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सीरिया पर गिर रहे हर बम से हम और आप मर रहे हैं

सीरिया में ‘अरब स्प्रिंग’ नाम से शुरू हुआ विद्रोह भयावह दौर से गुजर रहा है। बीते पांच वर्षों से लोग मारे जा रहे है। बड़ी संख्या में विस्थापन जारी है। हालात इतने दुभर हो चले है कि बम गोलों के बीच लोग अपनी मौत का इंतजार कर रहे है। अब वो अपने आखिरी संदेश दुनिया तक पंहुचा रहे हैं।

सीरिया से सामाजिक कार्यकर्ता लीना ने ट्विट किया, “दुनिया के लोगों आप सोना मत, हमारे लिए आवाज़ उठाओ। आप कुछ कर सकते हो।” वहीं मांथर ईताकी नाम के एक सीरियाई नागरिक ने लिखा, “मैं अबतक जिंदा हूं, अपने ख़ास दोस्तों के साथ नरसंहार का सामना करने के लिए। दुनिया कुछ नहीं कहेगी। उम्मीद करता हूँ कि अपनी मौत तुम्हारे लिए लाइव ब्रॉडकास्ट कर सकूं।” लीना और ईताकी के ये ट्वीट महज एक ट्वीट नहीं बल्कि हताशा की आवाजें हैं जो एक अराजक कल की नीव तैयार करेंगी। एक ऐसे नागरिक सामाज की विकास गाथा लिखी जाएगी जहाँ लोग सत्ता में यकीन खो चुके होंगे। वो हमेशा हर पल उग्र रहेंगे। बदले की आग में जीने वाले सामाज का निर्माण होगा और यही सबसे परेशान करने वाला वक़्त बन रहा होगा जब लोग मौत से डरना छोड़ चुके होंगे। मौत उन्हें डराया नहीं करेगी।

इन सबके जिम्मेदार हम और आप तमाशबीन होंगे। गृहयुद्ध में कोई भी सुलझाना नहीं चाहता। आज सीरिया का गृहयुद्ध सिर्फ सीरिया का नहीं बल्कि उसमें के कई देश उलझे हैं। बीते पांच सालों के घटनाक्रम ने यही स्पष्ट होता है कि कोई सीरिया को सुलझाना नहीं चाहता। सबके अपने-अपने हित जुड़े हैं।

मीडिया ने न तो कभी इसे बेहतर तरीके से पेश किया और नहीं ही दुनिया इसके अलग-अलग पहलूओं को जान पायी। मोटे तौर पर आज सीरिया चार गुटों में टूटा है- असद, आईएसआईएस, कुर्द लड़ाके और असद विरोधी लड़ाके। हर गुट को सह देने वाले देश हैं। इसे समझने के लिए हमें इस युद्ध कि शुरुआत को समझना चाहिए।  2011 में असद के खिलाफ वहां के नागरिकों ने विद्रोह किया जो कि शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुआ। उसी वर्ष जुलाई में सिरियाई सेना के सैनिक टूटकर विद्रोहियों के जुड़ते हैं और गृहयुद्ध की शुरुआत होती है।

सीरिया और बाकी मध्य-पूर्व से कट्टरपंथी समूह विद्रोहियों के साथ मिलकर असद से लड़ते हैं। और इसी बीच 2012 में कुर्दीश समूह का उदय होता है। असद के अकेले पड़ने पर सीरिया को ईरान का साथ मिलता है। ईरान अपने सैकड़ों सैन्य अधिकारियों को असद के साथ लगा देता है। ईरान के एंट्री करते ही सऊदी अरब और तुर्की विद्रोही गुटों की मदद शुरू कर देते है। प्रॉक्सी वॉर की शुरुआत यहीं से होती है। अब यह मामला सीरिया का नहीं बल्कि समूचे मध्य-पूर्व के खेल के मैदान में तब्दील होता है।

ईरान समर्थित हेज़बुल्लाह के असद के साथ आते ही खाड़ी देश विद्रोही गुटों को और भी ज्यादा मदद करना शुरू कर देते हैं। मौके का फ़ायदा उठाते हुए अमरीका असद विरोधी गुटों को मदद शुरू कर देता है। घबराए असद अपने ही नागरिकों पर रसायनिक गैस के हमलें करवाता है। सुरक्षा का हवाला देते हुए अमरीका सीरिया के युद्ध में शामिल होता है, वहीं रूस असद के समर्थन में खुलकर उतर जाता है। 2014 में असद विरोधी गुट में दरार आती है और आतंकी संगठन आईएसआईएस अलग हो जाता है।

हैरत बात यह कि आईएसआईएस असद से न लड़कर कुर्द लड़ाकों से लड़ता है। इनके खात्मे के लिए अमेरिका हवाई हमलों कि शुरुआत करता है। और इसी तरह ये विरोधाभाषाओं का युद्ध जारी है। इन सबके बीच हम और आप कहां हैं? चूंकि हम भारत के नागरिक हैं इसलिए गुट निरपेक्षता के अनुयायी होने की जिद्द पालकर रखनी ही चाहिए।

हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ बलूचिस्तान में मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं दिखना चाहिए। भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थाई सदस्यता तो चाहिए पर वैश्विक मसलों पर भारतीय चुप रहना ही उचित समझते हैं। पता नहीं ये कैसी नीति है? भारत की ये चुप्पी भी मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाने जैसा है। हमारे खुद के नैतिक जमीन में खोखलेपन है। लेकिन, हमें याद रहना चाहिए कि हर एक गिरते बमों और मरते लोगों कि आती ख़बरों के बीच थोडा-थोड़ा हम और आप मर रहे हैं।

-रोहिण कुमार छात्र, आईआईएमसी

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