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सोशल मीडिया पर बीजेपी को मिल रही है करारी शिकस्त

सोशल मीडिया आज कल के ज़माने में एक ऐसी चीज़ बन गया है कि दिल की बात हो या तफ़री की सब यहीं से शुरू होता है, ऐसे दौर में अगर हम सोशल मीडिया में राजनीतिक गतिविधि की बात करें तो ये और ख़ास हो जाती है. Facebook पे हमारे पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करिये राजनीतिक पार्टियों की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी सोशल मीडिया की माहिर खिलाड़ी समझी जाती रही है लेकिन पिछले कुछ महीनों में ऐसा नज़र आता है जैसे भारतीय जनता पार्टी के सारे तिकड़म उलटे पड़ते जा रहे हैं और इस जंग में ये धीरे धीरे बहुत बुरी तरह से पीछे होते जा रहे हैं. जहाँ तीन चार महीने पहले आलम ये था कि आपने मोदी की बुराई की और बस आपके मेसेज बॉक्स में कट्टर भाजपा समर्थकों की गालियाँ आना शुरू लेकिन इन चार महीनों में लगभग सबकुछ बदल गया है. ये ज़रूर है कि नंबर के खेल में इनके पास लोग ज़्यादा हैं लेकिन ये लोग जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी के पढ़े लिखे छात्रों से मुक़ाबला करने में बुरी तरह अक्षम हैं. जेएनयू ही नहीं बल्कि देश की कई यूनिवर्सिटी के छात्रों ने भाजपा के ख़िलाफ़ जैसा मोर्चा ही खोल दिया है. कन्हैय्या कुमार, उमर ख़ालिद और उनके दूसरे कामरेड छात्रों की गिरफ़्तारी और उसके बाद उनकी रिहाई के बाद से जो माहौल बीजेपी के ख़िलाफ़ बना है पार्टी ख़ुद नहीं समझ पा रही है आख़िर ये हो क्या रहा है. वैसे इसका एक कारण है सरकार की लगभग हर मोर्चे पर विफलता, एक ओर जहाँ विकास के नाम चुनाव लड़ते हुए बीजेपी ने नारा दिया था कि “अच्छे दिन आने वाले हैं” लेकिन अब जबकि स्थिति उससे बदतर हो गयी है तो लोग सवाल कर रहे हैं कि “अच्छे दिन” आख़िर ऐसी कौन सी जगह पे हैं कि उन्हें आने में इतना वक़्त लग रहा है. इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर मज़ाक़ के ऐसे बाण चलाये जा रहे हैं कि बीजेपी के समर्थकों को इन सब बातों का कोई जवाब नहीं मिल रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बुरा भला कहने वाले बीजेपी समर्थक अब ये तर्क देते तो हैं कि प्रधानमंत्री को बुरा नहीं कहना चाहिए लेकिन पिछली बात याद दिलाते ही बगलें झाँकने लगते हैं. कट्टर हिन्दू वादी लोग जो मोदी के बड़े समर्थक थे वो भी अब बीजेपी और मोदी से ख़ासे नाराज़ हैं उन्हें लगता है कि कोइ भी हिंदूवादी एजेंडा ये सरकार नहीं ला पायी इसलिए वो भी अब सरकार का उस तरह से सोशल मीडिया पे साथ नहीं देते. “भारत माता की जय” जैसे खोखले मुद्दे लेकर चलने की कोशिश ने बीजेपी को और पीछे धकेल दिया है. इन सब मुद्दों से घिरी बीजेपी ने उत्तराखंड का सियासी नाटक करके जैसे अपने ही पैरों पे कुल्हाड़ी मार ली है. जैसे ही कुछ भी नया होता है वैसे ही फेसबुक और ट्विटर पे लेफ़्ट और कांग्रेस के लोग इनकी बखियां उधेड़ने लग जाते हैं, इतना ही नहीं ओवैसी और दूसरे नेता भी इनके पीछे पड़े रहते हैं. पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में चुनाव के नतीजे क्या होंगे ये तो वक़्त ही बताएगा लेकिन तार्किक लड़ाई का एक हिस्सा जो फेसबुक और ट्विटर पे लड़ा जा रहा था, उसमें बीजेपी की बुरी तरह शिकस्त हुई है.

(अरग़वान रब्बही)

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