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सोशल मिडिया- सऊदी औरतों की मांग, मर्दों की सरपरस्ती से हमें आज़ाद किया जाए !

ट्वीटर पर पर सऊदी औरतों की मांग, हमें ‘मर्दों’ से आज़ादी चाहिए

सऊदी: सऊदी अरब में पिछले कई हफ़्तों से यहां की औरतें सोशल मीडिया पर अपनी आज़ादी की मांग कर रही हैं। औरतों का कहना है कि उनपर से मर्दों की सरपरस्ती की परंपरा ख़त्म की जानी चाहिए। औरतों की इस मुहिम को अमेरिकी संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का समर्थन मिला है। वहीं सऊदी अरब के एक अख़बार ओकाज़ ने देश के सबसे बड़े धार्मिक नेता मुफ़्ती शेख़ अब्दुल अजीज अल-शेख के हवाले से लिखा है कि मर्दों की सरपरस्ती हटाने की कोई भी बहस सुन्नी इस्लाम के ख़िलाफ़ ‘अपराध’ के बराबर होगी.

सऊदी महिलाएं, ब्लॉगर्स और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस परपंरा को खत्म करने के लिए #TogetherToEndMaleGuardianship और #StopEnslavingSaudiWomen जैसे हैशटैग के साथ ट्विटर पर मुहिम चला रही हैं। ट्विटर पर महिलाएं बता रही हैं कि इस प्रथा के चलते उनकी ज़िंदगी पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी हैशटैग #TogetherToEndMaleGuardianship के साथ ट्वीट किया है कि “क्या इस बात का कोई तुक है कि औरतों को सफ़र करने के लिए सरपरस्त मर्दों की इजाज़त लेनी पड़े?”

सऊदी समाज में किसी भी महिला की ज़िंदगी से जुड़े सभी अहम फैसलों का अधिकार कानूनी तौर पर उसके निकटतम पुरूष सरपरस्त को होता है. यह पुरुष महिला का पिता, पति और कभी-कभी तो बेटा भी हो सकता है. इस मुल्क़ में औरतों की सारी ज़िंदगी इसी तरह कटती है। मगर अब इस प्रथा से तंग आकर सऊदी औरतों का एक समूह पढ़ने और काम पर जाने के साथ-साथ मर्दों जैसी आजादी न मिलने के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहा है।

दरअसल, ये सारी बहस एक हालिया रिपोर्ट के बाद शुरू हुई है जिसमें साफ़-साफ़ कहा गया है कि सऊदी अरब में महिलाओं को कानूनी तौर पर दबाया जाता है।
सऊदी अरब में 2015 के आखिर में औरतों को स्थानीय चुनावों में मतदान का अधिकार दिया गया, लेकिन उनमें से कइयों को मतदान केंद्रों पर पहुंचने के लिए मर्दों के सहारे की ज़रूरत पड़ी। सऊदी अरब दुनिया का इकलौता ऐसा देश हैं जहां महिलाओं को ड्राइविंग की इजाजत नहीं है. इसी तरह की तमाम पाबंदियों पर आई रिपोर्ट के बाद सोशल मीडिया पर आज़ादी के हैशटैग ट्रेेंड करने लगे। हालांकि सोशल मीडिया से परे महिलाओं की इस मुहिम ने कई धार्मिक नेताओं को भी नाराज किया है.

ट्वीटर पर सऊदी अरब की आला लिखती हैं, “क्या बकवास है किसी पुरूष के दस्तखत के बिना विदेश में नहीं पढ़ सकती हूं. मेरे सपने और भविष्य को कुचले जाने को कैसे स्वीकार कर लूं?”

वहीं जे नाम की एक यूजर ने लिखा है, “ये बहुत ही आसान है। हम चाहते हैं कि हमें वयस्क माना जाए, बच्चे नहीं. हम सनकी या विकलांग नहीं हैं।”

इसी तरह अस्माहान ने ट्वीट किया है, “मैं एक ऐसे देश में रहती हूं कि जहां जब तक मेरा शौहर इजाजत नहीं दे, मैं कहीं जा नहीं सकती हूं. मैं तो मर रही हूं. बस खा रही हूं सो रही हूं.”

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