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हार कर भी जीते मुलायम, सिर्फ ब्रांड अखिलेश पर सिमटा चुनाव

लखनऊ: (फैसल फरीद): अभी यकीन नहीं होता कि समाजवादी पार्टी में चल रही उठा-पटक में मुलायम सिंह यादव हार गए हैं. वैसे वो पहले भी और अब भी बेटे अखिलेश यादव के साथ ही हैं. दरअसल मुलायम सिंह यादव ने इतनी बार पलटी मारी है की मुश्किल हो गया हैं और लोग उनको राजनीति का मंझा हुआ खिलाडी, चरखा दांव लगाने वाला राजनीतिक और सियासी चाणक्य का ख़िताब देने लगे. लेकिन असलियत में मुलायम किस्मत के धनी रहे हैं और उनकी जीत में इसका काफी रोल रहा हैं. अक्सर लोग सुनाते रहे हैं कि मुलायम ने हमेशा अपने साथियों का साथ दिया लेकिन ऐसा पूरी तरह नहीं हैं. मुलायम ने बहुतो का साथ भी छोड़ा हैं.
इसी वजह से मौजूदा राजनितिक माहौल में ये कहना की मुलायम हार गए ठीक नहीं हैं, कुल मिला कर मुलायम जीते हैं क्योंकि उनकी समाजवादी पार्टी उनके बेटे के पास ही हैं. साल १९६७ में जब मुलायम ने पहली बार जसवंतनगर विधान सभा से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा तो वो सीट कोई मुश्किल नहीं थी. यादव बाहुल्य सीट थी, सिटिंग विधायक नत्थू सिंह भी यादव थे, ऐसे में मुलायम की जीत कोई बहुत अप्रत्याशित नहीं थी. हाँ उसके बाद ये ज़रूर हुआ की नत्थू सिंह के परिवार का कोई भी व्यक्ति आज इटावा में राजनीति में नहीं आ पाया.
वहां अब सैफई घराना ज़रूर राजनीति में छा गया. आगे बढिए–वी पी सिंह, चंद्रशेखर, हेमवतीनंदन बहुगुणा, अजित सिंह, राजीव गाँधी, कांशीराम–इन सब नाम में एक समानता हैं की ये सब बड़े राजनेता हुए. लेकिन इसके अलावा एक बात और हैं की इन सबको मुलायम ने कभी न कभी, कहीं न कहीं छोड़ा ज़रूर हैं. मुलायम १९८८ में बहुगुणा के साथ छोड़ कर वी पी सिंह के साथ आये, १९८९ में मुख्यमंत्री पद पर अजित सिंह के खिलाफ हुए, लेकिन बाद में अजित सिंह से भी हाथ मिलाया और बीच में चंद्रशेखर के साथ रहे, राजीव गाँधी की मदद से सरकार चलायी और छोड़ दिया, कांशीराम के साथ चुनाव लडे और फिर अलग हुए–ये सब कुछ मुलायम सिंह ने १९८८ से १९९३ तक मतलब पांच साल में कर डाला. इतना जल्दी साथ होना, फिर अलग होना असंभव लगता हैं.
लेकिन मुलायम ऐसे ही रहे, २००९ में आज़म खान को निकला, बेनी प्रसाद वर्मा, राज बब्बर से किनारा किया, भाजपा के नेता कल्याण सिंह के साथ हुए, २०१० में अपने सहयोगी अमर सिंह को बाहर किया. इनमे से कल्याण और राजबब्बर के अलावा सबको वापस भी ले लिया. अब २०१२ में मुख्यमंत्री उन्होंने अखिलेश को बनाया, लेकिन हमेशा सरकार में दखलंदाज़ी रही इस बाद को अखिलेश ने खुले मंच से माना. चुनाव से पहले एक उठा-पटक शुरू हुई. मोटे तौर पर मुलायम अखिलेश के खिलाफ शिवपाल और अमर सिंह के साथ नज़र आये. लेकिन अब ऐसा नहीं लग रहा हैं, अमर सिंह विदेश चले गए हैं और शिवपाल आखिर में मुलायम के भाई हैं.
और अखिलेश उनके बेटे. समाजवादी पार्टी में अभी भी मुलायम संरक्षक है, परिवार का हित भी सुरक्षित हैं, इतनी उठा-पटक के बाद अब चुनाव अखिलेश के नाम पर हो रहे हैं, सरकार की नाकामी की अब बात नहीं होनी हैं. तमाम मुद्दे जिसपर सपा और मौजूद सरकार घिर सकती थी, वो अब गायब हो गए हैं. मतलब–सपा का दामन साफ़ और चुनाव की तैयारी, इसके अलावा किसी पोलिटिकल पार्टी को क्या चाहिए
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