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सर्द रात में ..घुंघरू टूट गये

ग़ज़ल की विरासत संभालने वाले गुलुकार पंकज उधास ने सर्द रात में खुले आसमान के नीचे तारामती बारहदरी में जब सुर छेड़े तो जैसे लगा कि सर्दी का असर कम होने लगा है। हालांकि आस-पास के जंगल और नदी के किनारे से सर्द हवाएँ चलने लगी थीं, लेकिन

ग़ज़ल की विरासत संभालने वाले गुलुकार पंकज उधास ने सर्द रात में खुले आसमान के नीचे तारामती बारहदरी में जब सुर छेड़े तो जैसे लगा कि सर्दी का असर कम होने लगा है। हालांकि आस-पास के जंगल और नदी के किनारे से सर्द हवाएँ चलने लगी थीं, लेकिन जैसे-जैसे स्टेज पर सा़ज की दिल छूने वाली धुनों के साथ गायक के बोल आवा़ज़ में घुलने लगे, सामयीन की तालियों ने ठंड को जैसे बाहर का रास्ता दिखा दिया हो। फिर एक-एक करके फनकार और फन के शाय़कीन की पसंद के दौर कुछ यूँ चले..कि घुंघरू टूट गये।

टूरिज्म कार्पोरेशन द्वारा हर साल की तरह इस साल भी तारामती बारहदरी को तारामती जश्न के लिए खूब सजाया गया था। जश्ने मूसी़की के पहले दिन पंकज उधास मौजूद थे। नासिर काज़मी की ग़ज़ल `दिल धड़कने का सबब याद आया..’ से उन्होंने गायकी की शुरूआत की। इससे पहले उन्होंने ये पंक्तियाँ सुनाई-

रात यूँ दिल में तेरी खोई हुई याद आयी
जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाये
जैसे सहरा में हौले से चले बादे नसीम
जैसे बीमार को बेवज्ह क़रार आ जाए

पंकज उधास ने कहा कि हैदराबाद कई बार आना होता है और हर बार इस शहर ने उन्हें एक नये ढंग से हौसला अफज़ाई की है। साथ ही उन्होंने हैदराबादी शायरों के तास्सुर और दिलचस्प वाकियाता का जिक्र भी किया।

शराब, मयकदा, स़ाकी और नशा कभी पंकज साहब के पसंदीदा म़ज़ामीन हुआ करते थे, बल्कि इसी तरह की ग़ज़लें उनकी पहचान बनी थी, हालांकि बाद में उन्होंने कयी रंगो को अपने फन का हिस्सा बनाया, लेकिन शराब और स़ाकी की बात उनकी गायकी का अहम हिस्सा आज भी है। `सब को मालूम है मैं शराबी नहीं, फिर भी कोई पिला दे तो मैं क्या करूँ…ऐ ग़मे ज़िन्दगी कुछ दे मश्वरा एक तरफ उसका घर… थोडी-थोड़ी पिया करो…का जब दौर चला तो जैसे सब मयख्वार हुए और फज़ा में बिन पिये नशा छा गया।

`चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल…सुनाते हुए पंकज उधास ने एक दिलचस्प घटन सुनाई। यह गीत जब एलबम में आया तो एक हैदराबादी शायर ने उनसे शिकायत की कि रंग- रूप, सोना-चांदी सब कुछ उसका है तो फिर हमारा क्या? और उन्होंने दो शेर भिजवाए।

किस्तम ने किस हसीन का शौहर बना दिया
पहले था साहब अब नौकर बना दिया
पहले मैं चेक था और वो भी ब्लैन्क
बेगम की ख्वाहिशात ने चिल्लर बना दिया

चिट्ठी आई है… निकलो न बे ऩकाब.. मोहे आई न जगसे लाज.. और माई… जैसे गीतों ग़ज़लों से उन्होंने समा बांध दिया और फिर वक़्त की कमी को देखते हुए कई सारी फर्माइशें कुछ इस तरह पूरी कीं कि मुखड़ा और एक बंद के साथ बात आगे बढ़ा दी।

पंकज उधास के कंसर्ट की खास बात यह होती है कि ग़ज़ल के साथ-साथ मूसी़की का भी पूरा लुत्फ मिलता है और गायकी के बीच वो अपना फन दिखाते हैं। चाहे वह मैडोलिन के फनकार नासिर क़ुरैशी हो याँ फिर बांसुरी पर निनाद मलंदकर, तबलानवाज़ ओजस हों या फिर वायलिन कलाकार राजेंद्र सिंह, गायकी के दरमियान दो साज़ की आवाज़ों के बीच जुगलबंदी-सी होती है, मूंह से वाह की आवाज़ खुद ही निकलती है और दोनों हाथ तालियों के लिए उठ ही जाते हैं। निर्मल पवार(ढोलक) और विशाल (की बोर्ड) भी उस टीम का अभिन्न अंग हैं।

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