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सरकारें फर्जी एनकाउंटर कराती है फिर अपने बचाव के लिए राष्ट्रवाद का चोला ओढ़ लेती है- मनीषा सेठी

फ़हद सईद

नई दिल्ली: आम आदमी समाज में सबसे ज्यादा कमजोर माना जाता है। कहा जाता है कि कानून ही उसकी ताकत है। इसी कानून की मदद से वह अपराध, अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है लेकिन यही कानून तब उसे असहाय और बेबस कर देता है जब पुलिस उन्हीं कानूनों का दुरुपयोग आम जनता के खिलाफ करती है। फेक इनकाउंटर हो या कोई और मामले पुलिस अधिकतर में से इन्हीं कानून का सहारा लेकर अपना बचाव कर लेती है। सेक्शन 46 उन्हीं कानूनों में से एक है जो पुलिसिया दुरूपयोग का सबसे अधिक भेंट चढ़ता है। ये सभी बाते मनीषा सेठी ने जामिया कलेक्टीव के के प्रोग्राम ‘गुफ्तगु’ में कही। ‘गुफ्तगु’ में उन्होंने ‘एनकाउंटर किलिंग एंड इंडियन स्टेट डेमोक्रेसी’ विषय पर अपनी बात रखी।

सेठी ने कहा कि देश का सिस्टम कई मौकों पर फेक इनकाउंटर को जायज ठहराता है। अक्सर राज्य कानून का गलत इस्तेमाल कर मानवाधिकार के ताकत को कम करने में करता है। सुप्रीम कोर्ट भी यह बात मानता है कि मुठभेड़ फर्जी हो सकते हैं इसलिए पीड़ि‍त पक्ष सेशन कोर्ट में उसके खिलाफ मामला दर्ज करा सकता है।

आर्टिकल 21 देश के नागरिकों को यही हक देता है। यह कानून एक नागरिक को अपना डिफेंस करने का हक देता है। इस कानून में कहीं ऐसा नहीं लिखा है कि हम पुलिस के खिलाफ एफआईआर नहीं करा सकते। हाल ही में हुए भोपाल एनकाउंटर से लेकर देश में अबतक हुए एनकाउंटर को देखा जाए तो एफआईआर उनके खिलाफ किया गया जो पीड़ित पक्ष था। सेठी ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि हमने 1995 से 2004 तक दिल्ली में हुए एनकाउंटर पर RTI डाला पर किसी भी आरटीआई में हमने पुलिसवालों का नाम नहीं पाया था जो एनकाउंटर में शामिल था। सभी में नाम उनका दिया गया था जो एनकाउंटर के शिकार हुए थे। यानी पुलिस उन मरे हुए लोगों को ही कसूरवार बताती है जो अदालत में आकर गवाही नहीं दे सकते कि उन्होंने ये जुर्म नहीं किया था या नहीं। पुलिस अपनी एफिडिवेट में भी बहुत चलाकी से अपनी सुरक्षा करती है। पुलिस अधिकतर यह दलील देती है कि चूंकि वो आतंकवाद और नक्सलवाद से लड़ रही है इसलिए उसपर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। भोपाल एनकाउंटर में भी यही हुआ है।

सिमी के नाम पर देश भर में हुई गिरफ्तारी के चार्जशीट को देखा जाए तो तकरीबन सभी मामलों में एक कॉमन बात लिखा मिलता है कि गिरफ्तार व्यक्ति के पास से बैन-साहित्य पाया गया। मगर आजतक सरकार की तरफ से कोई ऐसी परिभाषा नहीं दी गई है कि बैन-साहित्य क्या है। सबसे पहले सरकार को बैन-साहित्य की लिस्ट जारी करनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता है। आमतौर पर उर्दू या अरबी के साहित्य को देख पुलिस अपने कान खड़े कर लेती और उसे बैन-साहित्य घोषित कर देती। भले ही उस साहित्य का कंटेंट कुछ भी हो।

कश्मीर में का गलत इस्तेमाल हो या छत्तीसगढ़ में नकस्लवाद की आड़ में आदिवासियों का दमन, सभी कानून को ढाल बनाकर किया जाता है। कश्मीर में इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। बटला हाउस एनकाउंटर से लेकर भोपाल एनकाउंटर तक कठघरे में पुलिस की कार्यवाई बेहद बर्बरता वाले रहे हैं। उसके काफी सबूत समय-समय पर सामने आते रहे हैं मगर सारे सबूतों के बावजूद लोगों को सवाल करने का अधिकार नहीं दिया जाता और फेक एनकाउंटर को देशहित में बता दिया जाता है।

 

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