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स्कूली बैग्स की फ़रोख़्त में बेतहाशा इज़ाफ़ा

तलबा और तालिबात के लिए जहां स्टेशनरी, कॉपियां (नोट बुक्स) और किताबें बहुत ज़रूरी होती हैं वहीं स्कूल बैग्स (बस्ते) बहुत ज़्यादा अहमियत रखते हैं। माज़ी की बनिसबत अब तो बाज़ार में नित नए डिज़ाइन अंदाज़ और मेटेरिएल के बस्ते दस्तयाब हैं और अ

तलबा और तालिबात के लिए जहां स्टेशनरी, कॉपियां (नोट बुक्स) और किताबें बहुत ज़रूरी होती हैं वहीं स्कूल बैग्स (बस्ते) बहुत ज़्यादा अहमियत रखते हैं। माज़ी की बनिसबत अब तो बाज़ार में नित नए डिज़ाइन अंदाज़ और मेटेरिएल के बस्ते दस्तयाब हैं और अहम बात ये है कि के जी से लेकर पी जी के तलबा के लिए जो बैग्स फ़रोख़्त किए जा रहे हैं उन में तलबा तालिबात के लिए अलाहिदा अलाहिदा बैग्स रखे जा रहे हैं।

अब जब कि बेशतर स्कूल्स की कुशादगी अमल में आ चुकी है और औलियाए तलबा ने स्टेशनरी कॉपियों और किताबों की खरीदी करली है और बैग्स भी खरीद रहे हैं। इसे में राक़िमुल हुरूफ़ ने सोचा कि क्यों ना इस मर्तबा स्कूल बैग्स की तैयारी और उस की फ़रोख़्त के साथ साथ तलबा और औलियाए तलबा की पसंद ना पसंद के बारे में रिपोर्ट पेश की जाए।

हम ने जिन स्टेशनरी वालों से बात की उन तमाम का यही कहना था कि नए तालीमी साल के आग़ाज़ पर हमेशा की तरह कारोबार कई सौ फ़ीसद बढ़ जाता है। जहां तक स्कूली बस्तों की फ़रोख़्त का सवाल है बेगम बाज़ार को सब से बड़ा मार्किट कहा जा सकता है इस लिए कि वहां स्कूली बैग्स फ़रोख़्त करने वाली कम अज़ कम 500 दुकानात हैं और इसी बाज़ार से दोनों शहरों हैदराबाद और सिकंदराबाद के तमाम बाज़ारों और स्टेशनरियों को बैग्स सप्लाई किए जाते हैं।

इस सिलसिले में हम ने इंडियन बैग हाउज़ के इर्फ़ान ख़ान से बात की। उन्हों ने बताया कि वो और उन के भाई अपने वालिद जनाब उमर ख़ान की सरपरस्ती में बरसों से ये कारोबार करते हैं। इर्फ़ान के मुताबिक़ बेगम बाज़ार से स्कूल बैग्स तेलंगाना और आंध्र के तमाम अज़ला के इलावा कर्नाटक के बाअज़ इलाक़ों और महाराष्ट्रा के औरंगाबाद और जालना के बाज़ारों में भेजे जाते हैं।

स्कूल बैग्स की तैयारी में इस्तेमाल होने वाले मेटेरिएल और कपड़े के बारे में सवाल पर इर्फ़ान ने कहा कि मैटी कैनवस और वाईट छागल से तैयार कर्दा बैग्स मज़बूत और पाएदार होते हैं। आजकल मैटी की बहुत मांग है। ये 115 रुपये फ़ी मीटर के हिसाब से मिलता है एक बैग एक मीटर कपड़े में तैयार हो जाता है जब कि आजकल बच्चे ज़्यादा से ज़्यादा ज़ैप और ज़्यादा ख़ानों के बैग्स को तरजीह देते हैं। उन्हों ने बताया कि पांचवीं और छटवें जमात के तलबा के लिए एक मीटर में बैग तैयार हो जाता है।

जब कि कैनवस से जो बैग्स तैयार होते हैं वो वाटरप्रूफ होते हैं लेकिन कैनवस के बैग्स को अब ओलड मॉडल कहा जाने लगा है। इस के बावजूद इस के तैयार कर्दा बैग्स बहुत ही मज़बूत होते हैं। इस के इलावा Mati 6×6, 105 रुपये मीटर मिलता है। इस कपड़े से तैयार कर्दा बस्ते एक साल तक बाआसानी चलते हैं। इस मेटेरिएल से एक मीटर में बड़ा और आधे मीटर में छोटा बैग बन जाता है। इर्फ़ान की तरह बेगम बाज़ार के दूसरे ब्योपारियों ने भी हमें बताया कि उन के पास बैग्स का जो स्टाक है उस की कीमतें मुख़्तलिफ़ हैं।

10 साला शेख अब्दुल क़ादिर पढ़ना चाहता है उस की ख़ाहिश है कि अच्छा पढ़ लिख कर डॉक्टर बने। मुहम्मद इमाम उद्दीन के मुताबिक़ अगर्चे काम बहुत है लेकिन अपनी कमज़ोर माली हालत के बाइस वो ज़्यादा आर्डर्स नहीं ले सकते। इस के बावजूद अल्लाह के फ़ज़ल से 350 – 400 रुपये यौमिया कमा लेते हैं।

बहरहाल शेख अब्दुल क़ादिर की बातें सुन कर हम सोचने लगे कि कई ऐसे लोग होंगे जो दूसरों के बच्चों को दीदा ज़ेब और ख़ूबसूरत स्कूल बैग्स फ़रोख़्त करते हैं लेकिन उन में अपने बच्चों के लिए कॉपियां किताबें और कीमती बैग्स खरीदने की इस्तिताअत नहीं।

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