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क़ानून सर्वोच्च, ज़म्हूरियत का हर हिस्से में अपने दायरे में रहकर करे काम : राष्ट्रपति

भोपाल : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जजों को ‘अदालती सरगर्मी ’ के जोखिमों के प्रति सचेत करते हुए आज कहा कि अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए हर वक़्त सामंजस्य कायम करना चाहिए और ऐसी हालत सामने आने पर आत्मसंयम का परिचय देना चाहिए। क़ानून को सर्वोच्च बताते हुए प्रणब ने कहा कि हमारे ज़म्हूरियत के हर हिस्से को अपने दायरे में रहकर काम करना चाहिए और जो काम दूसरों के लिए मुक़र्रर है, उसे अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘अदालती सरगर्मी को अधिकारों के बंटवारे को कमतर करने की ओर अग्रसर नहीं होना चाहिए क्योंकि अधिकारों का बंटवारा क़ानूनी मंसूबा है। क़ानून के तहत हुकूमत के तीन अंगों के बीच हुकूमत का संतुलन क़ानून में है।’ राष्ट्रपति ने कहा कि अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए हर वक़्त  सामंजस्य बनाये रखना चाहिए। विधायिका और कार्यपालिका की ओर से अधिकारों का उपयोग न्यायिक समीक्षा का मौजू है।

राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में एक तक़रीब को खिताब करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि अधिकारों का इस्तेमाल करते वक़्त अदालत की तरफ से आत्म संयम और स्व-अनुशासन एकमात्र संभव नियंत्रण है। राष्ट्रपति ने हालांकि कहा कि अदालत की आज़ादी और अखंडता का न सिर्फ जजों के लिए बल्कि आम लोगों के लिए भी अहम है। उन्होंने कहा, ‘संविधान में हमारे आज़ाद अदालत की बात कही गई है ख़ुसूसी तौर पर शीर्ष अदालत के बारे में।’ उन्होंने कहा कि इसमें विधायिका और कार्यपालिका के कामों  की समीक्षा की बात भी है।

प्रणब मुखर्जी ने कहा, ‘न्यायिक समीक्षा बुनियादी ढांचे का हिस्सा है और कानून की अमल की बुनियाद पर भी इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता। न्यापालिका न्यायिक समीक्षा के प्रभावकारी होने को सुनिश्चित करता है।’ उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश में इन्साफ के आयामों को व्यापक बनाने में न्यायपालिका की किरदार की तारीफ़ की ।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे जैसे विकासशील देशों में इन्साफ के आयामों को व्यापक बनाने में हमारी न्यायपालिका की बड़ी किरदार है। बुनियादी अधिकारों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जरिये न्यायिक नवोन्मेष और सरगर्मी ने कानून के आम सिद्धांतों के अहमियत का विस्तार किया है। उन्होंने कहा कि यह तब मुमकिन हुआ है जब अदालत हर सख्श के हितों का हर मुमकिन ध्यान रखती है।

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