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सुप्रीम कोर्ट का अदालत के बाहर बाबरी मस्जिद मामले को हल करने का मशवरा अव्यावहारिक: मौलाना अरशद मदनी

नई दिल्ली: बाबरी मस्जिद के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में लंबित याचिका पर एक नया मोड़ तब आया जब भाजपा नेता डॉ सुब्रमण्यम स्वामी के एक याचिका पर शीर्ष अदालत ने दोनों पक्षों को सलाह दी कि वह अदालत के बाहर आपसी विचार-विमर्श से यह मामला हल करने की कोशिश करें, क्योंकि यह धर्म और आस्था से जुड़ा मामला है, तथा अदालत इस मामले में मध्यस्थ बनने को तैयार है.

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मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अदालत की कार्रवाई के बाद जमीअत उलेमा के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने मीडिया से कहा कि इससे पहले भी पिछले छह सात बार अदालत के बाहर मामले को सुलझाने की कोशिश की जा चुकी है लेकिन हर बार यह कोशिश नाकाम हुई, क्योंकि बाबरी मस्जिद मामला हक और स्वामित्व का मामला है जिससे मुस्लमान किसी भी सूरत में दस्तबरदार नहीं हो सकता और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा वह स्वीकार्य होगा. मौलाना अरशद मदनी ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की सलाह का सम्मान करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और नरसिंह राव आदि के जमाने में ऐसी कोशिशें की जा चुकी हैं लेकिन सभी असफल हुई हैं, इसलिए अदालत को सबूत और साक्ष्य की रोशनी में अंतिम फैसला करना चाहिए.

गौरतलब है कि जमीअत उलेमा हिंद बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित मामले में शुरू से ही एक पक्ष रही है और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पहले जमीअत उलेमा हिंद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. जमीअत उलेमा की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका नंबर 10866-10867 / 2010 की सुनवाई के दौरान डॉक्टर सुब्रमण्यम स्वामी ने वादी जमीअत उलेमा के वकीलों को सूचित किए बिना चुपचाप चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के सामने मामले को उठाया, हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया की दो सदस्यीय खंडपीठ ने सुब्रमण्यम स्वामी को इस मामले में हस्तक्षेप करने से रोकते हुए उनसे कहा था कि मामले की सुनवाई के दौरान हस्तक्षेप कार की याचिका पर फैसला किया जाएगा.
जमीअत उलेमा की ओर से मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता इरशाद हनीफ ने कहा कि सुब्रमण्यम स्वामी की इस हरकत के खिलाफ 24 मार्च को जब मामला सुनवाई के लिये पेश होगा तो उस समय मुख्य न्यायाधीश से इसकी शिकायत की जाएगी. तथा जमीअत उलेमा का हमेशा की तरह यह स्टैंड होगा कि अदालत सबूत और साक्ष्य की रोशनी में फैसला करे.

ख्याल रहे कि 23 दिसंबर 1949 की रात में बाबरी मस्जिद में कथित तौर पर रामलला की उपस्थिति के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने बाबरी मस्जिद को धारा 145 के तहत अपने अधिकार में कर लिया था जिसके खिलाफ इस समय जमीअत उलेमा उत्तर प्रदेश के उपाध्यक्ष मौलाना सैयद नसीर फैजाबाद और महासचिव मौलाना मुहम्मद कासिम शाहजाँ पुरी ने फैजाबाद की अदालत से संपर्क किया था. जिसका निबटारा पिछले वर्षों इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा स्वामित्व को तीन भागों में विभाजित करके किया गया था. इस फैसले के खिलाफ जमीअत उलेमा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. मौलाना सैयद नसीर फैजाबाद, मौलाना मोहम्मद कासिम शाहजाँ पूरी और हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी साहब मुरादाबादी के निधन के बाद जमीअत उलेमा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मौलाना अशहद रशीदी इस मामले में वादी बनाए गए हैं.

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