Saturday , August 19 2017
Home / Literature / हैदराबाद जो कल था

हैदराबाद जो कल था

हैदराबाद की तरक़्क़ी में जिन शख़्सियतों का ख़ास रोल रहा है, उन में हुकमरानों के साथ - साथ हुक्काम के तौर पर मुख़्तलिफ़ ओहदों पर काम करने वालों की नुमायां ख़िदमात से भी इनकार नहीं किया जा सकता - चाहे वो सुकूते हैदराबाद से पहले हों या बाद म

हैदराबाद की तरक़्क़ी में जिन शख़्सियतों का ख़ास रोल रहा है, उन में हुकमरानों के साथ – साथ हुक्काम के तौर पर मुख़्तलिफ़ ओहदों पर काम करने वालों की नुमायां ख़िदमात से भी इनकार नहीं किया जा सकता – चाहे वो सुकूते हैदराबाद से पहले हों या बाद में। हुकूमत के अहम शोबों की कमान जिनके हाथों में थी, इन में पहले हैदराबाद सिवल सर्विस के लोग रहे और बाद में हिंदुस्तानी सिविल सर्विस (आई ए एस) के ओहदेदारों ने उन की जगह ली। बी. एन. रामन साहिब हैदराबाद की नई और पुरानी एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस के बीच पुल माने जाते हैं। वो हैदराबाद से चुने जाने वाले पहले आई ए एस ओहदेदारों में से एक हैं, जिन्हें साबिक़ा हैदराबाद रियासत के निज़ाम और उन के ओहदेदारों की दूर अंदेशी से क़ायम किया गया ढांचा विरासत में मिला था। और जिन्हों ने बाद की हुकूमतों के काम भी देखे। रामन साहिब चादर घाट हाई स्कूल के तालिब-ए-इल्म रहे। निज़ाम कॉलिज से आला तालीम हासिल की और 1948 में बनी पहली एच ए यस सर्विस और बाद में आई ए ऐस मुंतख़ब हुए। उनके वालिद निज़ाम की हुकूमत में मेडिकल सर्विस में बरसरे ख़िदमत रहे। रामन साहिब उर्दू, अंग्रेज़ी और तेलुगू के साथ-साथ फ़ारसी ज़बान भी ख़ूब जानते हैं, बल्कि बातचीत के दौरान हर मिसाल के लिए फ़ारसी की शायरी के नमूने उनकी ज़बान पर मौजूद हैं।

सुकूते हैदराबाद के बाद पहले हैदराबाद रियासत और बाद में आंध्रा प्रदेश में उन्होंने मुख़्तलिफ़ ओहदों पर काम किया और एन टी आर के दौर-ए-हकूमत में चीफ़ सेक्रेटरी रहे। रामन साहिब हैदराबाद की गंगा जमुनी तहज़ीब का अटूट हिस्सा रहे, बल्कि उस तहज़ीब की ख़ुशबू की महक बाद की नसलों तक पहुंचाने में भी उन्होंने कोताही नहीं की। क़ाबिल ज़िक्र बात है कि इन दिनों सियासी रोटियां सेंकने के लिए साबिक़ निज़ाम हुकूमत पर इल्ज़ामात का एक सिलसिला-सा चल पड़ा है। रामन साहिब ने जिन वाक़ियात पर रोशनी डाली, इससे कई तस्वीरें उभरती हैं, जिससे साफ़ होता है कि कल के हैदराबाद के हुकमरानों के पास सियासत का नाम अवाम की फ़लाह बहबूद था, उन्हों ने बला तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत ना सिर्फ़ अवाम का ख़्याल रखा, बल्कि कई ऐसे काम किए, जो पूरे एशिया में अपनी मिसाल आप थे। रामन साहिब से मुलाकात का ख़ुलासा पेश है –

1948 में मैं एच ए एस के लिए मुंतख़ब हुआ। दिल्ली में ट्रेनिंग हुई इसी दौरान आई ए एस लिखा और मुंतख़ब हुआ। पोस्टिंग गुलबर्गा में हुई। उस वक़्त गुलबर्गा हैदराबाद रियासत का हिस्सा था। गुलबर्गा तारीख़े दक्कन का अहम हिस्सा है, चालूक्या सलतनत से लेकर बहमनी, बीजापूर के आदिल शाही और निज़ाम तक इस इलाक़े की ख़ास एहमियत रही है। में यहां कुछ वाक़ियात का ज़िक्र करना चाहूंगा, जिससे पता चलता है कि हिंदू मुस्लमानों में किस तरह के बिरादराना रवाबित थे और आपस में उनके समाजी रिश्ते कितने मज़बूत थे। गुलबर्गा में ख़्वाजा बंदानवाज़ की दरगाह है। में असिस्टेंट कलेक्टर होने की वजह से उसकी कोर्ट आफ़ वार्डस में था। उस वक़्त सज्जादा साहिब को ज़िम्मेदारी सौंपने का मौक़ा भी मुझे मिला। एक दिन मेरे पास आए और कहने लगे कि हमारे असलाह पुलिस एक्शण के बाद पुलिस दफ़्तर में जमा हैं। वो वापिस तो होंगे नहीं, आप जितने चाहें ले लें।

मैंने देखा कि वो तारीख़ी चीज़ है और इस पर अवाम का हक़ है उसे दरगाह के हवाले करने का हुक्म देकर एक म्यूज़ीयम बनाने का मश्वरा दिया गया। और असलाह चबूतरे के पास म्यूज़ियम में महफ़ूज़ किए गए। दरगाह शरीफ़ की अराज़ी का मसला सामने आया तब एक अहम वाक़िया पेश आया. मार्कीट कमेटी वालों ने ज़मीन तो ली लेकिन मुआवज़ा देने से इनकार किया। फूल चंद गांधी तिजारत के मिनिस्टर थे। मैंने उनको बताया अराज़ी चली गई मगर मुआवज़ा नहीं पहुंचा। सेक्रेटरी कॉमर्स को नोट लिखा गया। 10-15 दिन के अंदर ना सिर्फ़ फ़ैसला आया बल्कि साढे़ तीन लाख का चैक भी आया।
हज़रत रुकनुद्दीन तोला की दरगाह की कहानी मशहूर है। उनका एक मिलने वाला ब्राह्मन था। एक दिन का वाक़िया बताया जाता है कि वो शख़्स रुकनुद्दीन तोला की महफ़िल में देर से आया। उन्हों ने उस की वजह पूछी तो बताया कि उसे इस के ख़ानदान वालों ने उसे इस लिए ख़ानदान से बाहर कर दिया है कि वो गोश्त खाने वालों के साथ बैठता है। ये बात सन कर हज़रत रुकन उद्दीन तोला ने उसी वक़्त अपने शागिर्दों को हुक्म जारी किया कि आज से कोई गोश्त नहीं खायगा। इस वाक़िया का असर हिंदू मुस्लमानों पर इतना है कि आज भी लोग रुकन उद्दीन तोला की दरगाह पर गोश्त खाकर नहीं जाते। मुझे याद है कि हैदराबाद के एक एक्साईज़ इंस्पेक्टर थे मुहम्मद बाक़िर साहिब। उनकी बेगम सदर मुअल्लिमा थीं और वो छुट्टियों मैन बच्चों को लेकर आती थी। एक दिन दोनों बच्चे सीढियों से गिर पड़े उन्हें चोट आई। ये देखकर बाक़िर साहिब ने पूछा कि बच्चों ने कहीं गोश्त तो नहीं खाया है। बेगम ने जवाब दिया कि गोश्त तो नहीं, लेकिन नाशते में अंडा खाया है। उन्होंने हुक्म दिया कि फ़ौरी पास के हौज़ में बच्चों को नहलाया जाये।

एक और वाक़िया याद आता है, अलंद में लाड़ले मशाएख़ की दरगाह है। मुझे हैदराबाद से एक वाएरलेस मैसेज आया कि चंद लोग दरगाह शरीफ़ में घुस कर बाजा बजा रहे हैं और नाच रहे हैं। उस की जांच करो और फ़ौरी ऐक्शण लो। दरगाह के पास पहुंचा और सज्जादा साहिब से दरयाफ़त किया कि उन्होंने उसकी शिकायत क्यों नहीं की? सज्जादा साहिब ने कहा कि भला वो क्यों शिकायत करने लगे, फिर उन्होंने बताया कि एक साल इलाक़े में क़हत पड़ा था। कुछ धनगर लोग अपना मज़हबी जलूस लेकर हिप्परगा से चिन्चिन्सू गावं जा रहे थे। रास्ते में जब वो अलिंद पहुंचे तो पानी की तलाश में दरगाह शरीफ़ के पास पहुंचे।उस वक़्त के सज्जादा साहिब ने कहा पानी ज़रूर लो, लेकिन तीन दिन आराम करो और बाद में चिन्चिन्सू जाओ। जब से वो सिलसिला ऐसे ही जारी है। धनगर लोग अपनी जात्रा के दौरान इस दरगाह पर रुकते हैं। में जब तक रहा वहां आपसी मेल जोल को नुक़्सान पहुंचने नहीं दिया, लेकिन अफ़सोस कि बाद में कुछ वाक़ियात हुए और लोगों के घर जला दिए गए। इन हालात में फ़ायर इंजन हैदराबाद से भेजा गया। सरकारें बदलें लेकिन आपस का मेल जोल और गंगा जमुनी तहज़ीब पूरे हैदराबाद में रही। हैदराबाद में कोई बड़ी जंग नहीं हुई। निज़ाम अली ख़ान के दौर में एक छोटी सी जंग सदाशिव पेट में ज़रूर हुई, लेकिन बहुत मामूली- एक दो वाक़ियात को छोड़कर रियासत में हमेशा अमन रहा।

आजकल रमज़ान में इफ़तार का सिलसिला भी चल निकला है। मुझे याद है वालिद साहिब ईदगाह ले जाते लोगों से मुलाक़ात करते। दीवाली दशहरा में वो हमारे घर आते। दूसरी चीज़ ये है कि हैदराबाद स्टेट अंग्रेज़ी असर ऐडमिनिस्ट्रेशन में नहीं रहा, लेकिन मुल्क के दूसरे हिस्सों में अंग्रेज़ों ने दोनों मज़ाहिब के लोगों को वरग़ला कर आपस में तशद्दुद फैलाने की कोशिश की। निज़ामों के दौर में ऐडमिनिस्ट्रेशन की ज़िम्मेदारी जिन ओहदेदारों को दी जाती, उनका बर्ताव अवाम के साथ अच्छा होता। जिसकी वजह से ऐसा कोई हादिसा नहीं हुआ, जिससे भाई चारे को ख़तरा हो या बदअमनी फैले। इस निज़ाम को यक़ीनन जदीद निज़ाम कहा जा सकता है।

निज़ाम रियासत में रैतवारी ज़मीन की तक़सीम हुई थी। जो काम मलिक अंबर ने अहमद नगर में शुरू किया था, वही तरीक़ा हैदराबाद में शुरू हुआ। जागीरें अता की गईं। कई संस्थान क़ायम किए गए- मालगुज़ारी वसूल करना उनकी ज़िम्मेदारी थी। देहातों में बंद-ओ-बस्त, दीवानी की तरह था। क़ौलदारी क़वानीन थे- शिकम तालाब को किसी काश्तकार को नहीं दिया जा सकता था। इस वजह से ख़दशा ये था कि शिकम तालाब को तक़सीम किया जाए तो वो तालाब के बांध को तोड़ देगा। उनके दिए गए अहकाम की वजह से तालाबों की हिफ़ाज़त की जा सकी। तालाबों की मरम्मत का काम शुरू हुआ। कई जगह पर तालाब मुनहदिम हो गए थे। टैंक रेस्टोरेशन डिपार्टमेंट क़ायम हुआ। इस के तहत दो सब डिपार्टमेंट टैंक रेस्टोरेशन स्कीम और टैंक रेस्टोरेशन सर्वे क़ायम किए गए। सैकड़ों तालाब फिर से बनाए गए। काकतिया के ज़माने के कई बड़े तालाबों की मरम्मत की गई। आब-ए-पाशी का महिकमा मज़बूत किया गया। मशहूर चीफ़ इन्जीनर अली नवाज़ जंग ने बड़ी नदियों पर बांध बनाए। पहले छोटी नदियों पर तालाब बनाने और इस के बाद गोदावरी और कृष्णा पर तीन जगह तजुर्बे किए गए। निज़ाम सागर के इलावा महबूबनगर और नलगोंडा ज़िले में बड़े तालाब बने।

इस के बाद तुंगभद्रा पर मद्रास स्टेट के साथ 75 साल से चला आ रहा मसला था, जिसे सर अकबर हैदरी ने हल किया। कई बार क़हत ने हैदराबाद को बहुत सताया। राइचूर गुलबर्गा और महबूबनगर के लोग गांव छोड़कर चले आते थे। निज़ाम ने काश्तकारों के लिए अच्छा इंतिज़ाम किया था। हर साल देखा जाता कि अगर कोई किसान महसूल नहीं दे पाता तो इस में कमी या माफ़ी की जाती। सर अकबर हैदरी के ज़माने में चार फाइनांस रिज़र्व बनिए गए। प्लानिंग में 2 करोड़ रुपये का रिज़र्व बड़ी बात थी। हर गांव, हर तहसील में स्कीम अमल में लाई गई। सड़कें, नहर और बावलियां बनाई गईं। वेल सनकिंग डिपार्टमेंट बनाया गया। हर गांव में लोगों के खेतों में सरकारी बावलियां खोदी गईं। एक एक अकऱ् की बावलियां बड़ी पुख़्ता, निज़ामों के दौर में मशहूर थीं।
बहुत ही दूर अंदेशी से काम लिया गया। दीवानी के कई काबिल ओहदेदार बाहर से चुन कर लाए गए, जिन में अंग्रेज़ ओहदेदार भी थे। ऐडमिनिस्ट्रेशन को माडर्न करने की कोशिश की गई। एच सी एस शुरू किया गया। क़बाइली इलाक़ों में कई काम किए गए।

हाली सिक्को को ब्रिटिश इंडिया के साथ तनासुब क़ायम करने के लिए पुलिस ऐक्शण से पहले लायक़ अली सरकार ने एजेंसी बनाई। मुईन नवाज़ जंग एजेंट जनरल और ज़हीर अहमद डिप्टी एजेंट जनरल थे। ये रिज़र्व लंदन में था। जब पुलिस ऐक्शण हुआ तो साढे़ तीन करोड़ रुपये वैसे ही जमा रह गए। वो बैंकों में जमा हैं, अब ना जाने कितने करोड़ हो गए होंगे, हुकूमत हिंद भी इसे हासिल नहीं कर सकी। पोस्ट वार कंस्ट्रक्शन के लिए भी एक रिज़र्व बनाया गया था। जंग की वजह से कई कामों की मंज़ूरीयां नहीं मिलती थीं, जंग को ख़त्म होने तक काम न रु के, इस लिए ये रिज़र्व बनाया गया था। इस के लिए लोगों को ट्रेनिंग भी दी गई। इस ट्रेनिंग के लिए करामत जंग अमरीका गए थे।

निज़ाम शूगर फ़ैक्ट्री एशिया में सब से बड़ी कंपनी थी। एशिया मेंही नहीं बल्कि दुनिया भर में ऐसी कोई मिसाल नहीं थी उस वक़्त कि 15000 एकर की शूगर ज़मीन फ़ैक्ट्री के साथ हो। छोटी सी रेल लाईन भी बिछाई गई थी, बोधन से नवीपीट तक। फ़ैक्ट्री बड़ी थी। रोज़ 8000 टन गिनने की ज़रूरत थी। निज़ाम सागर से 2 लाख एकड़ खेतों को सैराब किया जाता। यक़ीनन निज़ाम सरकार काफ़ी माडर्न थी, लेकिन दो तीन चीज़ों में कमी थी। अज़ला में कोई कॉलिज नहीं था। सूबा हेडक्वार्टर औरंगाबाद और गुलबर्गा में कॉलिज थे। हैदराबाद में 1917 में मैडीकल स्कूल क़ायम किया गया- मेरे वालिद थर्ड बीच तालिब-ए-इल्म थे। इन दिनों कोलकता और मद्रास के इमतिहान में बैठना पड़ता था। निज़ाम हुकूमत ने हर तालुके में हैल्थ सैंटर क़ायम किए। दूसरी जंग के बाद फ़ौज के कई डाक्टरों को तालुक़ा ज़िला और सत्ह पर भेजा गया। पहली जंग-ए-अज़ीम के बाद हैदराबाद में क़हत पड़ा। कई लोग मरे, बल्कि इन्फ़्लोइंज़ा भी फैला- 1916 और 1922 में क़हत पड़ा। क़हत से निपटने के लिए बाहर से ओहदेदारों को बुलवाया गया। उन की रिपोर्ट पर और कई तबदीलीयां लाई गईं। गांव गांव जाकर काम किया गया।

हैदराबाद में जहां बहुत सारी खूबियां थीं, वहीं कुछ कमज़ोरियां भी रहें। हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों ने इस्लाहात शुरू किए थे। असीमबलयां और पार्लियामेंट क़ायम की गये। वो तरक़्क़ी यहां नहीं इख़तियार की गये। जब निज़ाम हुकूमत को एहसास हुआ तो बहुत देर हो चुकी थी। हालाँकि बिहार से अब्दुल रहीम साहिब को बुलाया गया था। वो दस्तूर के माहिर थे। उन्हों ने 1947 में असेंबली बैलेट बनाया था। पूरी आबादी की वोटर्स लिस्ट तैयार हुई 1948 में। इतना अच्छा काम कियागया था कि1951 में जब जनरल इलेक्शन हुए तो उसी लिस्ट पर काम किया गया। इससे पहले नामज़द असेंबली बनी, लेकिन वोटिंग का मौक़ा नहीं था। बहादुर यार जंग का मानना था कि अगर बालिग़ राय दही हो तो मुसलमानों को मुक़ाम नहीं मिलेगा,इस ख़्याल को क़ासिम रिज़वी ने संगीन शक्ल दे दी। हकूमत-ए-हिन्द ने 60-40 (हिंदू- मुसलमान) फ़ीसद की तजवीज़ रखी थी। अगर उस वक़्त मान लेते तो हैदराबाद में पुलिस ऐक्शण नहीं होता। रियासत भी तक़सीम नहीं होती। मुसलमानों की सयासी हैसियत काफ़ी मज़बूत होती।

सितंबर 12 और 13 की रात 12 बजे हिंदूस्तानी काबीना की मीटिंग हुई थी, सरदार पटेल ने कहा कि फ़ौजें तै यार हैं। पण्डित नहरू ने कहा कि नहीं, दंगा फ़साद हो जाएगा। हालाँकि मौलाना आज़ाद भी फ़ौजी कार्रवाई के हामी थे, तब भी नहरू ऐसा नहीं करना चाहते थे, लेकिन जब बात तै ही हुई तो निज़ाम से बात की। निज़ाम ने कहा कि मेरे पास ऐसे कोई इख़्तयारात नहीं हैं, लेकिन कोतवाल को बुलाकर हुक्म दूंगा कि ऐसे कोई आसार हूँ तो इस पर क़ाबू पाएं। इस के लिए कोतवाल देन यार जंग को बुलाकर हुक्म दिया गया। सुबह के 4 बजे पुलिस शहर में फैला दी गई। सुबह जब लोग उठे तो देखा कि हर चौराहे पर पुलिस थी और हैदराबाद में किसी तरह का कोई फ़साद नहीं हुआ। (इस बात से ज़ाहिर है कि पुलिस ऐक्शण के दौरान निज़ाम हैदराबाद में तो अमन क़ायम रखने में कामयाब रहे, लेकिन सरदार पटेल के हुक्म से जहां-जहां से फ़ौज गुज़री वहां मुसलमानों के क़तल और मज़ालिम को रोक नहीं पाई।)
फ़ौजें सूर्या पेट तक और शोलापुर से पटनचीरो तक पहुंच कर शहर में दाख़िल हुई। कर्फ़यू लगाया गया। कई ओहदेदार यहां से चले गए , कई जाएदादें ख़ाली थी, मध्य प्रदेश मद्रास और बॉम्बे से लोग बुलाए गए। आबपाशी पर जो काम निज़ाम के दौर में हुआ वो बाद में नहीं हो सका। कई तज्वीज़ें। बरसों तक फाइलों में पड़ी रहें। निज़ाम के दौर में सरकारी और वक़्फ़ ़जमीनों के रजिस्टर हुआ करते और हर साल उस की जांच होती, बाद में हुकूमत आंध्रा प्रदेश इस का सिलसिला जारी नहीं रख सकी। इसका नुक़्सान वक़्फ़ इमलाक को बहुत हुआ।

हैदराबाद फ़सादाद में मुक़ामी लोग शामिल नहीं रहे, ज़्यादा तर बाहर के लोग इस में शामिल थे। इसमें पुलिस की लापरवाही भी शामिल रही, जबकि निज़ाम के दौर-ए-हकूमत में जब कोई घर छोड़कर जाता तो ताले नहीं लगाते थे। पास के पुलिस स्टेशन में इत्तिला दी जाती। 1919 में जब चोरियां और डकैतियां बढ़ने लगीं तो निज़ाम ने कोतवाल को ज़िम्मा अरी दी- कोतवाल अकबर जंग और उन के एक असिस्टेंट थे, लाल ख़ान। वो इतने मशहूर हुए कि देहातों में एक लक्कड़ी की मूर्त बनी होती थी, जिस की सूरत क़ंदील की होती थी, इसे लाल ख़ां कहते थे। उन्हों ने कई डाकूओं को गिरफ़्तार किया और इन में से कई की मौत तफ़तीश के दौरान हुई। उन के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, लेकिन इस के बाद चोरियां ज़रूर कम हुईं। बाहर से आने वालों पर भी कड़ी नज़र रखी जाती। एक इंटेलिजेंस इंस्पेक्टर फ़ज़ल रसूल ख़ान मुक़र्रर थे, वज़ारत रसूल ख़ानसाहब के वालिद थे, वो काफ़ी मशहूर थे। बाद में एन टी रामाराव ने भी अमन क़ायम रखने में ओहदेदारों को ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाया और ताकीद भी की कि किसी भी तरह के फ़साद के लिए वही ज़िम्मेदार होंगे। ये सही भी है, ओहदेदार अगर लापरवाही ना करें तो फसादात होंगे ही नहीं।

TOPPOPULARRECENT