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सोशल मीडिया: मुसलमान मरता है तो मरे, देश अपनी चुप्पी नहीं तोड़ेगा

गृहयुद्ध का माहौल का बनाया जा रहा है या यूं कहिए कि बना दिया गया है। राजनीति के इस माहौल ने देश के मुसलमानों को अधिक दुविधा में डाल दिया है। वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं।

बुनियादी जरूरतों को छोड़ कर वे अपने जानो-माल के फ़िक्र में लगे हैं। देश में फ़ैली असहिष्णुता माहौल ने मुस्लिमों की अंतरात्मा को अंदर तक भेद दिया है। अगर आप मौजूदा हालात गौर करेंगे तो आपको देश के हालात अंदाजा लग जाएगा।

हर दिन एक के बाद एक नई-नई कहानियां सामने आ रही हैं, और हर रोज़ किसी न किसी रूप में मुस्लिमों के खिलाफ़ माहौल बनाकर उनको को मारा जा रहा है। कभी गाय के नाम पर तो कभी मंदिर-मस्जिद नाम पर। कभी शिव रात्रि की आड़ में तो कभी मुहर्रम के जुलुस के विवाद में।

आसामाजिक तत्व ऐसा कोई भी क़ा नहीं छोड़ रहे हैं जिससे माहौल ख़राब किया जा सकता है। हालात ये हैं कि यह सब कुछ क़ानून की नाक के नीचे हो रहा है। उससे भी दुखद तो यह है कि क़ानून के रख वाले भी इन फ़र्ज़ी देशभक्तों का साथ दे रहे हैं।

देश में बढ़ती असहिष्णुता के देखकर हर आम मुसलमान डर की ज़िंदगी जी रहा है। यह सब कुछ बिलकुल वैसा ही हो रहा है जैसा कि आसामाजिक ताक़तें चाहती थीं। यह सबसे अधिक वहां हो रहा है जहां मुसलमानों की संख्या बेहद कम है।

यह बिलकुल वैसा ही हो रहा है जैसा कि मोदी सरकार आने से पहले बुद्धिजीवियों ने क़यास लगाए थे। भगवा आतंक अपनी जड़ें इतनी मज़बूत करता जा रहा है कि उनके आगे आज देश का संविधान भी लाचार है।

भगवा आतंकवाद ने सबसे पहले मोहसिन शेख की बलि चढाई थी। उसके बाद तो मानों जैसे आतंकियों के हौसले दिन-ब-दिन बढ़ते गए।
उसके बाद गौरक्षकों ने गाय के नाम पर दादरी से लेकर दिल्ली तक तांडव करना शुरू कर दिया।

गुजरात के दलित हों या उत्तर प्रदेश के, उनके मूंह में गोबर और पेशाब ठूंसा जाता है। मेवात के डिंगरहेड़ी में गाय के नाम पर बलात्कार किया जाता है और हत्या कर दिया जाता है। सरकारें मौन धारण किए बैठी रहती हैं।

न जाने कितनी मस्जिदों को अबतक भगवा आतंकियों ने तबाह किया है। जब जी चाहता है ये हाथों में हथियार लिए निकल पड़ते हैं। जब जी चाहता है किसी दाढ़ी वाले को अपना शिकार बना देते हैं। हर मुसलमान की थाली में उन्हें गौमांस दिखता है।

जब चाहते है उसे गौवंशज का हत्यारा बना देते हैं। हद तो तब हो जाती है जब इन आतंकियों के ख़िलाफ़ पुलिस रिपोर्ट करो और पुलिस उनकी गिरफ़्तारी नहीं करती है। जैसे उनको मना किया गया हो कि सबकी बात सुनना मगर मुसलमानों की नहीं।

मौजूदा सरकार के ख़िलाफ़ अगर कोई विरोध करे और उनकी नीतियों पर सवाल उठाये तो उसे आतंकी और देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। यह सब कुछ मुसलमानों पर नहीं बल्कि देश के बुद्धिजीवियों, अभिनेताओं और दलित-पिछड़ों पर भी लागू है। मतलब साफ़ है कि या तो चुप रहो या तो पाकिस्तान जाने के लिए तैयार रहो।

अफ़सोस की बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री को कुत्ते के बच्चे के मरने पर तो दुःख होता है लेकिन एक मुस्लिम के हत्या पर नहीं। प्रधानमंत्री हर धर्म को साथ लेकर चलने वाले नहीं, केवल उन्हीं को लेकर आगे बढ़ रहे हैं जहां से खुद निकलकर आए थे।

हर तरफ से हत्यारों को सह दिया जा रहा है। हाल ही में हुए मिन्हाज़ की हत्या से साफ़ होता है कि पुलिस और प्रशासन भी भगवा आतंकियों के सह में काम कर रही हैं। मोदी सरकार में विकास केवल संघियों और पूंजीपतियों का हो रहा है। बाकी देश के लोगों से उनका कोई लेना देना नहीं है।

मोदी सरकार अपनी विफलताएं छुपाने के लिए हर दिन नए मुद्दे बनाती है और उठाती है। कभी गिरिराज, कभी योगी, तो कभी साध्वी प्रज्ञा मुसलमानों को गालियां बकते हैं। जेएनयू के छात्र नजीब को पिछले हफ़्ते से ग़ायब कर दिया गया है लेकिन मोदी सरकार की पुलिस अबतक उसका उसका पता लगाने में नाकाम रही है।

2014 से लेकर अभी तक जितने भी दंगे, क़त्ल, बलात्कार, लूटपाट और धार्मिक स्थलों को नुक्सान पहुंचाया गया है, उनमें से अधिकतर मुसलमानों के ही हैं। देश के मुस्लिम इतने लाचार तो उस वक़्त भी नहीं रहे होंगे जिस वक़्त देश का बंटवारा हुआ था। उस वक्त भी ऐसा माहौल रहा होगा जैसा आज है।
मुसलमानों के लिए दंगे की राजनीति तो एक नियती बन चुकी है। मारो, लूटो और मुआवज़ा देकर शांत कर दो, यही नीति बना ली गई है। सभी राजनीतिक पार्टियों ने यह सोच लिया है कि जब मुस्लिम मरते रहेंगे-डरते रहेंगे तब तक वे अपनी बुनियादी चीज़ों की मांग नहीं करेंगे। न ही आरक्षण, न ही नौकरी और न ही देश की राजनीति में हिस्सा लेंगे।

मुसलमानों से केवल लव जिहाद, गाय, तीन तलाक़, आतंकवाद और देशभक्ति पर ही सफाई मांगते रहो। मुद्दे तो इतने हैं कि लिखते-लिखते सियाही खत्म हो जायेगी पर मुद्दे ख़त्म नहीं होंगे।

ऐसे में मुस्लिमों के पास एकता की कुंजी ही एक रणनीति है जिसकी जरूरत आने वाले तीन साल में होगी। कट्टर हिन्दू कहते हैं कि देश में एक बार फ़िर गुजरात दोहराया जाएगा। आज बेशक सत्ता उनके पास है, वे गुजरात क्या 1947 भी दोहरा सकते हैं, लेकिन उनको ये बात याद रखना होगा कि हिन्दोस्तान की कल्पना बिना मुस्लमान के नहीं हो सकती। और न ही वे इसमें कभी कामयाब हो पाएंगे।

नवेद चौधरी
(यह लेख,लेखक की फेसबुक वाल से लिया गया है)

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