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हैदराबाद के चारमीनार की तरह शहर बुख़ारा में भी एक और चारमीनार

नुमाइंदा ख़ुसूसी दुनिया भर में जहां कहीं हैदराबाद का जब तज़किरा होता है तो चारमीनार ज़रूर याद किया जाता है । हैदराबाद को चारमीनार का शहर कहा जाता है जैसे आगरा को ताज महल का शहर कहते हैं । हिंदूस्तान बिलख़सूस दक्कन की शान और वक़ार

नुमाइंदा ख़ुसूसी दुनिया भर में जहां कहीं हैदराबाद का जब तज़किरा होता है तो चारमीनार ज़रूर याद किया जाता है । हैदराबाद को चारमीनार का शहर कहा जाता है जैसे आगरा को ताज महल का शहर कहते हैं । हिंदूस्तान बिलख़सूस दक्कन की शान और वक़ार की हैसियत रखने वाले क़ुतुब शाही फ़न तामीर के लाफ़ानी शाहकार चारमीनार के तज़किरे के बगैर हैदराबाद की तारीख मुकम्मल नहीं होसकती । ये इमारत अपने ख़ूबसूरत नक़्श-ओ-निगार , मुतनासिब व मतवाज़िन तामीर के लिहाज़ से जुनूबी हिंद की यादगारों में एक मुमताज़ दर्जा रखती है । क़ुतुब शाही बादशाहत के पांचवें फ़रमां रवां मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह ने 1591 में इसआलीशान इमारत को तामीर करवाया था जो आज आलमी शौहरत याफ़ता इमारतों में सर-ए-फ़हरिस्त है ।

सरबलंद मीनारों से मुज़य्यन ये पुर शिकवह इमारत हैदराबाद की किसी भी क़दीम या जदीद इमारत के मुक़ाबले में बैरूनी स्याह के ज़हन पर गहरे नुक़ूश छोड़ती है । यही वजह है कि इस की तस्वीर हाली सिक्का पर कुंदा की गई थी और भारत उसका विट्स एंड गाईड्स शाख़ हैदराबाद ने भी उसे अपना निशान मुंतख़ब किया है । नीज़ उस की अज़मत और आलमी मक़बूलियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि एक चारमीनार उज़बेकिस्तान के शहर बुख़ारा में भी तामीर किया गया था । फ़न तामीर के नुक़्ता-ए-नज़र से बुख़ारा का ये चारमीनार हैदराबाद के चारमीनार से बहुत मुमासिलत-ओ-मुशाबहत रखता है ।

अलबत्ता उस की बुलंदी हमारे चारमीनार से कम है । हैदराबाद के चारमीनार की तामीर के तक़रीबन 216 साल बाद बुख़ारा में 1807 मुताबिक़ 1222 हमें ये चारमीनार तामीर किया गया था । ये भी फ़न तामीर का एक आला नमूना है । बुख़ारा के एक रईस तिजारत के लिए अक्सर हैदराबाद आया करते थे उन्हों ने कई मर्तबा हमारे शहर के चारमीनार को देखा और इस से बेहद मुतास्सिर हुए और फैसला करलिया कि वो सरज़मीन बुख़ारा पर भी इस तरह की एक इमारत बनाएंगे । इस रईस ताजिर का नाम नियाज़ गुल बेग था जो तुर्कमान क़बीला से था । वो घोड़ों और दरियों की तिजारत किया करता था ।

नियाज़ गुल बैग जब हैदराबाद से वापस बुख़ारा पहुंचा तो उन्हों ने इंजीनीयरों और माहिरीन फ़लकियात को तलब कर के अपने नक़्शा के मुताबिक़ एक मदरसा तामीर करने की पेशकश की और उन को हिदायत की कि मदरसा इसी शाहराह पर हो जहां तुर्कमान से आने वाले ताजिरों के क़ाफ़िले बा आसानी पहुंच कर आराम कर सकें । बुख़ाराका ये चारमीनार दरअसल इस मदरसा की अज़ीम बाब उल दाखिला है और बुख़ारा की तारीख़ी इमारतों में उसे भी अपने ग़ैर मामूली तर्ज़ तामीर की वजह से मुमताज़ हैसियत हासिल है । इस के चारों मीनार जो एक दूसरे से करीब हैं दूर से देखने पर फूल कलियों की तरह नज़र आते हैं । इस के चारमीनार सिर्फ चार सिम्त पर ही दलालत नहीं करते बल्कि बुख़ारा की क़दीम चार बादशाहत की तरफ़ भी इशारा करते हैं ।

इस के गुंबद के ठीक नीचे एक लाइब्रेरी है जहां से मीनारों के अंदर रास्ता जाता है । इस वक़्त इस चारमीनार के चारों जानिब अपार्टमंट हाउस हैं । लेकिन इस के बुलंद मीनार आज भी वहां की अज़मत रफ़्ता की याद ताज़ा करते रहते हैं । मालूम रहे कि हैदराबाद के तारीख़ी चारमीनार के ऊपर भी एक मदरसा और मस्जिद है । इमाम-ओ-मोज़न साहिबान के हुजरे भी हैं

। मस्जिद के अंदरून-ओ-बैरून में 260 मुस्लियों की गुंजाइश है । वुज़ू ख़ाना भी है और मस्जिद के साथ एक हौज़ भी बनाया गया था जिस में तालाब जल पली से पानी पहुंचाया गया था । ये हौज़ 1185 ह तक मौजूद था लेकिन अब बाक़ी नहीं रहा । इमारतें किसी भी शहर और वहां के रहने वालों की तहज़ीब-ओ-तमद्दुन और सक़ाफ़्त की हमेशा रहने वाली अलामत कहलाती हैं । उन के बनाने वाले फ़नकार दुनिया से रुख़स्त हो जाते हैं मगर अपनी फ़नकारी और मेहनत-ओ-मशक़्क़त के अनमिट नुक़ूश छोड़ जाते हैं जो इंसानी तमद्दुन की तारीख में हमेशा दरख़शां रहते हैं ।।

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