहय्या करसकते हैं नीज़ मस्जिद में आते हुए जोड़ों पर नज़र रखी जाय अगर वो कोई नाज़ेबा हरकत करते हैं तो उन्हें मुतनब्बा किया जाय । यह बाहर कर दिया जाय । दीगर मज़ाहिब के इबादत ख़ानों को आप देख लें कि वहां हल्की आवाज़ से भी गुफ़्तगु करने की इजाज़त नहीं होती ।

इबादतखाना के अदब के तौर पर बिलकुल ख़ामोशी छाई रहती है । गुरुद्वारे में कोई बगैर सर ढके नहीं जा सकता ।नीज़ बीड़ी सिगरेट लेकर भी नहीं जा सकता । क्या हमारी मसाजिद इतनी बेवुक़त होगई हैं कि इन में जो चाहे जैसे चाहे आए और जो चाहे हरकत करे । जब कि मसाजिद के जितने आदाब हैं दीगर इबादत ख़ानों के इतने आदाब भी नहीं । हमें अपनी लापरवाही और ग़फ़लतपर तवज्जा करनी चाहीए । और मक्का मस्जिद में मौजूद इंतिज़ामी ढांचा को फ़आल और सरगर्म करना चाहीए ।

आदाब मस्जिद को सख़्ती से नाफ़िज़ करना चाहीए नीज़ आदाब-ओ-उसूल पर मुश्तमिल एक बड़ा सा बोर्ड उसी जगह नसब करना चाहीए जिसे हर कोई पढ़े और ख़िलाफ़वरज़ी और बेअदबी पर सख़्त नोटिस लिया जाना चाहीए । मक्का मस्जिद और बाग़-ए-आम की जामि मस्जिद महिकमा इकलियती बहबूद के ज़ेर इंतिज़ाम है जिस के सदर जनाब अहमद उल्लाह हैं उन के इंतिज़ामीया और मक्का मस्जिद में मौजूद उन के कारकुनान को चाहीए कि लापरवाही , सस्ती , ग़फ़लत और बे तवज्जही ख़तम कर के इस्लामी ढंग से अल्लाह के घर की हिफ़ाज़त और देख रेख करें और मस्जिद के अहाता में होरही बेहयाई और बे हौदगी पर कंट्रोल करें ।

नीज़ दावती तनज़ीमों को चाहीए कि दीगरमुक़ामात के साथ साथ मक्का मस्जिद को भी दावती मुक़ाम बनाएं । ये मुक़ाम दावत के लिए बहुत साज़गार साबित होसकता है । यहां हर कोई इस्लामी चीज़ें देखने ही आता है । अगर इस्लामी प्रोग्राम के ज़रीया इस्लामी अक़ाइद-ओ-अकली दलायल के साथ नज़रिया तौहीद , अरकान-ए-इस्लाम , इस्लाम में मस्जिद की अहमियत और इस के आदाब-ओ-एहतिराम से उन्हें रोशनास कराएं तो वो सब उन प्रोग्रामों को दिलचस्पी से देखेंगे और सुनेंगे और कुछ ना कुछ इस का असर भी लेकर जाएंगे ।।

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