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सीरते नबवी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) आलमे इंसानियत के लिए शमा-ए-हिदायत

अल्लाह तआला ने नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सीरत, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कौल व फेअल, गुफ्तार व किरदार और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तमाम हरकात व सकनात को कयामत तक के नमूना और शमा-ए-हिदायत का मिनारा बनाकर पेश किय

अल्लाह तआला ने नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सीरत, आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कौल व फेअल, गुफ्तार व किरदार और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तमाम हरकात व सकनात को कयामत तक के नमूना और शमा-ए-हिदायत का मिनारा बनाकर पेश किया है। जमाना और हालात में हजारों बदलाव हों, लोगों की तबीयतों में सैकड़ों तब्दीलियां आएं नित नए ईजादात व इंकशाफात हैरत अंगेज तरक्की कर जाएं लेकिन अब रहती दुनिया तक तमाम नस्लों के लिए सीरते नबवी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ही नमूना का काम देगी, तमाम इंसानियत की निजात इसी में पोशीदा है और एक मुसलमान के लिए इस नमूने के सिवा दूसरे तरीकेकार को इख्तेयार करना तो दरकिनार इस तरफ नजरें उठाना ईमान में शक व शुब्हा पैदा कर देता है।

अल्लाह और उसके रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर ईमान रखने वालों के लिए लाजिम है कि उनकी तमाम ख्वाहिशात और तमाम दिली अरमान इस्लामी उसूल व आदाब में इस तरह सिमट जाएं कि कोई चमक दमक इस इस्तकामत के लिए बाइसे तजबजुब ने बन सके। इस मौके पर मौलाना अबुल कलाम आजाद की यह तहरीर पढ़ने के काबिल है।

‘‘अगर यूरोप को अपनी तहजीब पर फख्र है कि वह इंसान के हर फर्द गुजाश्त पर सख्ती के साथ गिरफ्त करती है, अगर रोमन लाॅ को अपने ऊपर नाज है कि वह दुनिया के कवाए मुतजादा को अपने मरकज से हटने नहीं देता, अगर यूनान को अपने फलसफा-ए-अखलाक पर गुरूर (घमंड) है कि वह अखलाकी करा की तर्बियत करता है तो हम को उनके बड़े बोल से मरऊब नहीं होना चाहिए।

हम रस्म व रिवाज के गुलाम नहीं है कि यूरोप के कानून मआशरत पर फरेफ्ता हो जाएं, हम कानूनी सख्तियों के बरदाश्त करने के खूगर नहीं है कि अपने हाथ को हथकड़ी के हवाले कर दें, कयासते अक्ली हमारी गिजाए रूहानी नहीं है कि यूनानियों के तिलिस्म में फंस जाएं बल्कि हमारे रग और पुट्ठे एक पाक मजहब के सिलसिले में जकड़े हुए हैं, हमारे खून और गोश्त पर चमड़े की जगह मजहब का गिलाफ चढ़ा हुआ है।

हमारे कल्ब को एक गैर मुतजलजल मजहबी एहसास हरकत दे रहा है, पस हम को हर दिल फरेब रस्म व रिवाज, हर मरऊब करने वाला कानून और हर हैरत में डाल देने वाले फलसफे को छोड़कर अपनी बागडोर इस्लाम ही के हाथ में देनी चाहिए। यही वजह है कि अल्लाह तआला ने हम पर नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पैरवी फर्ज करके हमको तमाम दुनिया की माद्दी व अखलाकी गुलामी से आजाद कर दिया।

अल्लाह तआला ने नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पाक जिंदगी को नमूना बनाया ताकि लोग आप की अमली जिंदगी को चिरागे राह बनाकर सफरे आखिरत के मराहिल तय कर सकें। इरशादे खुदावंदी है-‘‘ रसूललुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का एक उम्दा नमूना मौजूद है तुम्हारे लिए।’’ यानी नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पैरवी मोमिनीन पर छोटे बड़े हर मामले में वाजिब है और आप की जिंदगी इंसान के लिए इंफिरादी व इज्तिमाई खानगी व मिल्ली मआशरती व अखलाकी हर हर गोशे में शमा-ए-हिदायत है।

जिंदगी का कोई ऐसा हिस्सा नहीं है जिसमें असवए रसूल रहबरी और कयादत में तंग व अमानी का शिकार हो जाए, दुनिया का कोई भी फर्द और कोई भी खित्ता ऐसा नहीं है जिसके लिए नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत निजात का जरिया न हो यही वजह है कि आप के कौल व फेअल वजअ कतअ रफ्तार व गुफ्तार, मजाक तबीयत, अंदाजे गुफ्तगू, तर्जे जिंदगी, तरीके मआशरत, खाने पीने, चलने फिरने, उठने बैठने, सोने जागने, हंसने बोलने की एक एक अदा की हिफाजत का कुदरत की तरफ से इंतजाम किया गया।

हदीस और सीरत के जखीरे में आप की विलादत से वफात तक पूरी तस्वीर मौजूद है। आप की तिरसठ साला जिंदगी में से कोई लम्हा ऐसा नहीं है जो लोगों की नजरों से ओझल हो या जो लोगों के इल्म में न आया हो। ऐसी साफ शफ्फाफ जिंदगी दुनिया के तमाम दाइयाने मजहब में सिर्फ आप को हासिल है वरना और कोई दाई, काइद, रहबर और पेशवा ऐसा नहीं जिसकी मुकम्मल या अक्सर जिंदगी के हालात लोगों को मालूम हों।

हजरत ईसा (अलैहिस्सलाम ) की 33 साला जिंदगी में से सिर्फ तेरह साल के हालात मामूल हैं। फारस के मुसलेहाने दीन सिर्फ शाहनामों के जरिए से रौशनास हैं। हिन्दुस्तान के पैगम्बर अफसानों के हिजाब में गुम हैं। हजरत मूसा ( अलैहिस्सलाम) की जिंदगी के बारे में जो कुछ मालूम है वह नामुकम्मल और नाकाबिले एतमाद है, गैर मुस्लिमों के रहनुमाओं को अगर लिया जाए तो उनके मुताल्लिक उलझने और पेचीदगियां और बढ़ जाती हैं। उनकी तरफ जो किताबें मंसूब हैं, यह नहीं कहा जा सकता कि वह कब और किस तरह उतरीं।

वह किताबें कब जेरे तसनीफ आईं और सूरत क्या अख्तियार की गई थी। उन रहनुमाओं की जिंदगी के हालात और वाक्यात तो बड़ी चीज है वह अपने पेशवा का एक कलमा भी ऐसा पेश नहीं कर सकते जिसकी सनद उनके पेशवा तक मुसलसल जुड़ी और मुस्तनद हो। काबिले हैरत है कि न सिर्फ नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के हालात महफूज और मोतबर है बल्कि आपके देखने वालों और मिलने वालों में से तकरीबन 15000 लोगों के नाम और हालात कलमबंद किए गए हैं जिसके जरिए कोई रिवायत उम्मत तक नहीं पहुंची वह अपनी जाती और निजी जिंदगी में कैसा है, कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने अपनी तबीयत से गढ़ कर हुजूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तरफ उस रिवायत को मंसूब कर दिया हो या वह अपने मुंकिरात की वजह से समाज और मआशरे में बदनाम हो जो सालेहियत और एतबार पर सवालिया निशान कायम कर दे और जिससे रिवायत मखदूश हो जाती है।

अरबाबे जिरह व तादील ने तहकीक व तंकीह के जरिए जमाशुदा जखीरे को मोतबर और मुस्तनद बनाया, गलत और सही में खते इम्तियाज कायम किया। आज नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बारे में जितनी रिवायतें उम्मत को दस्तयाब हैं उन तमाम की सनद महफूज है। इस तरह सीरते नबवी को हर तरह के शक व शुब्हात से भी बालातर रखा गया ताकि उसकी रौशनी में उठने वाला हर कदम मजबूत और मुस्तहकम हो और उसके हिदायत पाने और उसके असवाए हुस्ना होने में कोई शुब्हा न किया जा सके।

अरबी और उर्दू सीरतनिगारों की एक बहुत बड़ी तादाद है जिन्होंने जखीरा-ए-हदीस से उन रिवायतों को अलग किया जिन का ताल्लुक सीधे नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जात व सिफात और आप के अमल से था जिनका मुताला इंसान को जिंदगी और रूह की ताजगी अता करता है ईमान में ज्यादती और कुवत का सबब होता है, नई नस्लों के लिए शमा-ए-हिदायत का काम देता है। अगर इन रिवायतों पर नजर डाल ली जाए तो यकीनी तौर पर यह कहा जा सकता है कि इंसान के लिए राहे मुस्तकीम पाने की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए उलेमा, कायदीन और मजहबी व मिल्ली रहनुमाओं को चाहिए कि जिस नौइयत से भी हो सके सीरते नबवी को ज्यादा से ज्यादा आम किया जाए उसकी तफसील से लोगों को बाखबर किया जाए खास तौर पर उस दौर में जबकि रेडियो, टेलीविजन, वीसीआर, इंटरनेट, अखबारात फहश लिटरेचर और जदीद वसायल के जरिए बच्चों के मासूम जेहनों का अगवा किया जा रहा है।

जरूरत है कि सीरते नबवी को आम किया जाए और सीरत के मुख्तलिफ पहलुओं को दुनिया के सामने पेश किया जाए। कितना काबिले अफसोस है कि स्कूल और कालेज में पढ़ने वाले मुस्लिम बच्चों को रामायण, महाभारत के मुशरिकाना किरदार और शख्सियत के बारे में बहुत कुछ मालूमात हासिल है मगर नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) और तारीखे इस्लाम के बारे में जरूरी मालूमात भी हासिल नहीं। काबिले तारीफ और मुबारक बाद है वह लोग जो सीरते नबवी को उजागर करने के लिए किसी तरह की भी कोशिश कर रहे हैं और मुसलमानों के उलझे हुए दिलों को सुलझाने की कोशिश में मसरूफ हैं। ((मुफ्ती तंजीम आलम कासमी)

————-बशुक्रिया: जदीद मरकज़

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