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हमारे लिए खौफ़ की ज़िंदगी से मौत ही बेहतर: सरहद निवासी

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में जहां पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ लगने वाली सीमा पर गोलियों की बारिश का न थमने वाला सिलसिला जारी है, वहीं शीतकालीन राजधानी जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास रहने वाले लोग अब इस तनाव की स्थिति से तंग आकर कश्मीर समस्या का आर या पार के निर्णय के मामले में स्थायी समाधान चाहते हैं। सीमा पर तनाव के कारण भय के साये तले अपना जीवन काट रहे सीमा निवासियों का कहना है कि हमारे लिए तो डर के जीवन से मौत ही बेहतर है।

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न्यूज़ नेटवर्क समूह प्रदेश 18 के अनुसार सीमा निवासियों का कहना है कि सरकार को इस समस्या का एक अस्थायी हल ढूंढना चाहिए। एक स्थानीय व्यक्ति के अनुसार बस अब बहुत हो चुका है। दिन और रातें राहत शिविरों में जीने के लिए हर रोज घरबार छोड़कर पलायन करना हमारे लिए आसान नहीं होता है। उन्होंने कहा कि सीमा पर जारी गोलियों की गरज से उनके जीवन का सुकून ही समाप्त हो गया है।
उनके अनुसार आपात स्थिति में तो अपने बच्चों को साथ लेकर सुरक्षित स्थानों की ओर चल पड़ते हैं, लेकिन हर सुबह मवेशियों को चारा डालने के लिए वापस आना पड़ता है। मवेशी को कहां ले जाएंगे?।
एक और स्थानीय व्यक्ति के अनुसार हम पिछले एक महीने से शांति से नहीं सो पाए हैं। रातों की नींद हराम होने के कारण कई बुजुर्ग लोग बीमार हो गए हैं। आर एस पुरा के एक राहत शिविर में अस्थायी स्थित एक व्यक्ति ने बताया कि त्योहार चल रहे हैं लेकिन हमारी कोई तैयारी नहीं है’। उन्होंने बताया कि बस अब आर या पार होना चाहिए। हम भी थक चुके हैं भागते भागते।
उधर उपायुक्त जम्मू सिमरन दीप सिंह के अनुसार जम्मू के सीमावर्ती बेल्ट में कुल 25 शिविर स्थापित किए जा चुके हैं जिनमें से 10 सक्रिय हैं। उन्होंने बताया कि अगले गांवों के करीब 7 से 8 सौ निवासी अपने घरों को छोड़ कर उनके शिविर में रह रहे हैं।
गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष विराम समझौता 25 नवंबर 2003 को उस समय लागू हुआ था जब दोनों देशों के महानिदेशक सैन्य अभियान (डीजी एम ओ) इस पर सहमत हुए थे।
हालांकि पहले दो साल तक सीमाओं पर पूरी तरह चुप्पी रही, लेकिन इसके बाद गोलियों की गरज शुरू हुई जिसमें हर गुज़रते वर्ष के साथ तीव्रता आ रही है। आंकड़ों के अनुसार संघर्ष विराम समझौते से लेकर अब तक पाकिस्तान 1,741 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है।

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