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हॉकी खिलाड़ी “शहीद बदरूद्दीन खाँ” जिन्हें इतिहास ने भुला दिया

शम्स तबरेज़, ब्यूरो रिपोर्ट।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश के ज़िला गाज़ीपुर के रहने वाले मशहूर हॉकी प्लेयर बदरूद्दीन खाँ के पोत शहाबुद्दीन खाँ ने सियासत से अपने दादा की के अंतिम क्षणों को प्रकाशित करने का अनुरोध किया है जिनकी भावनओं का सम्मान करते हुए, सियासत मरहूम को श्रृद्धांजलि प्रस्तुत करता है। पेश है हॉकी खिलाड़ी शहीद बदरूद्दीन खाँ की कहानी उनके पोते शहाबुद्दीन की ज़ुबानी……..
इंसान तो इस दुनियाँ से चला जाता है लेकिन उसकी यादें और कारनामें हमेशा लोगों के दिलो ज़ेहन मे ज़िन्दा रहती हैं। ऐसे तो मौत का वक्त कोई भी मुतय्यन नहीं कर सकता फिर भी मौत अपने वक्त पर आती है ना एक मिनट पहले ना एक पल बाद ! उन्हीं में से मौत की एक सच्ची घटना है ज़िला ग़ाज़ीपुर में खित्ता कमसारो बार दिलदार नगर के जोनल हॉकी प्लेयर शहीद बदरुद्दीन खान कि! उन्हें क्या पता था कि जिस हॉकी स्टीक को अपने कदमों तले आगे बढ़ाएगें वही क़दम एक दिन मौत का सबब बन जाएगीघ् लेकिन यह सच है कि कभी.कभी इंसान की ज़िन्दगी में हद से ज्यादा शौकए लगावए चाहतए और मुहब्बत जान तक ले लेती है। शायद यही हुआ मौज़ा गोड़सरा के होनहार हॉकी प्लेयर बदरुद्दीन ख़ान के साथ।
घटना ! 20 जनवरी सन् 1955 ई० की हॉकी खेल का वह ऐतिहासिक असहनीय क्षण लोगों के दिलों ज़ेहन मे आज भी ज़िन्दा है। जो कभी भूलने का नाम नहीं लेती। कमसारो बार के दिलदारनगर स्थित मुस्लिम राजपूत इन्टर कॉलेज; वर्तमान एस०के०बी०एम० इण्टर कॉलेजद्ध का वह ग्राउंड जिसमें क्षेत्रीय लोगों का जन सैलाब खित्ते में पहली मर्तबा हो रहे जोनल हॉकी टूर्नामेन्ट का फाइनल मैच देखने के लिए उमड़ पड़ी थी। एक तरफ गाँधी मेमोरियल इण्टर कॉलेज माजूदा एस०के०बी०एम० में सन् 1955 में एकिकृत कर दिया गया है। दिलदारनगर की हॉकी टीम तो दूसरी तरफ ज़मानियाँ हिन्दू इण्टर कॉलेज की हॉकी टीम फाइनल मुकाबले के लिए कमर कस चुकी थी। मुकाबला काफी रोचक था। एक तरफ लोगों के दिलो ज़ेहन में गाँधी मेमोरियल इण्टर कॉलेज के होनहार फारवर्ड हॉकी खिलाडी बदरुद्दीन का पिछला कारनामा घूम रहा था तो दूसरी तरफ विपक्षी टीम के खिलाड़ी भी अपने जीत का दावा ठोंक रहे थे। खेल अब शुरू होने ही वाला था तब तक वहां पहले से मौजूद कला मास्टर गुप्ता जी दिलदारनगरी ने दोनों टीमों की फोटो सूट की गई जो अभी तक अपर्याप्त है लेकिन जैसे ही यह मुकाबला दिन के ढाई बजे से मुस्लिम राजपूत इण्टर कॉलेजए दिलदारनगर के ग्राउंड पर शुरू हुआ और फर्स्ट मीटिंग में दोनों टीमों के बीच कोई गोल नहीं हुई थी लेकिन सेकण्ड मीटिंग की शुरुआत होते ही जैसे ही बदरुद्दीन की हॉकी स्टीक से गेंद टकराती है और वो गेंद को घसीटते हुए जैसे मानो हवा के माफिक विरोधी टीम के गोलपोस्ट में सीधे गेंद ले जाकर गोल कर देते हैं परंतु गोल कर जब वो वापस अपने गोल पोस्ट की तरफ लौट रहे होते हैं तो अचानक विरोधी टीम के बैक पर खड़ा खिलाडी धोखे से उनके सिर पर पीछे से हॉकी स्टीक द्वारा वार कर देता है जो खेल जगत को शर्मसार करता है। जिससे बदरुद्दीन बेहोश होते ही मैदान में गिर पड़ते है। मैदान में अफरा.तफरी का माहौल पैदा हो जाता है तब तक विरोधी टीम के खिलाडी मौके का फायदा उठा वहाँ से खिसक पडते हैं।उसी बीच अचानक हॉकी खिलाड़ी साथी सेराजुद्दीन गोलकीपर की नज़र बेहोश पड़े हूए बदरुद्दीन पर पड़ती है और वो जोर से चिल्ला उठते हैं उसके बाद फौरन उनको वहाँ से उठा कर दिलदारनगर के डॉ० श्याम नारायण चतुर्वेदी के पास ले जाया जाता है। उन्होंने एक इन्जेक्शन दीए जिससे इन्जेक्शन पड़ते ही बदरुद्दीन उठ कर बैठ जाते हैं और एक नज़र सबको देखने के बाद वापस बेहोश हो जाते हैं। फिर उन्हें कॉलेज टीम द्वारा ट्रेन से बी०एच०यू० बनारस किंग एडवर्ड हॉस्पिटल मौजूद शिव प्रसाद हॉस्पिटलद कबीर चौरा में ले जाया जाता है। जहां पर उनके बेहोशी की हालात में तीन दिन बाद 23 जनवरी 1955 को दोपहर 1 बजकर 20 मिनट पर अपना हूनर समेटे इस दुनिया.ए.फ़ानी से जावेदानी को कूच कर जाते हैं। कालु इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेउन उन्हें जामे शहादत जो पीनी थी तो दवा क्या काम करती! उसके बाद उनके जस्दे ख़ाकी जिस्म को मुगलसराय.जमानिया.मार्ग द्वारा सफ़ेद कार में फूल.मालाओं से सजाकर दिलदारनगर गाँव स्थित जामा मस्जिद के पास आ खड़ी हुई। वहां पहले से मौजूद बुजुर्गो और नौजवानों की एक बहुत बड़ी हुजूम उनकी एक झलक पाने के लिये बेसब्री से इंतजार कर रहे थे उन सभी ने उनके शव का आखिरी दीदार किया कार के अंदर कालेज के मैनेजर मु० शम्सुद्दीन खाँ वगैरह अपने गोंद मे लिटाया हुए बनारस से ला रहे थे उसके बाद उनके शव को वहां से मुस्लिम राजपूत इण्टर कॉलेज ग्राउंड पर लाई गई। जहाँ पर खेल हुई थी। उसके बाद कार द्वारा उस कॉलेज ग्राउंड का एक चक्कर लगा कर वहीं रुक गईए जिसके चश्मदीद गवाह मास्टर हाजी करीम रज़ा ख़ाँ साहब दिलदारनगरी हैं। उसके बाद मुस्लिम राजपूत के मैनेजर जनाब हाजी शमसुद्दीन खाँ और बदरुद्दीन साहब के परिवार से ताल्लुक रखने वाले महमूद खाँ की सूझ.बुझ के कारणए वहां पहले से मौजूद उनकी वालदह से इजाज़त लेकर उनके शव को उसी कॉलेज ग्राउंड में तकरीबन 8 बजे रात को नमाज़े जनाज़ा हाजी बसीर मियां गोड़सरावी द्वारा पढ़ाई गई मीलिट्री गार्ड आॅफ आनर के साथ उसी कॉलेज ग्राउंड की रणभूमि मे हज़ारों की भीड़ की मौजूदगी में हाथों.हाथ दफ़न कर दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश जिला ग़ाज़ीपुर में कमसार.व.बार खित्ता के मौज़ा गोडसरा गाँव में हाता नामक स्थान पर एक जमींदार परिवार में 2 जुलाई 1933 ई० को जन्मे बदरुद्दीन खान के वालिद का नाम मो० मोहिउद्दीन खाँ ऊर्फ मोहा खान तहसीलदार तथा वालदह का नाम रहमत बीबी था। वे अपने खित्त.ए. कमसार.व.बार की वक़ार को बुलंद करने के लिये शहादत की जाम पी ली थी लेकिन उनकी यादें और बेमिसाल खेल के कारनामें आज भी लोगों के ज़ुबान व दिलो ज़ेहन मे ज़िन्दा हैं। उनकी मौत के बाद उनके कब्र पर मज़ार शरीफ का निर्माण कार्य मुस्लिम राजपूत कॉलेज के तत्कालीन मैनेजर मु० शमसुद्दीन खाँ और सदर अंजुमन डिप्टी मु० सईद खाँ द्वारा कराई गई। तथा उनके मज़ार की देख रेख और रोज़ाना तिलावते.ए.क़ुरान.पाक के लिये एक हाफिज़ चपरासी मुन्तख़ब कर रख दिया गया था इसके अलावा कॉलेज की सदारद में बदरूद्दीन मेमोरियल लाइब्रेरी के लिए हॉल की बुनियाद 21 दिसम्बर 1957 को किया गया। इस मुबारक लम्हे पर खिलाड़ी बदरूद्दीन के फैन रह चुके मरहूम मास्टर मुख़्तार मिर्ज़ापुरी साहब के कहने पर कॉलेज प्रबंधक मु० शमसुद्दीन खाँ द्वारा एक बेहतरीन रात्रि ड्रामा हुआ था। जिसमें कॉलेज के समस्त बच्चों ने बदरूद्दीन खाँ के जीवन एवं असहनीय खेल घटनाक्रम पर अपना ड्रामा प्रस्तुत किया थाए जिसके चश्मदीद गवाह मास्टर शहाबुद्दीन खाँ साहब रकसहांवी हैं तथा इसी ड्रामे में मास्टर मुख़्तार साहब ने बदरूद्दीन के खेल जीवन पर विदाई.गीत पेश की थी। जिसको सुनकर सभी की आँखे शराबोर हो जाती हैं जिसकी एक लाइन ही मिल सका पेश.ए.खिदमत है.
जो हुआ सो हुआए चलो अब झगड़ा बीत गया
उनके साथी खिलाड़ीयो में से जो आज भी ज़िन्दा हैं। गोड़सरा के मुस्तफा खाँए मज्जु खाँए तुफैल खाँ तथा रकसहा के सार्जेंट मुस्ताक खाँ इनसे हमारी गहन बातचीत के दरम्यान पता ये चला की वो बहुत ही नेकए हँसमुखए मिलनसारए और दरियादिल इन्सान थे। उन्हें इलाक़े के लोग प्यार से ऊर्फियत (उपनाम) में ममवा कहकर अक्सर बुलाया करते थे। उन्हें अपनी आखिरी ज़िन्दगी का तो एहसास हो गया था लेकिन कभी वो खेल में हारे नहीं थे। उनके दौड़ का वो आलम था की गेंद के पीछे वो नहीं बल्कि उनके पीछे गेंद दौड़ा करती थी वे चार बार 100 मी० रेस में अपनी डिस्ट्रिक्ट से जोन चैंपियन भी रह चुके थे। हॉकी के अलावा उन्हें ऊँची.लम्बी.कूद तथा फुटबॉल में भी महारत हासिल थी। यदि वे आज इस दुनिया मे ज़िन्दा होते तो राष्ट्रीय हॉकी टीम के नेतृत्व मे अंतरास्ट्रीय टीम के महान प्लेयर्स में जाने जाते! एवं जब कभी भी वे बच्चों को खेलते देखते तो काफी प्रसन्न हुआ करते और बच्चों को खेल की बारीकियाँ सिखाते और समझाते इसलिए उनके खिलाड़ी साथियो का मानना है कि उनके नाम से क्षेत्र में एक बदरूद्दीन मेमोरियल स्टेडियम होनी चाहिये तथा ऐसे महान हॉकी प्लेयर शहीद बदरूद्दीन ख़ान का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में सम्मिलित होनी चाहिये क्योंकि इस दुनिया मे शायद ही ऐसा कोई खिलाड़ी होगा जिसे खेल के दौरान में हॉकी खेलते समय शहीद कर दिया गया हो और उसी मैदान में अपनी आखिरी आरामगाह (कब्र) के लिए दो गज़ ज़मीन भी हांसिल कर लिया हो! इसके अलावा इनके नाम पर हॉकी प्लेयर शहीद बदरूद्दीन सम्मान से होनहार खिलाड़ीयों को सम्मानित भी किया जाना चाहिए।
इसी कड़ी में मेरी दादी यानि मरहूम बदरूद्दीन खाँ की भाभी साहिबा जैबुन निशा बीबी बताती हैं कि वो बहुत ही नेक और परहेज़गार इन्सान थे। वो अक्सर घर के कामों में हांथ बटाते थे। वह पोशाक में सफेद कुर्ता.पैजामा पहना करते थे। वे हमेशा खाना खाने से पहले अपने पालतू बिल्ली को खाना खिलाया करते थे। उन्हें खाने में दूध.दही काफ़ी पसंद था। उन्हें घर में खेल के लिए कोई रोक.टोक कभी नहीं रहा वे अक्सर अपना सारा वक्त खेल मे ही बिताया दिया करतेए उनकी मौत के बाद घर में उनका भरा पड़ा तमाम खेल का सामानए अवार्ड वगैरह उनके कॉलेज को सौंप दी गई थी। उनके निशानियों में से सिर्फ उनका एक हॉकी स्टीक और पैड घर पर रह गया था जो पुश्तैनी मकान के टुटने पर वह भी गुम हो गया। सबसे रोचक बात तो यह है कि उनकी शादी उनके बड़े भाई पहलवान कमरुद्दीन खाँ ने मेरी बड़ी बहन हसबुन निशा बीबी से करने की बात कही थी लेकिन खुदा को कुछ और ही मंजूर था!
इसके अलावा बदरूद्दीन साहब की यादगार को बरक़रार रखने के लिए उनके गाँव व घर वालों की तरफ से हर साल 23 जनवरी को उनकी बरसी के मुबारक मौक़े पर उनके मज़ार पर क़ुरआन.खानीए चादरपोशी बड़े ही धूमधाम के साथ मनाई जाती है। साथ ही उनकी यादगार को बरक़रार रखने के लिये उनके नाम पर कमसार.व.बार क्षेत्र में हमेशा अनेकानेक आयोजन हुआ करती हैं जिसमें एक यादगार प्रोग्राम सन् 1988 ई० का स्पोर्ट वीक था जिसका आयोजन एस०के०बी०एम० कॉलेज ग्राउंड दिलदारनगर पर मरहूम कुँअर हाजी यूनुस ख़ान उसियावी की क़यादत में करायी गयी थी । जिसमें उनके नाम से उनके गाँव गोड़सरा की बदरूद्दीन मेमोरियल क्लब (बीएमसी) क्रिकेट और (बीएमसी) फुटबॉल दोनों खेल फाइनल में प्रवेश किया था। इस महामुक़ाबले में चीफ़ गेस्ट अंतराष्ट्रीय हॉकी प्लेयर कैप्टन मरहूम मोहम्मद शाहीद और अंतराष्ट्रीय विकेटकीपर सय्यद किरमानी थे इस फाइनल मुक़ाबले में गोड़सरा (बीएमसी) टीम को जीत तथा (बीएमसी) को हार हांसिल हुई थीए इसी फाइनल मुकाबले में गोड़सरा के (बीएमसी) टीम का नेतृत्व कर रहे भारतीय अंडर 19 प्लेयर बदरूद्दीन इकबाल अहमदश को विकेटकीपर सैयद किरमानी ने विजय ट्रॉफी को खुद अपने हाथों आकर लेने का आग्रह किया था।
विगत दिनों पहले 30 दिसम्बर 2016 को दीनदार म्यूज़ियम दिलदारनगर के शिलान्यास समारोह के मौके पर मैं शहाबुद्दीन ख़ान और एस०के०बी०एम० कॉलेज के प्रबंधक गुलाम मज़हर ख़ान साहब के द्वारा पूर्व पर्यटन मंत्री और क्षेत्रीय विधायक श्री ओमप्रकाश सिंह को ष्बदरूद्दीन मेमोरियल क्लब के जानिब से उनके कॉलेज ग्राउंड को शहीद बदरूद्दीन मेमोरियल स्टेडियम तथा उनके मज़ार शरीफ को पर्यटक स्थल के रूप मे सौन्दर्यीकरण कराने की माँग के लिए पत्रक दी गई। जिसके लिए उन्होंने आश्वासन भी दिया तथा ग़ाज़ीपुर में खेल को बढ़ावा देने के लिए जल्द ही स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के रूप मे (साई) सेन्टर खोलने की भी बात कही। इसके अलावा हमारी कोशिशें आगे भी जारी हैं और हमेशा.हमेशा इन्शाअल्लाह जारी रहेगा और बहुत जल्द ही ष्संस्था अल दीनदार शम्सी अकादमीष् दिलदानगर के मैनेजर कुँअर मु० नसीम रज़ा ख़ाँ द्वारा इनके संक्षिप्त इतिहास व आत्मकथा के रूप में एक किताब भी प्रकाशित की जाएगी जिस पर कार्य किया जा रहा है।
यादों की लकीरों पर उपेक्षाओं का गर्द कहीं हावी न हो जाये उस शहीद के नक़्शेक़दम पर हर तरफ़ से लोगों के दिलों में गहरी पैठ बनाई जाये ताकि उन सभी को पता चले की इस मज़ार में अपना ताबनाक़ मुस्तक़बिल समेटे कौन है, जो अल्लाह और उसके रसूल के बताये हुए हदीस.ए.पाक में शहीद के मरतबे को ऊँचा बताया गया है और कहा गया है कि शहीद कभी मरते नही आँखो के सामने से पर्दा कर दिये जाते हैं कहीं न कहीं वो ज़िन्दा हैं! शुक्रिया।
(नोट : लेखक मुहम्मद शहाबुद्दीन ऊर्फ शहाब ख़ान वल्द कुतुबुद्दीन ख़ान वल्द कमरूद्दीन ख़ान मौज़ा गोड़सरा ज़िला ग़ाज़ीपुर के हैं और कमरूद्दीन ख़ान के बड़े भाई थे शहीद बदरूद्दीन ख़ान।)

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