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हैदराबाद जो कल था- बी. पी. आर विट्ठल

सीनियर आई ए एस ओहदेदार बी पी आर विट्ठल का शुमार उन शख़्सियतों में होता है, जिन्होंने सुकूत-ए-हैदराबाद से पहले और बाद के हैदराबाद को क़रीब से देखा है। निज़ाम की हुक्मरानी के बाद हैदराबाद रियासत और बाद में आंध्रा प्रदेश में हुक्मरानी क

सीनियर आई ए एस ओहदेदार बी पी आर विट्ठल का शुमार उन शख़्सियतों में होता है, जिन्होंने सुकूत-ए-हैदराबाद से पहले और बाद के हैदराबाद को क़रीब से देखा है। निज़ाम की हुक्मरानी के बाद हैदराबाद रियासत और बाद में आंध्रा प्रदेश में हुक्मरानी के तौर तरीक़े और हुक्काम के मिज़ाज को भी जानते हैं। वो उस्मानिया यूनीवर्सिटी के रजिस्ट्रार रहे। मेदक और करीमनगर ज़िले के कलेक्टर के तौर पर काम किया। फ़ैनान्स डिपार्टमैंट के सेक्रेटरी के ओहदे पर तवील अर्से तक काम करने का रिकार्ड भी उनके नाम है। यू एन ओ के लिए सूडान में ख़िदमात अंजाम दीं और फ़ैनान्स के मौज़ू पर कई किताबें लिखीं। हैदराबाद जो कल था के मौज़ू पर उन से गुफ़्तगु का ख़ुलासा यहाँ पेश है…
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जे़वरात के बक्से: कभी इधर कभी इधर
हमारा ख़ानदान आंध्रा से यहां आया था, मेरे मामूं हनुमंत राव निज़ाम कॉलेज में प्रोफ़ैसर थे। वो 1919 में यहां आए थे। उनके एक भाई जया राव आई सी एस के लिए मुंतख़ब होकर किरमानी के साथ ट्रेनिंग के लिए लंदन चले गए थे। हैदराबाद की तारीख़ में दो ही लोग आई सी एस मुंतख़ब हुए थे, जिया राउ और किरमानी साहब। इत्तिफ़ाक़ से ट्रेनिंग से लौटते हुए किरमानी फ़लस्तीन में उतरे तो वहाँ उनका क़त्ल हो गया और जया राव 10 साल बाद एक सड़क हादसे में इंतिक़ाल करगए। ख़ैर! बाद में जया राव साहब की दुख़्तर से मेरी शादी हुई। जो निज़ाम कॉलेज से एम ए के मद्रास यूनीवर्सिटी से होने वाले इमतिहानात के आख़िरी बैच (1949) की तालिबा थीं। मेरे वालिद निज़ाम कॉलिज में अंग्रेज़ी मीडियम एम ए के पहले बैच के तालिब-ए-इल्म थे। इस तरह निज़ाम कॉलेज का एक अहम तारीख़ी बाब हमारे ख़ानदान से जुड़ा रहा।
वालिद साहब जब यहाँ आए तो रेड हिल्ज़ में मकान लिया। उस वक़्त नामपली और रेड हिलज़ में जागीरदारों और नवाबों ने अच्छे मकान बना लिए थे। आबिद अली ख़ां साहब के मामूं नासिर अली ख़ां ने ही उन्हें रेड हिल्ज़ पर मकान दिलवाया था। वो वालिद साहब के शागिर्द थे। पुलिस ऐक्शण के दौरान का एक वाक़िया याद आ रहा है। जैसे ही पुलिस ऐक्शण की इत्तिला मिली, वालिद साहिब ने ये सोच कर कि क़ीमती चीज़ें मुसलमानों के घरों में महफ़ूज़ रहेंगी, अपने घर के जे़वरात एक बक्से में बंद करके महमूद अली ख़ां साहब के भाई मख़दूम अली ख़ां को दिए और कहा कि उसे अपने घर में रखें। मख़दूम अली ख़ां साहब, आबिद अली ख़ां साहिब के चचा थे। पुलिस ऐक्शण हुआ और हिंदुस्तानी फ़ौज हैदराबाद में दाख़िल हुई। एक दो दिन बाद मख़दूम साहब हमारे घर आए तो उनके साथ दो बक्से थे। एक में हमारे जे़वरात थे और दूसरे में उनके घर के उन्हों ने वालिद साहब से कहा कि वो अपने जे़वरात हमारे घर में रखें। पुलिस ऐक्शण के बाद मख़दूम अली ख़ां साहब को कुछ दिन की जेल भी हुई। जेल से छूटने के बाद उन्होंने अपने जे़वरात हासिल किए। वो दौर ही कुछ ऐसा था कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी एक दूसरे का भरोसा नहीं डगमगाया।

क़ाबिलीयत का एहतिराम
हैदराबाद रियासत में काबिल लोग और उनकी क़ाबिलीयत का बहुत एहतिराम किया जाता था और इस मुआमले में मुल्की, ग़ैर मुल्की, हिंदू या मुसलमान नहीं देखा जाता था। यही वज्ह थी कि शुमाली हिंद-ओ-मद्रास के इलावा आंध्रा से भी काफ़ी लोग वक़तन फ़वक़तन हैदराबाद आए। जहां तक निज़ाम कॉलेज की बात है तो यहाँ आला ओहदों पर आला तालीम याफ़ता अंग्रेज़ थे या फिर ऑक्सफ़ोर्ड से फ़ारिग़ मुस्लमान। लेकचरर के ओहदों के लिए अंग्रेज़ी दाँ अफ़राद की ज़रूरत थी। इस के लिए मद्रास और आंध्रा से लोग बुलाए गए। आंध्रा से ब्रह्मणों के हैदराबाद आने की एक और वज्ह थी। 1920 में अंग्रेज़ों की वजह से वहाँ ब्राह्मन मुख़ालिफ़ माहौल बनने लगा था। उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही थीं। हैदराबाद में उनके लिए साज़गार माहौल था।
हालाँकि मुक़ामी लोगों ने ग़ैर मुल्की और ब्राह्मणों को मुलाज़मतें देने की मुख़ालिफ़त की, लेकिन निज़ाम ने उन्हें मौज़ूं जवाब दे कर ख़ामोश किया। चुनांचे दो बातें जो इस दौर में काफ़ी मशहूर हुईं, उन का ज़िक्र में यहां करूंगा। किसी ने निज़ाम से कहा कि सरकार! ग़ैर मुल्कियों को नौकरियां क्यों दी जा रही हैं?
आला हज़रत ने उस शख़्स से कहा: अरे तेरे को अंग्रेज़ी आती?… नईं आती ना!… तेरे को सिखाने के लिए कॉलेज बनाए । पहले ख़ुद सीखो, इस के बाद फिर मुलाज़मत करो। ( वो कुछ लोगों से सीधे इसी लहजे में बात करते थे।)
आज जो ए जी ऑफ़िस है वहां निज़ाम के अकाऊंटेंट जनरल का ऑफ़िस क़ायम किया गया था। जब इस दफ़्तर में ब्राह्मन ओहदेदारों की तादाद बढ़ने लगी तो एतराज़ किया गया। इस पर निज़ाम ने कहा कि: तुम को हुकूमत करना आता, उनको हिसाब करना आता है। इस लिए उनको सेग़ेदार बनाया गया। जब तुम हिसाब करना सीखो तो सैग़ेदार बन जाओ। निज़ाम चाहते थे कि तालीम और हुकूमत के निज़ाम में आला तालीम याफ़्ता और काबिल लोगों को मुक़र्रर करके मुल्की अफ़राद को बेहतर तर्बीयत दी जाये, ताकि जब वो सीनियर होजाएं तो बेहतर ढंग से काम करसकें।

जब निज़ाम कॉलेज से निकाल दिए गए
मेरी इब्तिदाई तालीम आलिया स्कूल में हुई। चूँकि वालिद निज़ाम कॉलेज में पढ़ाते थे। इस लिए हमें आलिया स्कूल में मुफ़्त तालीम का इंतिज़ाम था। आलिया में पढ़ने का एहसास ही अलग था। यहाँ के तालिब-ए-इल्म बड़े फ़ख़्र से कहते कि हम आलिया के तालिब-ए-इल्म हैं! । मेरे हमअसर आबिद हुसैन साहब ( आई ए एस ) उन दिनों चादर घाट में पढ़ते थे। एक बार जब इस मौज़ू पर बात छिड़ी तो मैंने मज़ाक़ से कहा था : ये चादरघाट स्कूल कहाँ है? उन दिनों आलिया में दाख़िला मिलना मुश्किल था।
आलिया के बाद मैंने निज़ाम कॉलेज में दाख़िला लिया, लेकिन यहां से मुझे निकाल दिया गया। वाक़िया कुछ यूं था कि इन दिनों कांग्रेस ने भारत छोड़ो तहरीक छेड़ रखी थी। मैं भी खद्दर पहनता था। गांधी जी की हिमायत में में तहरीकों में हिस्सा लेता रहा और हैदराबाद में भी रैलियां निकालीं।ये ख़बर जब निज़ाम हुकूमत को मिली तो उन्होंने मुझे कॉलेज से निकालने का हुक्म दिया। इस के बावजूद कि वालिद वहां प्रोफ़ैसर थे। इस अमल को रोका नहीं जा सका। इसके बाद मैंने मद्रास के क्रिस्चियन कॉलिज में दाख़िला लिया। वहां से मैंने गांधी जी को ख़त लिख कर पूरे वाक़िये की जानकारी दी। गांधी जी ने जो जवाबन ख़त लिखा था, वो अब तक मेरे पास मौजूद है। मेरी उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 18 साल थी। बाद में तालीम मुकम्मल करके में हैदराबाद आया और 1949 में एड्मिनिस्ट्रेटिव सर्विस का इम्तिहान लिखा। यहाँ से 11 लोग मुंतख़ब करके दिल्ली भेजे गए जिन में से 5 लोग सीधे आई ए एस सर्विस में तबदील किए गए, उन में मेरे इलावा बी एन रामन, आबिद हुसैन और दीगर लोग शामिल थे।

बड़े पैमाने पर ग़सब करली गईं मुसलमानों की ज़मीनात
जब हम मुलाज़िमत में आए तो हुकूमत का सारा निज़ाम उर्दू में था, दस्तावेज़ उर्दू में थे। ज़मीनात के रिकार्ड उर्दू में थे। तक़रीबन 2 साल तक काम उर्दू में होता रहा। इस दौरान मद्रास से कुछ ओहदेदार बुलाए गए। यूं हैदराबाद में पहले से सरकारी निज़ाम बहुत अच्छा था, लेकिन लैंड रेकॉर्ड्स का निज़ाम इतना बेहतर नहीं था, जितना मद्रास में था। इस का फ़ायदा बाहर से आने वालों ने उठाया और कई ग़रीब और मासूम मुसलमानों की ज़मीनात के दस्तावेज़ अपने नाम करलिए। 1956 में जब आंध्रा प्रदेश क़ायम हुआ तो आंध्रा के कई लोगों ने यहाँ के लैंड रिकॉर्ड्स में तबदीलियां कीं।
बेल्लाविस्टा के पास निज़ाम हुकूमत ने उन लोगों को ज़मीन के पट्टे दिए थे, जिन की ज़मीनात हिमायत सागर और उसमान सागर में मुतास्सिर हुई थीं। उनको शहर की इस ज़मीन ( जो उस वक़्त गांव में थी ) की सही क़ीमत का अंदाज़ा नहीं था। 2000/1000 रुपया दे दिलाकर उन से वो दस्तावेज़ ले लीए गए और उन ज़मीनात के दस्तावेज़ अपने नाम करलिए। आंध्रा के लोगों के साथ कुछ मुक़ामी लोग भी इसमें शामिल थे। बंजारा हिल्ज़ रोड नंबर 1 पर एक तरफ़ प्रिंस मुफ़ख़्ख़म जाह का मकान है। दूसरी तरफ़ जो मुक़ामी मुसलमानों के मकान थे उन का क्या हुआ? अब वहां दो तीन मकानों को छोड़ दें तो मुकम्मल सड़क के एक किनारे पर आंध्रा के लोगों का क़ब्ज़ा है। ज़मीनों पर इस तरह क़ब्ज़ों का सिलसिला दो तीन साल तक चला। 1969 में जब तेलंगाना तहरीक चली तो इस में ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन्हें अपनी ज़मीन के छिन जाने का एहसास होचुका था। आहिस्ता आहिस्ता जब तालीमी निज़ाम अंग्रेज़ी में बदलने लगा और लोग रिकॉर्ड्स के मुआमले में मालूमात हासिल करने लगे तो उन्हें अपने ठगे जाने का एहसास हुआ।
एक दूसरी वजह ये थी कि मुक़ामी लोगों के पास इतना रुपया नहीं था। एक ओहदेदार ख़्वाजा अबदुलग़फ़ूर साहब का तबादला जब मुंबई हुआ तो उन्होंने अपनी 10 एकड़ ज़मीन फ़रोख़त करने का इरादा किया। उन्होंने मुझ से कहा कि 40 हज़ार रुपये में रख लीजिए, लेकिन मेरे पास इतने रुपये नहीं थे बल्कि 4 हज़ार भी मुश्किल से रहे होंगे। वो ज़मीन भी आंध्रा वालों ने ख़रीद ली।

अपना होने का मतलब सिर्फ़ मुसलमान नहीं था
हैदराबादी तहज़ीब में अपनेपन की जो बात है वो कहीं और दिखाई नहीं देती। यहां अपना होने का मतलब सिर्फ़ हिंदू या मुसलमान होना नहीं था, बल्कि अपना होने का जज़्बा मज़हब और फ़िरक़े की बुनियाद से बिलकुल परे था। मुझे याद है, जब कॉलज में तलबा के साथ कांग्रेस के बारे में गुफ़्तगु करने पर वालिद साहब की बर्ख़ास्तगी के अहकामात जारी किए गए तो वालिदा ने अपनी दोस्त बेगम हसन लतीफ़ से इस का ज़िक्र किया। आबिड्स- नामपली सड़क पर आज जहां डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर का दफ़्तर है , वही हसन लतीफ़ साहब का मकान हुआ करता था। बेगम हसन लतीफ़ और मेरी वालिदा सर अकबर हैदरी से मिलीं और उन्हें वालिद साहिब की बहाली की दरख़ास्त की। सर अकबर हैदरी ने जब इस बारे में अंग्रेज़ प्रिंसिपल से पूछा तो उन्होंने बताया कि जायदाद ख़ाली नहीं है। अकबर हैदरी ने अहकाम जारी किए कि नई जायदाद निकाली जाये और इस पर तक़र्रुर किया जाये। हैदराबाद में ब्राह्मणों या दूसरे मज़ाहिब के लोगों के साथ कभी इमतियाज़ी सुलूक नहीं बरता गया। ग़ैर मुल्की होने का एहसास बस तक़र्रुर होने तक ही रहता। बाहर से आने वालों को जब एक बार सरकार से इजाज़त मिल जाती तो फिर इस के बाद ग़ैर मुल्की होने का एहसास भी जाता रहता। निज़ाम की हुकूमत में एक और ख़ास बात ये थी कि करप्शन बहुत कम था , आंध्रा प्रदेश के क़ियाम के बाद इस में तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ।

आंध्रा और तेलंगाना की तहज़ीब में फ़र्क़
आंध्रा और तलंगाना की तहज़ीब आदाब-ओ-अत्वार में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ था, ख़ुसूसन सरकारी ओहदेदारों में इमतियाज़ी रवैया नहीं था। बड़े ओहदेदारों की इज़्ज़त बहुत थी, वहीं छोटे ओहदेदारों को भी नीची नज़र से नहीं देखा जाता। लेकिन आंध्रा में ऐसा नहीं था। वहां अंग्रेज़ीयत हावी थी। तहसीलदार और गिरदावर ( रेविन्यू इन्सपैक्टर ) कलेक्टर के डाक बंगले में दाख़िल भी नहीं होसकते थे, बंगले के बाहर कैंप लगाते। मैं दो अलग वाक़ियात का ज़िक्र करूंगा, जिस से पता चलेगा कि हैदराबाद का कल कैसा था।आंध्रा प्रदेश बनने से पहले और बिलकुल बाद में करीमनगर में कलेक्टर था। ग़ुलाम हैदर साहब बोर्ड आफ़ रेविन्यू के मैंबर थे। वो जब ज़िला के दौरे पर आए तो उन के लिए डाक बंगले पर दोपहर के खाने का इंतिज़ाम किया गया। ग़ुलाम हैदर साहब ने दस्तरख़्वान पर बैठने से पहले सब ओहदेदारों को बुलाया और दस्तरख़्वान पर बैठने की ख़ाहिश की। इनमें गिरदावर भी थे और तहसीलदार भी। ये अलग बात है कि कौन कौन उनके साथ बैठे या ना बैठे।
जब आंध्रा प्रदेश बना तो मद्रास के एक ओहदेदार बोर्ड मैंबर बन के आए थे। वो करीमनगर के दौरे पर आने वाले थे, मेरे एक ओहदेदार दोस्त ने मुझे पहले ही होशयार किया कि अब पहले जैसे फ़राख़ दिल मत बनो। बोर्ड मैंबर को इंतिज़ामात के लिए पहले ही पूछ लो। मैंने उन्हें ख़त लिख कर दोपहर के खाने के इंतिज़ाम के बारे में पूछा तो उन्होंने फ़ोन किया और कहा कि लंच पर सिर्फ़ ऑल इंडिया सर्विस के ओहदेदार होंगे। अब ऑल इंडिया सर्विस के सिर्फ़ दो ओहदेदार ज़िला में थे में कलेक्टर और एस पी। मैंने ज़िला मजिस्ट्रेट के बारे में पूछा तो उन्होंने उस की इजाज़त दे दी। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दो तहज़ीबों में कितना फ़र्क़ था। दरअसल हैदराबादी तहज़ीब पर मुसलमानों का गहरा असर रहा। यहाँ लिबास के मुआमले में भी यकसानियत रही, शेरवानी और पाएजामा पहनते तो सर पर टोपी भी पहनी जाती। और सब ओहदेदार शेरवानी पहनते। ये अलग बात है कि मारवाड़ियों और कायस्थों की टोपी मुसलमानों से कुछ अलग होती। कोट पहनते तो टाई लगाना नहीं भूलते। दूसरी जानिब आंध्रा में सूट पहनने की इजाज़त छोटे ओहदेदारों को नहीं थी। हैदराबाद में गिरदावर गज़ीटेड हुआ करता था और आंध्रा में नान गज़ीटीड। जब आंध्रा के लोग हैदराबाद आए और नान गज़ीटिड ओहदेदार को सूट पहने देखा तो उनका मज़ाक़ उड़ाने लगे।
एक दूसरा फ़र्क़ भी था। हैदराबाद में काम चाहे सरकारी हो या ख़ानगी , दोपहर से पहले शुरू होता ही नहीं था। ग्यारह बजे से पहले ओहदेदार तैयार नहीं होते थे। कारख़ानों में काम दोपहर के बाद शुरू होता था। दूसरी जानिब आंध्रा में अंग्रेज़ी तरीका-ए-कार था। ओहदेदारों के लिए ज़रूरी था कि वो सुबह 6:30 बजे घोड़े की सवारी पर अपने अपने इलाक़ों का दौरा करें। में पटनचेरू में जब ट्रेनिंग के दौरान सुबह दफ़्तर पहुंचा तो कोई मुलाज़िम मौजूद नहीं था।

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