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क़ुरआन

क्या ख़्याल कर रखा है उन लोगों ने जो गुना करते हैं बुराईयों का कि हम बनादेंगे उन्हें उन लोगों की तरह जो ईमान लाए और नेक अमल करते रहे कि एक जैसा हो जाये इन (दोनों) का जीना और मरना, बड़ा ग़लत फ़ैसला है जो वो करते हैं। (सूरत अल जासिया।१२)

अरब के कुफ़्फ़ार क़ियामत पर ईमान नहीं रखते थे, हर तरह की बाज़पुर्स से बेग़म थे। उनकी ज़िंदगी का सबसे आला मक़सद ये था कि वो ख़ूब ऐश कारें और समाज में एहतेराम की निगाह से देखे जाएं। जब इस्लाम ने उन्हें क़ियामत से डराया और उन्हें इन बदकारियों से बाज़ आने की हिदायत की, जिनका वो गुना किया करते थे तो उनमें से जो बड़े बागी थे, कहने लगे कि पहले तो क़ियामत का बरपा होना ही ख़िलाफ़ अक़ल है, अगर ऐसा हो भी गया तो वही ख़ुदा वहां भी होगा जो यहां है। जब उसने हमें यहां नेमतों और आसाइशों दिया है, वो हमें इस रोज़ भी महरूम नहीं रखेगा। वो बड़ी शोख़ी से कहा करते: अगर (बिलफ़र्ज़) में अपने रब की तरफ़ लौट कर गया तो मुझे वहां बड़ी उम्दा चीज़ें मिलेंगी। उनकी इस ग़लतफ़हमी को दूर किया जा रहा है कि क्या बदकार और फ़िजार इस ग़लतफ़हमी में मुबतिला हैं कि उनकी ज़िंदगी और मौत उन लोगों जैसी होगी, जो अल्लाह और रसूल (सल्लललाहु अलैहि वसल्लम)पर सच्चे दिल से ईमान लाए और सारी उम्र इताअत-ओ-फ़र्मांबरदारी में गुज़ार दी?। क्या वो लोग उनके हमपल्ला हो सकते हैं, जो उम्र-भर शिर्क करते रहे, नफ़स की सुफली ख़ाहिशात की तसकीन के लिए तमाम अख़लाक़ी ज़ाबतों को रौंदते रहे और हुसूल माल-ओ-जाह के लिए अल्लाह की मुक़र्रर की हुई हदों को तोड़ते रहे। अगर एसा है तो फिर इस से बड़ा ज़ुलम और क्या हो सकता है। कान खोल कर सन लू! एसा हरगिज़ नहीं होगा। इताअत गुज़ारूँ को फ़िरदौस में दाख़िल किया जाएगा और बदकारों को धक्के देकर जहन्नुम के शोलों में फेंक दिया जाएगा।

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