Wednesday , October 18 2017
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सरकारी मुलाज़मीन की भी हड़ताल ख़तम

तलंगाना की तशकील के लिए यूं तो पहले भी कई तारीखें दी गईं। तारीख़ गुज़रती गईं सरकारी मुलाज़मीन ने नई तारीख़ का ताय्युन किए बगै़र ही अपनी 42 रोज़ा तवील तारीख़ी हड़ताल को ख़तम करके एक नई तारीख़ बना दी।

तलंगाना की तशकील के लिए यूं तो पहले भी कई तारीखें दी गईं। तारीख़ गुज़रती गईं सरकारी मुलाज़मीन ने नई तारीख़ का ताय्युन किए बगै़र ही अपनी 42 रोज़ा तवील तारीख़ी हड़ताल को ख़तम करके एक नई तारीख़ बना दी।

ढेड माह से तलंगाना की ख़ातिर अपनी तनख़्वाहों, रोज़गार काम काज, अवाम की जरूरतों को बालाए ताक़ रख कर हड़ताल करने वाले सरकारी मुलाज़मीन की यूनियनों ने चीफ़ मिनिस्टर किरण कुमार रेड्डी के आगे घुटने टेक दिए या अपने ग़ुस्से को कम करके अवाम के हक़ में हड़ताल वापिस लेने का फ़ैसला किया।

कल तक हड़ताल में शिद्दत लाकर तलंगाना के हुसूल का अज़म रखने वालों को दीवाली के मौक़ा पर कुछ ख़ास पेशकश की गई तो हड़ताल ख़तन करने का ऐलान किया गया। आर टी सी मुलाज़मीन, असातिज़ा, सिंगारीनी कालरीज़ के मुलाज़मीन की हड़ताल ख़तन कराने में कामयाब हुकूमत ने सरकारी मुलाज़मीन को भी तलंगाना के सिवा सब कुछ देने का वाअदा करके हड़ताल ख़तन कराने में कामयाबी हासिल कर ली।

इस हड़ताल में हर दो यानी हुकूमत और सरकारी मुलाज़मीन दोनों कामयाब रहे ख़सारा तो अवाम का हुआ इन किसानों, रोज़मर्रा मज़दूरी करने वाले वर्कर्स, छोटे छोटे ताजिरान का ख़सारा हुआ जिन्हें हड़तालों की वजह से रोटी रोज़ी से महरूमी के इलावा दीगर कई मसाइब का शिकार हुए थे।

कहां उम्मीदों का मर्कज़ तलंगाना और कहां आरिज़ों की चादर ओढ़े फ़रेबी ताक़तों के झांसे में आने वाले सरकारी मुलाज़मीन ये सब एक बुलबुला पानी का साबित हुए और चंद दिन गुज़रने के बाद तलंगाना का आम शहरी फिर सोचेगा कि उम्मीदों का उगला मर्कज़ कौन होगा? तलंगाना के मर्कज़ी अनासिर क्यों ख़ामोश हो गई।

जिन मुलाज़मीन ने हड़ताल ख़तन करके दीवाली से क़बल रुजू बिकार होने का फ़ैसला किया उन्हें रियास्ती हुकूमत पर कशिश और ख़ुसूसी एडवांस देगी ताकि वो ये दीवाली धूम धाम से मना सकें क्यों कि इन लोगों ने दुसहरा ख़ामोशी से भी नहीं मनाया उन के बच्चे नए कपड़े भी नहीं ख़रीद सके थे और ये चाहते थे कि रियास्ती हुकूमत उन के जज़बात का एहतिराम करके उन के मासूम बच्चों की तहवार की ख़ुशीयों से महरूमी पर रहम खाकर तलंगाना का फ़ैसला करने मर्कज़ पर दबाव डालेगी मगर दुसहरा चुपके से गुज़र गया हुकूमत पर कोई असर नहीं हुआ।

सरकारी मुलाज़मीन के घरों में दुसहरा की ख़ुशीयां मानद पड़ गईं चीफ़ मिनिस्टर ने इस का कोई नोट नहीं लिया इस लिए बेचारे सरकारी मुलाज़मीन दीवाली को भी यूं ही तारीक राहों की नज़र करने से बचना चाहते थे अपने घरों को दीवाली के दीपों से रोशन रखना चाहते थे इस लिए अपने बच्चों को नए कपड़े मिठाईयां लाकर देना चाहते थे इस लिए हड़ताल ख़तम करके अवाम की ख़िदमत के इव्ज़ अपने घरों को रोशन करने का बहाना तलाश कर लिया।

रियास्ती मुलाज़मीन की ये सब से तवील तरीन हड़ताल थी इस का रियास्ती हुकूमत और मर्कज़ पर कोई असर हो ना हो मगर आम शहरीयों को ज़बरदस्त मुश्किलात से दो-चार होना पड़ रहा था। सरकारी ख़ज़ाना को करोड़ों रुपय का ख़सारा हो रहा था और हुकूमत के लिए अपने ख़ज़ाना और कुर्सी को बचाना था अवाम को दरपेश मुश्किलात पर तवज्जा देने से ज़्यादा उसे मर्कज़ की मर्ज़ी का ख़्याल रखता था। इस लिए तलंगाना अवाम के उम्मीदों के मर्कज़ को चंद लाख मुलाज़मीन के आर्जोव का तवाफ़ करने के बाद हुकूमत ने हड़ताल ख़तम होने का ऐलान किया।

अब तलंगाना के लिए तारीखें देने वाले लोग दीवाली के मौक़ा पर अपने बाल वाल संवार कर, चेहरे पर क्रीमें लगाके और उजले कपड़े पहन कर दीपावली मनाएंगी।

तलंगाना में एक ग़रीब का घर गुज़श्ता दो साल से रोशनी से महरूम ही, किसान पानी की अदम सरबराही बर्क़ी की मसदोदी से फसलों के नुक़्सानात का शिकार है, रोज़ाना उजरत पर काम करने वाला मज़दूर अपनी कई उजरतों से हाथ धो बैठा है इस के पास दीपावली के दीप जलाने या बक़रईद के नए कपड़े पहनने की इस्तिताअत बाक़ी नहीं रही। इस ने तलंगाना का दम भर कर जज़बात को हुआ देने वाले क़ाइदीन की ख़ातिर अपना ख़सारा बर्दाश्त करलिया। तलंगाना फिर भी हासिल ना किया जा सका।

बिलाशुबा तलंगाना का सयासी वीज़न मदारी का खयील बन कर रह गया। इस का अमली मुज़ाहरा यहां के अवाम गुज़श्ता चंद माह से देख रहे थी। हाँ उसूलों के लिए ईसार करने वाले क़ाइदीन अब भी अपने मुतालिबा पर अटल हैं इन का अज़म पुख़्ता है कि वो तलंगाना की ख़ातिर अपनी जान की बाज़ी भी लगा दें गे और मर्कज़ को मजबूर करके ही रहेंगी।

बशर्ते के इन का जज़बा और जान की बाज़ी का हौसला यूं ही बरक़रार रहे क्यों कि वो जिस मर्कज़ी दीवार से सर टकरा रहे हैं यहां इस से पहले भी कई सर लहूलुहान होचुके हैं, सयासी बसीरत और वीज़न रखने वाले लोग भी यहां आकर हिम्मत हार चुके हैं उसे मर्कज़ और हाईकमान की नेक नीयती दियानतदारी और बहादुरी कही जाय कि वो अपने खु़फ़ीया मिशन से टस से मस नहीं हुई।

हर एक का अपना मिशन होता है और जो कोई मिशन में कामयाब होता है उन की अपनी नज़र में वो दियानतदारी और हिम्मत की वजह से कामयाबी नसीब होती है मर्कज़ को अवाम से साथ धोका देने का मलिका हासिल है तो तलंगाना के क़ाइदीन ने अपनी 50 साला जद्द-ओ-जहद वाली ज़िंदगी में मर्कज़ के खु़फ़ीया मिशन या इस के मंसूबों का पता चलाने के लिए कोई मुजाहिदाना रोल अदा नहीं किया और ना ही इतना शऊर पैदा हो सका कि आख़िर तलंगाना हासिल करने के लिए कौनसी जड़ी बूटी का नुस्ख़ा तैय्यार किया जा सकी।

माज़ी के अपने तमाम वादों और मुतालिबात से चिमटे रह कर तलंगाना के लिए हर उसूलों के लिए कोई क़ुर्बानी ना देने का जज़बा रखने वालों पर बहरहाल हुकूमत के बेउसूल मुशीरों ने ग़लबा हासिल कर लिया।

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