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हिंदुत्व ब्रिगेड क्यों चाहता है समान नागरिक संहिता: आकार पटेल

हिन्दुस्तान में अभी जिस सियासी दल का राज है, उसकी अपनी एक विचारधारा है. इस विचार को हम हिंदुत्व के नाम से जानते हैं जिसकी मोटेतौर पर तीन मांगें हैं. पहला, भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 का को ख़त्म करना, दूसरा, अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण और तीसरा समान नागरिक संहिता को लागू करना.

तीनों ही मुद्दों में इन्हें मुसलमानों से कुछ ना कुछ चाहिए. जैसे कि अनुच्छेद 370 के ज़रिए वे कश्मीर के मुसलमानों से उनकी संवैधानिक स्वायत्तता लेना चाहते हैं. मंदिर के लिए मुसलमानों की बाबरी मस्जिद की बलि और यूनिफार्म सिविल कोड के लिए उन्हें अपने पर्सनल लॉ छोड़ने पड़ेंगे.

यही वजह है कि तीनों मांगें सकारात्मक की बजाय नकारात्मक दिखती हैं. साथ ही, बहुसंख्यकों की भावना का एक प्रोडक्ट नज़र आती हैं. मेरा मतलब है कि यह मांग उतनी सुधारवादी नज़र नहीं आती, जितनी की इन मांग को उठाने वाले इसको दिखाना चाहते हैं. हम देख सकते हैं कि इसी नकारात्मक भाव के कारण बाबरी के गिराए जाने के बाद मंदिर आन्दोलन का क्या हुआ? वह आन्दोलन बिखर गया क्योंकि वह मंदिर को बनाने की दिशा में सकारात्मक कम बल्कि मस्जिद को गिराने की नकारात्मक सोच के साथ ज़्यादा था.

अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने में ढेर सारी कानूनी अड़चनें हैं जो कश्मीर को पूरी तरह से एकीकरण को रोकती हैं. साथ ही, हम कश्मीर के मौजूदा हालात से मौजूदा सरकार की मंशा को भी समझ सकते हैं. पाकिस्तान के खिलाफ की गयी कार्यवाई की ख़बरों में घाटी में हो रही घटनाओं की खबरें नज़रंदाज़ कर दी गयीं. मगर अभी या कुछ वक़्त के बाद हमें यह देखने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि घाटी के हालात को कैसे सुधारा जाए.
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इस बीच यूनिफार्म सिविल कोड का मुद्दा ज़ोर पकड़ रहा है और यह दो चरणों में हो रहा है. पहला है “ट्रिपल तलाक”, जिसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जिसमें पुरुषों का वर्चस्व है बनाए रखना चाहता है. ट्रिपल तलाक पुरुषों के लिए एक जल्द तलाक का विकल्प है जिसकी पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम देशों में पाबंदी है. सरकार इसे अवैध बनाना चाहती है और अदालतों में भी सरकार पक्ष में है.

अगर ऐसा होता है तब हमें कई सारी गिरफ्तारियों के लिए तैयार रहना चाहिए. दूसरा मुद्दा बहुविवाह का है, जिसमें हिंदुत्व का वास्तविक स्वार्थ निहित है. ऐसा सोचा जाता है कि बहुविवाह के ज़रिये ही मुसलमान तेज़ी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं और इसके कारण एक वक़्त पर वे बहुसंख्यक हो जायेंगे. मगर ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि आंकड़ों के मुताबिक मुस्लिम मर्दों की तुलना में हिन्दू पुरुषों में बहुविवाह के ज़्यादा मामले हैं. लेकिन चूंकि यह धारणा सीधे मुस्लिम समाज से जोड़कर उसके खिलाफ कर दी गई है, जिसकी वजह से यूनिफार्म सिविल कोड की मांग ने जोर पकड़ा है.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कुछ दिन पहले लिखा था कि उदारवादियों और वामपंथियों (मुझे लगता है कि वह कम्युनिस्ट कहना चाहते थे, लेकिन मैं गलत हो सकता है) को यूनिफार्म सिविल कोड का समर्थन और बहुविवाह का विरोध क्यों करना चाहिए. उन्होंने हिंदुत्व की मांग के उनके विरोध को इन सात चीजों में से एक होने के रूप में वर्गीकृत किया:

1950 के दशक में हिंदू पर्सनल लॉ में सुधार उतने प्रगतिशील नहीं थे जितना दिखाए गए थे.

प्रथागत कानून और हिन्दुओं की प्रथाएं आज भी काफी प्रतिक्रियावादी हैं जैसे उदाहरण के लिए खाप पंचायतें.

मुस्लिम पर्सनल लॉ जिनमें सुधार नहीं किया गया है वे उतने प्रातक्रियावादी नहीं हैं जितने दिखते हैं और ये कानून अक्सर महिलाओं को भी उचित अधिकार देते हैं.

मुसलमानों की प्रथाएं उतनी बुरी नहीं हैं जितना दावा किया जाता है. इसी तरह मुसलमानों में बहुविवाह की प्रथा दूसरी या तीसरी पत्नी से उतना भेदभाव नहीं होने देती जितना की हिन्दू बहुविवाह प्रथा में होता है.

यूनिफार्म सिविल कोड की मांग भाजपा के राजनीतिक अजेंडा से प्रेरित है.

यूनिफार्म सिविल कोड की बात करने वाला संविधान का अनुच्छेद 44 संविधान के अनुच्छेद 25 से टकराता है जो भारतीय नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता का वादा करता है.

संविधान में ऐसे कई अन्य अनुच्छेद हैं जिनके निर्देश अभी तक पूरे नहीं हुए हैं फिर इसी एक अनुच्छेद को लेकर ही क्यों चिल्लाया जाए?
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मेरी राय में, गुहा एक बात भूल गए, जो प्रमुख है कि कुछ उदारवादी (जो लोगों के व्यक्तिगत के अधिकारों के लिए लड़ते हैं) ने इस सुधार का विरोध क्यों किया? वह है एक औरत या आदमी का, एक दूसरी पत्नी या एक दूसरा पति (बहुपतित्व भारत में कुछ समुदायों में अभी भी प्रचलित है) बनने का अधिकार. यह सच है एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि मुस्लिम महिलाओं का 90 प्रतिशत बहुविवाह का विरोध करता है लेकिन देखना यह होगा कि 90 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं रहती भी तो एकल विवाह में हैं. बहु विवाह प्रथा में रहने वाली महिलाएं इसको कैसे देखती हैं उसका डेटा देखना दिलचस्प होगा.

गुहा का कहना है कि बहुविवाह एक घृणित प्रथा है जिस पर एक बार में ही प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए. मेरी राय में यह एक नैतिक निर्णय है. भारतीय कानून और सरकारों ने समलैंगिकता के बारे में भी ऐसी बातेंकही हैं. लेकिन उदारवादी वहां भी व्यक्तिगत अधिकारों के लिए खड़े होंगे. मेरा अनुमान है, यह सब मुद्दों से भटकाने के लिए किया जा रहा है. ट्रिपल तलाक और बहुविवाह अगले मुद्दे हैं जिस पर हिंदुत्व खुद को मज़बूत करने की कोशिश करेगा. और, अन्य मुद्दों की तरह जहां ऐसा हुआ है, हम यहां भी आने वाली परेशानियों को समझना चाहिए.

लेखक आकार पटेल एमनेस्टी इंडिया के प्रमुख हैं. उनका यह लेख कारवां मैग्ज़ीन से साभार लिया गया है. अनुवाद सियासत डॉट कॉम के मोहम्मद ज़ाकिर रियाज़ ने किया है.

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