Tuesday , October 17 2017
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हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं. . . . .

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आमिर खान और शाहरुख़ खान के असहिष्णुता वाले बयान की खबर’ से हर ‘भारतीय’ सदमे में हैं और लोग उनको पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे है। आमिर और शाहरुख़ खान के पुतले जलाए गए और देश की विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ मुकदमे किए गए हैं जिनमें देशद्रोह का मुकदमा भी शामिल है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय भी इस अभियान को बहुत हवा दे रहे हैं. वैसे भारत में रहने वाले लोग भी कह रहे हैं कि आमिर और शाहरुख़ ने गद्दारी की है और उनको इसका परिणाम भुगतना चाहिए। है न कितनी अच्छी बात कि हम पश्चिमी लोकतान्त्रिक देशों में रहकर पूरे अधिकार के साथ भारत माता की जय बोलना चाहते हैं,अयोध्या में राम मंदिर बनाना चाहते हैं, मोदी की बड़ी बड़ी रैलियां करना चाहते हैं लेकिन अपने देश में हम पूरी दबंगई दिखाना चाहते हैं। अगर यही बात अमिताभ बच्चन ने कही होती तो क्या उनके साथ भी सुलूक यही होता??
आमिर की पत्नी और शाहरुख़ खान ने जो कहा वो बहुत सोच-विचार, विमर्श के बाद कहा और वो उनका व्यू पॉइंट है और उसे रखने की उनको छूट होनी चाहिए। उनको पाकिस्तान भेजने और उनको गाली देकर हिंदुत्व के लठैत असहिष्णुता को ही ज़ाहिर कर खुद भी उन लोगों बात को सही साबित कर रहे हैं।
हमारा देश असल में असभ्य और क्रूर है, जहाँ दहेज़ के लिए लड़कियां रोज जलती हैं, जहाँ प्रेम विवाह करने पर माँ बाप अपने ही बच्चों की निर्ममता से हत्या करने से नहीं घबराते, जहाँ किसी भी लड़की का शाम को घर से बाहर निकलना मुश्किल होता है। और विधवा होने पर औरतों की जिंदगी नरक बना दी जाती हो, जहाँ आज भी मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर उनकी हत्या कर दी जाती हो, जहाँ किसी के घर में क्या बन रहा हो उस पर समाज नियंत्रण करना चाहता हो, जहाँ स्कूलों से बच्चे इसलिए निकल कर चले जाते हो कि खाना किसी दलित महिला ने बनाया है, जहाँ प्रवेश से पहले स्कूलों में ये पुछा जाता हो की बच्चा मांसाहारी हैं शाकाहारी उस देश की महानता और संस्कृति का क्या कहें, जहां एक समाज को पढ़ने का हक़ नहीं और दूसरे को केवल मलमूत्र उठाने की जिम्मेवारी दी गई हो, जिसके छूनेसे लोग अछूत हो जाएं! लेकिन भारत की महान सभ्यता का ढोंग करने वालों का ध्यान इधर कभी नहीं गया। ऐसा नहीं कि इस विषय में लिखा नहीं गया हो या बात नहीं की गई हो।
असहिषुणता का इतिहास लिखें तो शर्म आएगी, तब आमिर खान और शाहरुख खान से क्यों इतनी नाराज़गी है? मतलब साफ़ है। भारत के इलीट मुस्लिम सेकुलरिज्म के खेल में आमिर खान भारत की सहिष्णुता के सबसे बड़े ‘ब्रांड’ एम्बेसडर थे । और जो व्यक्ति ‘अतुलनीय भारत’ की नौटंकी करता रहा हो वो अचानक पाला क्यों बदल बैठा! आमिर खान और शाहरुख़ खान व भारत के कई साहित्यकारों ने भी भारत में ‘असहिष्णुता’ होने के सबूत दिए और इस बात से में भी इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ की अख़लाक़ की मौत ‘ और हरियाणा में 2 मासूम बच्चों को ज़िंदा जलाया जाना’ ये कितनी शर्मनाक बात है फिर जब साहित्यकारों ने अपनाविरोध किया और कुछ फ़िल्मकार जो मानवता के प्रतीक थे उन्होंने भी इसका विरोध किया तो फिर इतना हंगामा क्यों।
अभी हाल में ही शाहरुख़ खान की फ़िल्म ‘दिलवाले’ आई कई प्रदेशों में उसपे बैन लगाया गया। कई जगह थियेटर्स जलाये गए। सड़को पर विरोध प्रदर्शन किया गया। सोशल मीडिया पर ज़हरीले मेसेजस किये गए की शाहरुख़ और आमिर खान की मूवी न देखो क्योंकि वो मुसलमान हैं क्योंकि उन्होंने ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले साहित्यकारों का समर्थन किया अभी 2 दिन पहले आमिर को ब्रांड एंबेसडर पद से हटाया गया। आमिर खान और शाहरुख़ खान की सिक्यूरिटी कम कर दी गई। बीजेपी के कई नेता अपना ऑफिसियल स्टेटमेंट देकर कह रहें हैं की ये लोग देश द्रोही हैं जब की हमारा संविधान हमे बोलने की आज़ादी देता हैं तो क्या इन सब चीज़ों से ये ज़ाहिर नहीं होता की देश में असहिष्णुता हैं एक बहुत बड़ा सच ये भी है की आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जब भारत का नाम लेंगे तो पीछे से एक आवाज़ आएगी ‘ओह इट्स srk’s प्लेस’ दुनिया में कई जगह भारत शाहरुख़ खान की वजह से भी जाना जाता है
तो फिर क्या बदला? लोग कहते हैं फ़िल्मी लोगों को उतनी ही तवज्जो मिलनी चाहिए जिसके वे हक़दार हैं। पिछले कुछ वर्षों में बम्बइया फ़िल्मी लोग हिंदुत्व का एजेंडा लागू करने में सबसे प्रमुख रहे हैं और उनकी प्रसिद्धि ने चुनाव भी जितवाया है लेकिन उनमें कोई भी ऐसे नहीं हैं जो शाहरुख़, आमिर या अमिताभ का दूर दूर तक मुकाबला कर सके। अमिताभ हालाँकि गुजरात या अन्य सरकारी विज्ञापनों में आते हैं लेकिन वो भी राजनैतिक हकीकतों से वाकिफ हैं, इसलिए चुप रहते हैं। हालाँकि देर सवेर उन्हें भी मुंह खोलना पड़ेगा। आज के हिंदुत्व कॉर्पोरेट के दौर में भारत की आक्रामक मार्केटिंग चल रही है इसलिए आमिर या शाहरुख़ जो वाकई में भारत के सवर्णों की ‘सहनशीलता’ के ‘प्रतीक’ हैं इसलिए उनसे ये ‘उम्मीद’ ये की जाती है कि वे डॉ. ए. पी. जे. कलाम की तरह अपने ‘भारतीय’ होने का सबूत दें। कोई मुसलमान यदि अपने दिल की बात रख दे तो वो ‘देशद्रोही’ है। जिन लोगों को सुनकर हम बड़े हुए उन साहिर, दिलीप कुमार, मोहम्मद रफ़ी, बेगम अख्तर को धर्म के दायरे में डाला जा रहा क्योंकि वे अपनी एक राय रखते हैं। कई बार फिल्म स्टार, गायक या खिलाड़ी लोग वो बात कह देते हैं जो उनके कई प्रशंसकों को नहीं जंचती। उसमें कोई बुरी बात नहीं है। हम आमिर खान से साम्प्रदायिकता और सहिष्णुता का ज्ञान नहीं लेते, अपितु उनकी फिल्म इसलिए देखते हैं कि वो साफ सुथरी फिल्म बनाते हैं। क्या हम रवीना टंडन, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान या मनोज तिवारी से ज्ञान लें? हाँ फिल्मो में बहुत से लोग रहे हैं जिन्होंने गंभीर विषयों पर बोला है और उनकी समझ समझ है। बाकी हमको कोई कलाकार इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि हमें उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है या फिल्म अच्छी लगती है। अगर आप आमिर या शाहरुख़ की फिल्मों का बॉयकॉट इसलिए करना चाहते हैं कि उनकी कोई बात आपको अच्छी नहीं लगी तो फैसला आपका है क्योंकि फिर आपको मनोज तिवारी, अनुपम खेर, अशोक पंडित, गजेन्द्र चौहान आदि की फिल्मे देखनी पड़ेंगी क्योंकि उनके विचार आपको अच्छे लगते हैं।
आमिर खान और शाहरुख़ खान ने जो कहा वो उनका हक़ था और शायद देश का बहुत बड़ा तबका वैसे ही सोच रहा है। अपने दिल की बात को अगर वो कह दिए तो हमारा क्या फ़र्ज़ है? उसको गालियों से लतियाएं या भरोसा दिलाएं?
हकीकत यह है कि हम वाकई में एक बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहे हैं जिसमें तिलिस्मी राष्ट्रवादी नारों की गूँज में हमारे मानवाधिकारों और अन्य संवैधानिक अधिकारों की मांग की आवाज़ों को दबा दिया जा रहा है। और इन सब हालातों के बावजूद इस देश का चौकीदार चुप क्यों है? इससे साफ़ ज़ाहिर होता है की कहीं न कहीं उसकी तरफ से भी रजामंदी है|

By:अहमद ख़बीर
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