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क़ुरान

ए हबीब!) आप (उन्हें) फ़रमाईए मैं तुम्हें सिर्फ एक नसीहत करता हूँ ( ये तो मान लू ) तुम अल्लाह के लिए खड़े होजाओ दो दो या अकेले अकेले फिर ख़ूब सोचो ( तुम्हें मानना पड़ेगा) तुम्हारे इस रफ़ीक़ में जुनूँ का शाइबा तक नहीं है। नहीं है वो मगर बरवक़्त ख़बरदार करने वाला तुम्हें सख़्त अज़ाब के आने से पहले। (सूरा सुबह आयत ४६)
हुज़ूर फ़ख़र आलम (सल्लललाहु अलैहि वसल्लम) के ख़िलाफ़ जो लोग तूफान-ए-बदतमीज़ी बरपा किया करते थे और नारवा इल्ज़ामात लगाकर सादा-लौह लोगों को मुतनफ़्फ़िर किया करते थे उन्हें कहा जा रहा है कि हम इस तनाजे का फ़ैसला तुम पर छोड़ते हैं। किसी ग़ैर को यहां हकिम बनाने की ज़रूरत नहीं तुम मेरी सिर्फ एक नसीहत मान लू वो ये है कि तुम दो दो मिलकर या अकेले तन्हाई में बैठ कर इस अमर पर ग़ौर करो कि तुम जो अपने रफ़ीक़ और बचपन के साथी को मजनून कहते हो, उस की तुम्हारे पास कोई माक़ूल वजह भी है। क्या तुमने उन्हें मजनूनों की तरह बे-सर-ओ-पा बातें करते कभी सुना है ? कभी उन्होंने नाशाइस्ता बात तक भी की है। उनका हर काम मक़सदीयत और माअनवियत का लाजवाब नमूना होता है।

उनका हर फे़अल उतना दिलरुबा और रूओह अफ़्ज़ा होता है कि क़ुरबान होने को जी चाहता है। गुफ़्तगु करते हैं तो यू महसूस होता हैके हिक्मत के मोती बिखेर रहे हैं। मितानत, विक़ार, सच्चाई और बुर्दबारी में उनकी मिसाल नहीं पेश की जा सकती। कल तक तुम भी उन्हें सादिक़ और अमीन कह कर पुकारा करते थे। अब तुम ही बताओ कि उनमें यकायक कौनसी तबदीली आगई है कि तुमने उनके बारे में अपनी राय बदल ली है। इन उमोर में अकेले बैठ कर ग़ौर करो या अपनों में से जिनको तुम बाशऊर और ज़ीरक समझते हो उन्हें बुलाकर उनसे तबादला-ए-ख़्याल करो। लेकिन ख़ुदारा तास्सुब और ज़िद को एक तरफ़ रख दो। महिज़ हक़ समझने के लिए अगर एसा करोगे तो यक़ीनन तुम इस नतीजे पर पहुंचोगे कि अल्लाह का महबूब ना मजनून है ना उन पर आसीब का असर है। ये जो कुछ कर रहे हैं महिज़ तुम्हारी ख़ैरख़ाही के लिए कर रहे हैं।

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