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सरकार से बंधी है विकलांगो की आशाएं

वो जन्म से विकलांग नहीं था। पाँचवीं कक्षा तक खुद स्कूल जाता था। लगभग आठ साल की उम्र में अचानक किसी बीमारी का शिकार हो गया, अब हालात यह हैं कि चलना फिरना तो दूर खुद खाना भी नहीं खा सकता, लिटाने-बिठाने के लिए हर पल दूसरे का मोहताज है। जी हां ये है फ़राअत जो स्वर्ग रुपी जिला पुंछ के गांव शीनदरा मे रहता है। फराअत की यह स्थिति कब और कैसे हुई इस बारे मे उसके पिता कबीर हुसैन शाह बताते है अचानक उसकी गर्दन में कुछ ऐसा हुआ जिसकी वजह से उसके दोनों पैर कमजोर पड़ने लगे और इतने कमजोर हो गए कि पैर के बल चलना फिरना तो दूर पैरों को हिलाना भी मुश्किल हो गया। जहां एक बार उसे लेटा दो वो वहीं लेटा रहता है । फराअत के दिल में सुराख भी है जिसकी वजह से काफी मुश्किलों का सामना कर रहा है। जबकि बचपन मे वो इतना बुद्धिमान था कि एक बार डॉक्टर ने उसे चेक करने के बाद मशीन रखी तो कुछ ही देर में उसने उसी मशीन से खुद की जाँच शुरू कर दी। डॉक्टरों के अनुसार इसका इलाज संभव है और इलाज के बाद वह पहले की तरह ठीक हो जाएगा | वो आगे कहते हैं फराअत 80 प्रतिशत विकलांग है जिसका मेडिकल प्रमाण पत्र हमारे पास है। सरकारी सहायता के रूप मे मात्र 400 रुपये की पेंशन के अलावा कुछ भी नहीं मिलता है। इस पेंशन से इसका इलाज करवाना असंभव है |फराअत के पिता एक मज़दुर हैं। अपनी दैनिक मजदूरी से परिवार चलाते हैं। ऐसे मे फराअत की दवा का इंतजाम किस तरह करते हैं? इस सवाल के जवाब मे वो कहते हैं बड़ी मुश्किल से उसकी दवाई की लागत पूरी कर रहा हूँ और कई बार दुसरों से भी कर्ज लेना पड़ता है। फराअत की तरह एक और छात्र इकराम अहमद है। पोलियो से पीड़ित होने के बाद भी हिम्मत न हारते हुए इकराम अबतक स्कूल तो जा रहा है लेकिन भविष्य मे इकराम कभी भी अपने पैरों को खो सकता है क्योंकि उसके शरीर के अंग काफी कमजोर हो चुके हैं। उसके घर से स्कूल भी बहुत दूर है। इकराम की मां के अनुसार उसे पढ़ने का इतना शौक है कि बरसात के मौसममें वह लड़खड़ाते हुए पैदल ही स्कूल जाता है। इकराम के पिताबताते हैं उसे शौच के लिए बाहर खुले में जाना पड़ता है जिसके कारण उसको अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मालुम हो कि इकराम भी इसी राज्य के सीमावर्ती जिला पुंछ के गांव खनेतर का रहने वाला है। ये सिर्फ इकराम और फरात की कहनी नही है बल्कि इस समय जम्मू कशमीर मे इकराम और फराअत जैसे कई विकलांग बच्चे हैं जिन्हे सरकारी मदद और व्हील चेयर की जरुरत है जिससे उनकी विकलांगता की कठिनाइयँ दूर हो। इस संबध मे वर्ष 2015 में दिल्ली स्थित गैर सरकारी संगठन चरखा डेवलपमेंट कम्युनिकेशन नेटवर्क द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार जिला पुंछ में विकलांग महिलाओं की संख्या 35 प्रतिशत है। जबकि पुरुषों की संख्या दोगुनी करीब 65 प्रतिशत है। अगर उम्र के हिसाब से आकलन किया जाए तो दस साल से कम उम्र के विकलांग बच्चों की संख्या 7 प्रतिशत, जबकि दस से बीस साल के विकलांगों की सबसे बड़ी संख्या यानी 30 प्रतिशत और 21 से 30 साल के विकलांग 20 प्रतिशत हैं। इसी तरह 31 से 40 साल के विकलांग 15 प्रतिशत हैं, 41 से 50 साल के विकलांग 10 प्रतिशत, 51 से 60 साल के 6 प्रतिशत, 61 से 70 साल के 4 प्रतिशत 71 से 80 साल के महज दो प्रतिशत और 81 से 90 साल के एक प्रतिशत विकलांग हैं।

 

उक्त सर्वेक्षण से इस बात का अंदाजा बखूबी लगाया जा सकता है कि युवा विकलांग लोगों की संख्या जिला पुंछ में 30 प्रतिशत है और जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है विकलांगों की संख्या कम होती जाती है, जबकि बच्चों और युवाओं की बड़ी संख्या विकलांग है। हाल के दिनों मे जो दुर्घटनाएं हुई हैं उनमें लगभग सौ से अधिक लोग शारीरिक विकलांग होकर अपने परिजनों का सहारा बनने के बजाय उन का ही सहारा लेने को मजबूर हैं। इस स्थिति को धरती का जन्नत कहे जाने वाले कशमीर का दुर्भाग्य कहें या लोगो की गलती का परिणाम??? दोनो ही रुपमे सजा कशमीर की आवाम को ही भुतना पड़ रहा है। इंसानों से इंसानों की शिकायतें उचित नहीं लगती, लेकिन इंसानों से प्रकृति और प्रकृति से मनुष्य की शिकायत की गुंजाइश निकाली जा सकती है। इसलिए मौजूदा विकलांगता पर बहस करना व्यर्थ मालूम होता है, लेकिन प्राकृतिक या आकस्मिक विकलांगता पर तो बात की ही जा सकती है। पाठकों को ज्ञान में वृद्धि करता चलूं कि सरकार की ओर से यहां के विकलांगों को मात्र चार सौ रुपये पेंशन के रुप मे मिलते हैं लेकिन उनकी बढ़ती विकलांगता से राहत दिलाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं किए जा रहे हैं। तो क्या इस ओर सोचने की आवश्यकता नही कि पेंशन की राशि को बढ़ाने से लेकर अन्य सुवीधाओं को विकलांग जनो तक पहुचायां जाए ताकि वो उन्हे भी एक अच्छा जीवन जीने का अवसर प्राप्त हो।

(चरखा फीचर्स)

सैयद बशारत हुसैन शाह
खनैतर, पुंछ

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