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हज हाउज़ में मीर अहमद शरीफ़ की मज़ार ख़सताहाली का शिकार

नुमाइंदा ख़ुसूसी–क़्फ़ एक शरई इस्तिलाह है। वक़्फ़ और अल्लाह की राह में ख़र्च करने की क़ुरआन-ओ-अहादीस में बड़ी फ़ज़ीलत आई है। ये ऐसा सदक़ा जारीया है जिस का सवाब क़ियामत तक इंसान को मिलता रहता है। इस लिए इबतदा-ए-इस्लाम से ही अहले इस्लाम ने इस की तरफ़ ख़ुसूसी तवज्जा दी है। आप को मालूम होना चाहीए कि शहर हैदराबाद के हज हाऊज की अराज़ी(जमीन) भी एक नेक सिफ़त अल्लाह के बंदे ने इस की राह में वक़्फ़ की थी। जिन का नाम मीर अहमद शरीफ़ वलद मीर फ़ज़ल उल्लाह है। ये अदालतुल-आलिया के वकील थे।

इस हज हाउज़ को रज़्ज़ाक़ मंज़िल भी कहते हैं जो ग़ालिबन उन्ही के अज्दाद से किसी का इस्म गिरामी(नाम) है। इस हज हाऊज की इमारत में रियास्ती वक़्फ़ बोर्ड अक़लीयती बहबूद और हज कमेटी के दफ़ातिर हैं। रियासत के मुस्लमानों का इस इमारत से किसी ना किसी सूरत से ताल्लुक़ है। अल्लाह ताला के इस नेक बंदे ने इतने अहम और क़ीमती मुक़ाम की अराज़ी(जमीन) वक़्फ़ की है।

वक़्फ़ के तहत इन का मज़ार इस में मौजूद है। हम ने जब वक़्फ़ बोर्ड के एक मुलाज़िम से मज़कूरा मज़ार की ज़यारत की ख़ाहिश ज़ाहिर की तो वो ख़ुद अपने हमराह मज़ार का मुआइना कराने के लिए हमें ले गए जो हज हाउज़ (रज़्ज़ाक़ मंज़िल) की हदूद में वाक़ै है जिस के क़रीब आला ओहदेदारों की गाड़ियां पार्क की जाती हैं और इस की सूरत-ए-हाल का मुशाहिदा किया तो वो मुलाज़िम मारे श्रम के हमें देखता रह गया। वहां जाकर क्या देखते हैं कि इस बुज़ुर्ग के मज़ार पर वक़्फ़ बोर्ड का कचरा पड़ा हुआ है।

सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि ऐन मज़ार पर एक चप्पल भी पड़ी है। वक़्फ़ बोर्ड का वो मुलाज़िम रफू चक्कर हुआ। आप ज़ेरे नज़र तस्वीर से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि मज़ार शरीफ़ की क्या सूरत-ए-हाल है? हम यहां पर साबिक़(पूर्व ) स्पीकर लोक सोभा सोमनाथ चटर्जी की एक वक़्फ़ कान्फ़्रैंस में चंद साल क़ब्ल की गई तक़रीर के इक़तिबासात नक़ल करते हैं जिस में उन्हों ने कहा था कि हमारे मुल्क में 6 लाख एकर से ज़्यादा मौक़ूफ़ा अराज़ी(जमीन) है जिस की मालियत हालिया बाज़ार में 1.2 लाख करोड़ रुपये है।

उन्हों ने कहा था कि अगर इन ओक़ाफ़ी जायदादों को मुनासिब तरीक़ा से इस्तिमाल किया जाता तो मुस्लमानों को सालाना 12 हज़ार करोड़ रुपये की आमदनी होती और साथ ही ये मुफ़ीद मश्वरा दिया था कि ये ख़तीर रक़म मुस्लमानों की फ़लाह-ओ-बहबूद, तालीम और इंसिदाद ग़ुर्बत(गरीब खतम करने) के लिए इस्तिमाल की जा सकती थी जिस से मुस्लमान ख़ुद कफ़ील होसकते थे।

उन्हों ने कहा कि औक़ाफ़ का सही इस्तिमाल ना होना सयासी क़ाइदीन के एहतिसाब और ग़ौर-ओ-फ़िक्र की दावत देता है। क़ारईन! जिस शख़्स ने वक़्फ़ बोर्ड को अराज़ी(जमीन) वक़्फ़ की थी। जब उस की हदूद में ही वाक़ै इस बुज़ुर्ग के मज़ार की बेहुर्मती की जा सकती है तो 6 लाख एकड़ अराज़ी(जमीन) का तहफ़्फ़ुज़ ये वक़्फ़ बोर्ड क्या ख़ाक करेगा। जब वक़्फ़ बोर्ड की हदूद में इस मज़ार का ये हाल है तो शहर की मसाजिद, क़ब्रिस्तान और दीगर ओक़ाफ़ी जायदादों का क्या हाल होगा।

इस बुज़ुर्ग के मज़ार पर साइबान तक नहीं है नीज़ ताज्जुब है कि मज़ार के सिरहाने लगे कुतबा पर भी उन की कोई तफ़सील नहीं है। हत्ता कि तारीख़ वफ़ात भी नहीं और हम ने जब वक़्फ़ बोर्ड के ओहदेदारों से कुछ मालूमात हासिल करना चाही तो तक़रीबन तमाम हज़रात ने अपनी लाइलमी का इज़हार किया !!!

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