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सिंधु समझौता टूटते ही डुबेगा जम्मू-कश्मीर

सिंधु नदी समझौते को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। यह याचिका वकील एमएल शर्मा ने दाखिल किया है। याचिका में दावा किया गया है कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई यह संधि असंवैधानिक है। उड़ी हमले के बाद, इस समझौते पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उधर सरकार में भी बातचीत के एक बैठक बुलाया है। सवाल उठता है कि अकेले भारत सरकार इस समझौते को खत्म कर सकती है या नहीं। जब यही बात बीबीसी ने सिंधु बेसिन ट्रीटी के पूर्व स्दस्य रहे पाकिस्तानी कमिश्नर जमात अली शाह से पूछा तो उन्होंने दावा किया कि समझौते के नियमों के मुताबिक भारत या पाकिस्तान, दोनों में कोई भी एकतरफा तौर पर न इस संधि को रद्द कर सकते है और न ही बदल सकते है। उनका मानना है कि दोनों देश मिलकर ही इस संधि में बदलाव कर सकते हैं या एक नया समझौता बना सकते हैं।

मगर ब्रह्म चेल्लानी जैसे जानकार मानते है कि भारत-वियना समझौते के लॉ ऑफ़ ट्रीटीज़ की धारा-62 के अंतर्गत भारत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों का इस्तेमाल उसके खिलाफ़ कर रहा है। उधर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भी कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।

अब इन सभी दावों-प्रतिदावों के विरूध सवाल उठता है कि अगर समझौता रद्द होता है तो उसके बाद के नतीजें क्या होंगे। इसी हवाले से रेडिफ डॉट कॉम पर एक लेख प्रकाशित हुआ है। लेखक सैयद फिरदौश अशरफ ने विभिन्न सोर्सेज से अपने लेख में दावा किया है कि अगर भारत समझौते को रद्द करता है, तो उसका सबसे बड़ा भुगतान जम्मू-कश्मीर को करना पड़ेगा। सिंधु नदी का इलाका कोई 11.2 लाख किलोमीटर के क्षेत्र में है, जिसका 47 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में, 39 फीसद भारत में, आठ फीसदी चीन और छह प्रतिशत अफगानिस्तान में आता है। कोई 30 करोड़ की आबादी है जो पूरी तरह सिंधु नदी पर आश्रित है। इसमें छह नदियां हैं। पूरब की तरफ सतलुज, ब्यास और रावी है। पश्चिमी छोर पर सिंधु, झेलम और चिनाब है। सब पर एक विषेशाधिकार संधि भारत के साथ है।

फिरदौश अशरफ ने कई विभागों से बातचीत के बाद यह दावा किया है कि समझौता रद्द होने की कोई गुंजाइश नहीं। इसके कई कारण है। पहला तो यह कि भारत एक उभरता हुआ शक्ति है और बहुत दिनों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता चाहता है। भारत कभी नहीं चाहेगा कि इस अंतरराष्ट्रीय द्विपक्षीय संधि खत्म दिया जाए, जिसमें विश्व बैंक को दुखी करना पड़े। दूसरी बात यह कि फिलहाल हमारे पास पानी स्टोर करने के लिए कोई बुनियादी ढांचा नहीं बना है। जम्मू-कश्मीर के एक पहाड़ी राज्य है। वहां पानी निकलने का कोई रास्ता नहीं है। उसके लिए नहरों का निर्माण करना होगा, ताकि पानी को दूसरी तरफ ले जाया जा सके। उसमें दस से पंद्रह सालों का समय लग जाएगा। अगर जान-बूझकर यह संधि खत्म कर दिया गया तो सबसे पहला नुकसान जम्मू-कश्मीर को होगा, जो बाढ़ में डुब जाएगा।

दिल्ली से हबीब-उर-रहमान की रिपोर्ट

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